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टाइपराइटर वाले मुख्यमंत्री
सहीराम
Updated Tue, 19 Nov 2013 07:14 PM IST
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जी, चुनाव के समय वैसे तो नेता लोग लैपटॉप बांटने के वायदे करना ही पसंद करते हैं। पर इधर पता चला कि चुनाव लड़ रहे एक मुख्यमंत्री के पास लैपटॉप या कंप्यूटर जैसा कुछ भी नहीं है। उनके पास तो बस वही पुराना टाइपराइटर है।
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हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि वह पुराने जमाने के हैं या तकनीक विरोधी हैं। चुनाव के समय अनेक नेता यह घोषणा करते हैं कि उनके पास कार नहीं है। उनके पास करोड़ों की परिसंपत्तियां होती हैं, पर कार नहीं होती। इसका अर्थ यह थोड़े होता है कि वह कार का इस्तेमाल ही नहीं करते।
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वैसे भी आईटी के इस जमाने में किसकी हिम्मत है कि वह आईटी विरोधी हो जाए। अलबत्ता यह मंदी का जमाना है और आईटी का अब वह जलवा भी नहीं रहा। वरना पहले तो सीन यह होता था कि बिल गेट्स से मिलने के लिए हमारे मुख्यमंत्री लाइन लगाकर इंतजार करते थे। जिसकी पीठ पर उनकी थपकी पड़ जाती थी, वह चंद्रबाबू नायडु की तरह निहाल हो जाता था। आजकल बिल गेट्स उन्हें याद है या नहीं या वह बिल गेट्स को याद हैं या नहीं, पता नहीं। पर बेचारे फिर से सत्ता पाने का इंतजार जरूर कर रहे हैं।
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खैर जी, चुनाव लड़ रहे इन मुख्यमंत्री जी के पास टाइपराइटर है, तो इसका अर्थ कतई नहीं कि वह पुराने जमाने के हैं। पिछले दिनों खबरें आ रही थीं कि अमेरिका वाले जर्मन प्रधानमंत्री की जासूसी कर रहे हैं और आशंका यह है कि वे दुनिया भर के प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों की जासूसी कर रहे हैं।
तब हमारे सरकारी प्रवक्ताओं ने बताया था कि वे हमारे प्रधानमंत्री की जासूसी तो कर ही नहीं सकते, क्योंकि वह आधुनिक तकनीक का तो इस्तेमाल ही नहीं करते। पर इसका अर्थ यह नहीं कि वह पुराने जमाने के हैं। बल्कि वही तो हैं, जो भारत को अमेरिका बनाने में लगे हैं।
खैर जी, इधर खबरें इस तरह की भी आ रही हैं कि जासूसी खतरे को देखते हुए अब लोग ई-मेल टाइप की अत्याधुनिक तकनीक पर भरोसा नहीं करते। वे टाइपराइटर का ही इस्तेमाल करते हैं, वैसे हमारे यहां धुरंधर बदमाश भी वसूली, उगाही आदि के लिए मोबाइल फोन का इस्तेमाल नहीं करते। पुलिस से बचने का यही तोड़ है।
इसी तरह जासूसी से बचने का तोड़ भी लोगों ने निकाल लिया है-टाइपराइटर। भले ही टाइपिंग स्कूल बंद हो गए हों, टाइपराइटर के मैकेनिक भी चाहे न मिलते हों, पर टाइपराइटर अब भी मिलता है।