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चौधरी अजित सिंह: बदलाव पैदा करने वाला नायक

Fri, 07 May 2021 05:28 AM IST
के. सी. त्यागी के सी त्यागी
के सी त्यागी Published by: के. सी. त्यागी Updated Fri, 07 May 2021 05:28 AM IST
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Chaudhary Ajit Singh: A hero who creates change
श्रद्धांजलि: अजीत सिंह - फोटो : Amar Ujala (File Photo)

चौधरी चरण सिंह के अनुयायियों तथा किसान आंदोलन के समर्थकों के लिए 6 मई का दिन तकलीफ और अफसोस से भरा रहा। चौधरी अजित सिंह की मृत्यु ऐसे समय पर हुई है, जब उनकी जरूरत पहले से शायद ज्यादा थी। वह पिछले काफी समय से राजनीति में थे, पर तीन कृषि कानूनों के विरुद्ध किसानों में आए उबाल ने उन्हें एक नई राजनीतिक शक्ति दी। अस्वस्थ होने, डॉक्टरों की चेतावनी तथा परिवारजनों के आग्रह के बावजूद वह गाजीपुर में किसान धरने पर बैठ गए थे। यह वह दिन था, जब किसान आंदोलन के नेता चौधरी राकेश टिकैत असुविधाजनक स्थिति का सामना कर रहे थे। बिजली-पानी काट दिया गया था, चारों तरफ से घेराबंदी हो चुकी थी और उन्हें गिरफ्तार करने की योजना बनाई जा रही थी। वैसे में, अजित सिंह ने स्वयं पहल कर उनको फोन किया और अगले दिन धरने पर जा बैठे। लगभग टूटता-बिखरता आंदोलन अगले दिन से ही बुलंदियों पर था। यह ताकत अजित सिंह के पुरखों चौधरी चरण सिंह और चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत द्वारा विरासत में दी गई थी।


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काफी लंबे समय तक वह राजनीति के हाशिये पर थे, और पिछले 35 वर्षों का मेरा उनके साथ का अनुभव है कि उन्होंने कई असुविधाजनक समझौते भी किए। अगर वह मुलायम सिंह से न टकराए होते, तो 1996 में एचडी देवगौड़ा के नेतृत्व में बनी जनता दल सरकार में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती। चौधरी चरण सिंह की मृत्यु के बाद चौधरी देवीलाल, कर्पूरी ठाकुर, मुलायम सिंह यादव आदि अजित सिंह के लिए  सीमित भूमिका तय कर रहे थे। चरण सिंह के समर्थकों का एक बड़ा तबका उन्हें चौधरी साहब की स्थिति में ही स्थापित होते देखना चाहता था, पर लोक दल कांग्रेस पार्टी नहीं था। इसमें कर्पूरी ठाकुर और चौधरी देवीलाल थे, नेहरू और श्री सुखाड़िया जैसों से राजस्थान में पंगा ले चुके कुंभाराम आर्य थे और इनके सान्निध्य में मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडीज और रवि राय सरीखे नामी-गिरामी समाजवादी विचारक भी थे। चौधरी अजित सिंह को लोगों ने मुलायम सिंह यादव के साथ टकराव के रास्ते पर भेज दिया। मुलायम सिंह ने यह चुनौती स्वीकार की। पहले राउंड में चौधरी अजित सिंह विजयी रहे, जब वह मुलायम सिंह को नेता प्रतिपक्ष पद से अपदस्थ कर अपने करीबी सतपाल सिंह यादव को नेता निर्वाचित करने में कामयाब हो गए।

1989 में वीपी सिंह के नेतृत्व में जनता दल बनने लगा, तो वह पार्टी के ढांचे में नंबर दो पर स्थापित हो गए। पर मुलायम और अजित सिंह की तकरार बरकरार रही। 1990 में उत्तर प्रदेश में चुनाव में दोनों फिर आमने-सामने हो गए, पर अजित सिंह बहुत कम वोटों से पराजित हो गए और मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बन गए। इसके साथ ही चरण सिंह की विरासत भी बंट गई, जिनमें से एक का नेतृत्व मुलायम सिंह के हाथ में था, तो दूसरा अजित सिंह के हाथ में। मुलायम सिंह से मोर्चा लेते-लेते अजित सिंह कांग्रेस में शामिल हो गए और पीवी नरसिंह राव की सरकार में मंत्री बन गए। पर 1996 में जब कांग्रेस की सरकार गिरी, तो वह गैरकांग्रेसी भूमिका में आ गए। मुजफ्फरनगर के सांप्रदायिक तनाव ने अजित सिंह की भूमिका सीमित कर दी। वर्ष 2014 के चुनाव में वह बागपत से सोमपाल शास्त्री से हार गए, तो 2019 में संजीव बालियान के हाथों पराजित हुए, बागपत से उनके पुत्र जयंत चौधरी भी पराजित हो गए। इसे चौधरी चरण सिंह की विरासत के अंत के तौर पर देखा जा रहा था। लेकिन केंद्र सरकार के तीन कृषि बिलों के खिलाफ आंदोलन ने अजित सिंह को फिर प्रासंगिक बना दिया। 

इसमें दो राय नहीं है कि दो पराजयों के बाद भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अजित सिंह का कद सबसे बड़ा था। साफ-सुथरी राजनीति करते हुए वह अपने पिता के सच्चे अनुयायी साबित हुए। आज पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति ने अंगड़ाई भी ली है, लेकिन बेचैनी और बदलाव पैदा करने वाला नायक हमारे बीच में नहीं रहा। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि। 

(नोएडा के कोविड अस्पताल के कमरा नंबर 1008 से लिखा गया)
(लेखक जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।)

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