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राजनीति का बदलता मुहावरा
अनिल प्रकाश जोशी
Updated Thu, 12 Dec 2013 02:07 PM IST
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आम आदमी पार्टी की दिल्ली विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित सफलता इस बात का साफ संकेत है कि देश की जनता स्थापित राजनीतिक दलों की मनमानी से तंग आ चुकी है और एक नए विकल्प की तलाश कर रही है।
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इसने इस तथ्य को भी रेखांकित किया है कि सामाजिक आंदोलनों को राजनीतिक परिवर्तन के वाहक के तौर पर देखा जा सकता है और अगर सामाजिक आंदोलनों को निःस्वार्थ एवं ईमानदार नेतृत्व मिले, तो उसे आम लोगों का भरोसा और सहयोग भी मिलता है।
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बेशक, सामाजिक आंदोलन करने वाले संगठनों द्वारा पहले भी टुकड़े-टुकड़े में प्रयोग हुए हैं, लेकिन उनके परिणाम बहुत उत्साहजनक नहीं रहे, क्योंकि भीड़, मुद्दे व सेवा वोटों में तब्दील होते नहीं देखे गए। लेकिन आम आदमी पार्टी ने देश भर के सामाजिक संगठनों के सामने उम्मीद की किरण जगाई है।
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इसने यह दिखा दिया है कि सामाजिक संगठन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बेहतर राजनीतिक परिस्थितियां पैदा करने में एक प्रभावी योगदान दे सकते हैं। खासकर ऐसे समय में, जब देश के राजनीतिक हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं, विकल्पों की खोज में लगे सामाजिक संगठन एवं उनके कार्यकर्ता आम लोगों को जागरूक बनाकर इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
आम आदमी पार्टी का उभार देश की राजनीतिक व्यवस्था के लिए एक सुखद संकेत है। मौजूदा निराशाजनक राजनीतिक परिदृश्य में देश की जनता व्यापक बदलाव चाहती है। पिछले साढ़े छह दशक में हमारी राजनीतिक पार्टियां ऐसा कोई चमत्कार नहीं कर पाईं, जिससे देश के तमाम लोगों को सभी बुनियादी सुविधाएं हासिल हो सकें और चमकते भारत की छवि सामने आए। लोगों की आशाएं निराशाओं में बदलती चली गईं। दो-तीन पार्टियों के बीच हर चुनाव में बदलाव लाने की कोशिशें कभी कोई बड़ा काम नहीं कर पाईं। हर बार पुराने में नएपन की तलाश या फिर एक से थक और निराश होकर हम फिर पुराने को चुनकर आशाएं बांधते चले गए। हासिल जो कुछ हुआ, वह सब हमारे सामने है।
देश के बड़े राजनीतिक दलों ने जब कुछ दशक पहले जनता का विश्वास खोया और क्षेत्रीय अस्मिताओं के उभार के कारण देश में कई क्षेत्रीय क्षत्रपों का उदय हुआ, तो एकदलीय शासन की व्यवस्था असंभव-सी लगने लगी। देश की कई कौमों ने राष्ट्रीय दलों को नकार दिया। ऐसे में विभिन्न दलों के आपसी सहयोग से गठबंधन बनाने का विकल्प सामने आया और देश के राजनीतिक वर्ग ने दो बड़े राजनीतिक घटकों-यूपीए एवं एनडीए को जन्म दिया।
लेकिन गठबंधन सरकारों ने राजनीति को और गहरे गड्ढे में धकेल दिया। इन दो बड़े गठबंधनों के बनते-बिगड़ते समीकरणों में जनता की नए तरह से पिसाई शुरू हो गई। और आज आजादी के साढ़े छह दशकों बाद भी हमारा राजनीतिक भविष्य एक छलावे की तरह दिखता है। बार-बार इस तरह छले जाने के खिलाफ पूरे देश में आक्रोश है, जो देशव्यापी राजनीतिक विकल्प की तलाश कर रहा है।
भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन की गर्भ से उपजे सामाजिक कार्यकर्ताओं के ही एक समूह ने ‘आप’ की नींव रखी और एक बड़ी चुनौती लेकर दिल्ली की जनता के बीच गई। भ्रष्टाचार विरोधी उस अन्ना आंदोलन को देश भर की जनता का व्यापक समर्थन हासिल था। आम आदमी के अधिकारों की वकालत करने वाली इस पार्टी को समर्थन देकर जनता ने स्थापित सियासी पार्टियों को एक चेतावनी दी है कि आम आदमी की उपेक्षा अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी और जनहित से जुड़े मुद्दे राजनीतिक दलों के एजेंड़े में प्राथमिकता में होने चाहिए।
आप को मिले जनसमर्थन से साफ है कि देश की जनता साफ-सुथरी छवि वाले लोगों को राजनीतिक विकल्प के तौर पर चुनना चाहती है, ताकि दुनिया में अपनी और देश, दोनों के हालात को बेहतर रूप में प्रस्तुत कर सके। रोज-रोज का सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक अस्थायीपन उन्हें कचोटता है।
देश के सामाजिक संगठन, जो जनसेवा के कार्यों से जुड़े हैं, वे आम लोगों के बीच से ही उभरे संगठन हैं। ये वे लोग हैं, जो देश के ग्रामीण इलाकों के हालात को गहराई से समझने की क्षमता रखते हैं और इन्होंने हमेशा लोगों के मुद्दों और प्राथमिकताओं पर कार्य किया है। समाज के हर पहलू में इनकी जमीनी पकड़ है। चाहे शिक्षा की बात हो या फिर स्वास्थ्य या फिर गांवों के आर्थिक उन्नयन की, इन संगठनों ने हमेशा अग्रणी भूमिका निभाई है और समय-समय पर सरकार और राष्ट्रीय योजनाओं को भी दिशा दी है। इसलिए इनकी राजनीति में भागीदारी किस तरह से महत्वपूर्ण है, यह जानने का समय है।
ये जनसंगठन भले ही आम आदमी पार्टी की तरह राजनीति में सक्रिय भागीदारी न करें, लेकिन स्वच्छ राजनीतिक वातावरण बनाने में सहायक की भूमिका तो निभा ही सकते हैं। इन जनसंगठनों को अच्छी छवि वाले लोगों के पक्ष में खड़ा होना होगा और यह जिम्मेदारी भी निभानी होगी कि लोग अपने मतों के महत्व को समझें और अपनी प्राथमिकताओं को लेकर प्रत्याशियों से जद्दोजहद करें। यह काम कम से कम राजनीतिक दलों को साधने के कुछ तो काम आएगा।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अगर देश के सारे सामाजिक संगठन जनता को प्रत्याशियों के चयन से लेकर चुनाव में रास्ता दिखाने का भी काम शुरू कर दें, तो यह अपने आप में एक क्रांतिकारी पहल होगी, क्योंकि इनकी पैठ गहरी है। यह एक बार तमाम व्यवस्था में खलबलाहट तो पैदा कर ही देंगे। चूंकि देश के गांव इनके साथ बहुत बारिकी से जुड़े हैं, इसलिए घर-गांव के मुद्दे तो कम-से-कम राजनीतिक पार्टियों द्वारा सुने-समझे जाएंगे।