जन्माष्टमी में मां से बिछड़े बच्चे
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जन्माष्टमी का त्योहार उत्तर भारत का बहुत ही प्रिय त्योहार है। खासतौर से उत्तर भारत की माताओं का यह अति प्रिय त्योहार है। माताएं श्रीकृष्ण के जन्म का उतनी ही बेसब्री से इंतजार करती हैं, जितनी बेसब्री से वे अपने बच्चों के पैदा होने का इंतजार करती हैं। जन्माष्टमी के अवसर पर वे दिन भर व्रत रखती हैं। शायद इसलिए कि बच्चा पैदा करने के कष्ट का फिर से अनुभव करें। वे अपने घर में लगे कान्हा के चित्र और मूर्ति को बड़े ही प्यार और लाड़ से निहारती हैं और उनमे अपने लाल को देखती हैं। उनके बच्चे जब बड़े हो जाते हैं, तब वे उनका बचपन याद करती हैं। अगर बच्चा पैदा न हो रहा हो, तो बाल गोपाल की स्तुति कर वे अपने मन को तसल्ली देती हैं। और अगर बच्चा पैदा करने का सुख प्राप्त करने के बाद बच्चा अचानक छिन जाता है, तब जन्माष्टमी का दिन उन्हें काटने को दौड़ता है। कान्हा की तस्वीर और उसकी मूर्ति उनके दिल के दर्द को फिर से कचोटती है।
जन्माष्टमी का त्योहार असली और सौतेले मातृत्व, दोनों को महत्त्व देने का त्योहार है। देवकी को अपने सगे भाई कंस के डर के मारे अपने नवजात शिशु को अपने से अलग करना पड़ा। उस मां पर क्या गुजरी होगी! उसने किस तरह दिल पर पत्थर रखकर अपने उस बाल गोपाल को अपने पति वसुदेव को सौंपा होगा कि उसे दूर कहीं किसी दूसरी मां की गोद भरने के लिए वह ले जाएं। क्योंकि उसका सगा भाई कंस ही उसकी औलाद का दुश्मन था। उसके खून का प्यासा था। ऐसे में, मूसलाधार पानी में यमुना नदी पार करते हुए, अंधेरी रात के साये में वसुदेव ने उस शिशु को यशोदा की गोद में सौंप दिया, और बिना पीछे देखे, पौ फटने से पहले, देवकी के पास लौट आया, ताकि कंस को इस बारे में कुछ भी पता न चले।
हम सौतेली माताओं की बहुत डरावनी कहानियां सुनते हैं। लेकिन यशोदा ने उस बच्चे को गले लगाया और हंसकर उसकी शिकायते भी सुनीं। सूरदास की मानें, तो कन्हैया यशोदा से शिकायत करता है : मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ/मोसौं कहत मोल कौ लीन्हौ, तोहे जसुमति कब जायौ? कहा करौं इहि के मारें खेलन हौं नहि जात/पुनि-पुनि कहत कौन है माता, कौन है तेरौ तात? गोरे नन्द जसोदा गोरी तू कत स्यामल गात/चुटकी दै-दै ग्वाल नचावत हंसत-सबै मुसकात/तू मोहीं को मारन सीखी दाउहिं कबहुं न खीझै/मोहन मुख रिस की ये बातैं, जसुमति सुनि-सुनि रीझै/सुनहु कान्ह बलभद्र चबाई, जनमत ही कौ धूत/सूर स्याम मौहिं गोधन की सौं, हौं माता तो पूत।
अबकी जन्माष्टमी के अवसर पर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, कुशीनगर, बस्ती, गोंडा, देवरिया और महाराजगंज जैसे तमाम जिलों की माताएं कान्हा की तस्वीर और मूर्ति को निहारने की हिम्मत नहीं जुटा पाईं। उनको यह डर था कि उनमे उन्हें दिखाई देंगे शालू, ज्यूति, वंदना, प्रतिज्ञा, प्रमिला, मंजू, आदर्श, दीपक, शानू आदि बच्चे। ये वही बच्चे हैं, जिनका दम पिछले दिनों गोरखपुर के उस बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज में घुट गया था। लेकिन गोरखपुर के ही योगी आदित्यनाथ को, जो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, यह बात सूझी ही नहीं। उन्होंने सरकारी निर्देश जारी कर दिया कि इस बार जन्माष्टमी अधिक धूमधाम से मनाई जाए। एक बच्चे के जन्म की खुशी मनाकर शायद सौ बच्चों की मौत के दुख पर पर्दा डाला जा रहा था।
राज सौतेला नहीं, कंस का मालूम पड़ रहा है।
-लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं।