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बच्चे फिर स्कूल जाएंगे

Tue, 16 Dec 2014 08:49 PM IST
मरियाना बाबर
मरियाना बाबर Updated Tue, 16 Dec 2014 08:49 PM IST
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children will go to school

पाकिस्तान के पेशावर शहर में आर्मी के एक स्कूल पर हुआ बर्बर हमला साफ संकेत है कि मुल्क में तालिबान आतंकियों के हौसले पस्त नहीं हुए हैं। यह न सिर्फ खुफिया एजेंसियों की, बल्कि हुकूमत की भी बड़ी विफलता है। जिस तरह आतंकियों ने स्कूल में घुसकर अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी और बच्चों को बंधक बनाकर मारा, यह बेहद अफसोसनाक हादसा है।

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हालांकि कुछ समय पहले नार्थ वजीरिस्तान में पाकिस्तानी फौज ने आतंकियों के खिलाफ एक विशेष ऑपरेशन जर्ब-ए-अर्ज चलाया था, जो अब भी जारी है। मगर पिछले लंबे समय से आतंकियों की तरफ से कोई आक्रामक प्रतिक्रिया नहीं दिखाई दी थी। इससे लोगों को लगने लगा था कि तालिबान आतंकियों के हौसले पस्त हो गए हैं। लेकिन लगता है कि उन्हें तो बस मौके का इंतजार था।
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यह पहला मौका नहीं है, जब आतंकियों ने स्कूलों को निशाना बनाया है। बच्चों, महिलाओं और शिक्षा से तालिबान आतंकियों को नफरत है। मलाला यूसुफजई पर हुए हमले के बारे में तो दुनिया भर के लोग वाकिफ हैं, लेकिन इससे पहले भी स्कूलों को निशाना बनाया गया, हालांकि स्कूल में छुट्टियां होने की वजह से तब जान-माल का इतना नुकसान नहीं हुआ था। खैबर पख्तूनख्वाह और फाटा के इलाके में अक्सर स्कूलों पर हमले होते रहते हैं। यह ताजा हमला तब हुआ है, जब स्कूलों में इम्तहान चल रहे हैं और बड़ी संख्या में बच्चे स्कूल में थे। यह हैरानी की बात है कि हमला फौजी स्कूल में हुआ, जहां भारी सुरक्षा इंतजाम की अपेक्षा की जाती है। लेकिन अफसोस की बात है कि वहां सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं थे। जिस स्कूल पर हमला हुआ है, उसके पीछे एक कब्रिस्तान है और बताया जाता है कि आतंकी उसी कब्रिस्तान से होकर स्कूल में घुसे। जैसी कि मुझे खबर मिल रही है, इस हमले में एक शिक्षिका को जिंदा जला दिया गया है। हालांकि अभी इसकी पुष्टि नहीं हुई है।
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असल में पाकिस्तान में इस तरह के हमले के लिए मुख्य रूप से पाकिस्तान का राजनीतिक वर्ग जिम्मेदार है। पाकिस्तान खुद को आतंकवाद से पीड़ित कहता है, लेकिन सच तो यह है कि यहां के हुक्मरानों ने समय-समय पर विभिन्न आतंकी गुटों को पनाह दी है। अगर ऐसा नहीं होता, तो अफगानिस्तान और अमेरिका ने जब हक्कानी गुट को नेस्तनाबूद करने और उसके आका को सौंपने के लिए कहा था, तो पाकिस्तान ने ऐसा क्यों नहीं किया? यहीं नहीं, जिस खैबर पख्तूनख्वाह प्रांत में यह हमला हुआ है, वहां इमरान खान की पार्टी तहरीक-ए इंसाफ का शासन है। इस हमले को भले ही इमरान खान ने बर्बर बताया है, लेकिन वह कहते रहे हैं कि तालिबान के साथ सरकार को बातचीत करनी चाहिए। सवाल उठता है कि ऐसे बर्बर हमले करके बड़ी संख्या में बच्चों को मारने वाले गुट से बातचीत करने का क्या मतलब है? इमरान खान इन दिनों मुल्क के विभिन्न शहरों को बंद करने का आह्वान करते फिर रहे हैं। उन्हें इससे फुर्सत नहीं मिलती कि देखें कि उनकी पार्टी के शासन वाले प्रांत में क्या हो रहा है।

जिस मुल्क की बेटी मलाला को हाल ही में बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में काम करने के लिए नोबल पुरस्कार दिया गया, वहां बच्चों पर इस तरह के हमले शर्मनाक हैं। यहां की हुकूमत आतंकियों पर लगाम लगाने में विफल साबित हो रही है। लेकिन हमारे मुल्क के बच्चे बहुत बहादुर हैं। मलाला के अलावा यहां और भी हिम्मती बच्चे हैं। बच्चों को स्कूलों से दूर करने के आतंकियों के मंसूबे पूरे नहीं होने वाले, ये बच्चे जल्द ही इस हादसे से उबर कर स्कूलों में पढ़ने जाएंगे।

दुनिया भर के लिए आतंकवाद एक बड़ी समस्या है। महज अड़तालीस घंटे पहले ऑस्ट्रेलिया के सिडनी के कैफे में आतंकियों ने करीब 16 घंटे तक लोगों को बंधक बनाए रखा। भले ही पेशावर में हुए हमले का ऑस्ट्रेलिया की आतंकी घटना से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है, लेकिन बताया जाता है कि अफगानिस्तान में नाटो सैनिकों की कार्रवाई के प्रतिक्रियास्वरूप उसे अंजाम दिया गया। हाल ही में बंगलूरू में इस्लामिक स्टेट के लिए ट्विटर एकाउंट हैंडल करने के आरोप में एक युवक को गिरफ्तार किया गया। दुनिया भर में आतंकी संगठन सक्रिय हैं और इस्लामिक स्टेट के बढ़ते आतंक से तो पूरी दुनिया चिंतित है।

अब वक्त आ गया है कि दक्षिण एशियाई देश आतंकवाद के खिलाफ एकजुट हो जाएं और आपस में न सिर्फ खुफिया जानकारियां साझा करें, बल्कि एक-दूसरे देश को वांछित आतंकियों को भी सौंपें। भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते खराब होने के पीछे एक बड़ी वजह आतंकवाद ही है। भारत हमेशा से आरोप लगाता रहा है कि पाकिस्तान न सिर्फ भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देता है, बल्कि मुंबई हमलों के आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई भी नहीं कर रहा है। भारत हाफिज सईद और दाउद इब्राहिम को सौंपने के लिए पाकिस्तान से बार-बार अपील कर चुका है। दाउद इब्राहिम के बारे में तो नहीं कह सकती कि पाकिस्तान में वह है या नहीं, लेकिन हाफिज सईद को जरूर पाकिस्तान की अदालत ने मुंबई हमले मामले में बरी कर दिया है। इसमें कोई शक नहीं कि हाफिज सईद आतंकी है और वह लगातार भारत के खिलाफ जहर उगलता रहा है। पाकिस्तानी हुक्मरान ने उस पर अंकुश लगाने के बजाय उसकी रैलियों को सफल बनाने के लिए स्पेशल ट्रेन चलवाई। किसी आतंकी संगठन की रैली के लिए सुविधाएं मुहैया कराने का भला क्या तुक है?

पाकिस्तानी हुकूमत को लगता है कि ऐसे संगठनों को संरक्षण देकर वह कश्मीर को हासिल कर सकता है, लेकिन उन्हें इस वास्तविकता को समझना चाहिए कि कश्मीर की नई पीढ़ी विकास और तरक्की में भरोसा करती है। उन्हें बंदूकों से नफरत है और वे लोकतंत्र में भरोसा करते हैं। भारतीय जम्मू-कश्मीर में जो विधानसभा के चुनाव इन दिनों चल रहे हैं, उसमें भारी संख्या में हिस्सा लेकर कश्मीरियों ने दिखा दिया है कि वह हिंसा और आतंकवाद में भरोसा नहीं करते। पाकिस्तानी हुकूमत को और भारत के खिलाफ सक्रिय यहां के आतंकी संगठनों को इससे सबक लेना चाहिए। कश्मीर की नई पीढ़ी अब अलगाववादियों और आतंकी संगठनों के झांसे में नहीं आने वाली।


पाकिस्तानी फौज के नए मुखिया राहिल शरीफ ने पद संभालते समय साफ कहा था कि पाकिस्तान को खतरा बाहर से नहीं, बल्कि मुल्क के भीतर से है। यही वजह है कि उन्होंने उत्तरी वजीरिस्तान के इलाकों में सैन्य ऑपरेशनों को तेजी से आगे बढ़ाया। पर पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान हमेशा भारत को अपना दुश्मन समझता रहा है। इसी का नतीजा है कि देश आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर विफल दिख रहा है और यहां आतंकी संगठन जब-तब बर्बर वारदातों को अंजाम दे रहे हैं।

- पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार और द न्यूज इंटरनेशनल (इस्लामाबाद) की डिप्लोमेटिक एडीटर

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