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बदलता बांग्लादेश और हसीना की चुनौतियां

Tue, 05 Feb 2019 07:29 PM IST
Mahendra Ved महेंद्र वेद
Updated Tue, 05 Feb 2019 07:29 PM IST
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Changes Bangladesh and Hasina's Challenges
शेख हसीना

बांग्लादेश के संसदीय चुनाव में भारी बहुमत से जीत ने शेख हसीना को आत्मविश्वास के साथ काम करने का अवसर दिया है। उनके गठबंधन ने 299 में से 288 सीटें जीतीं और अब उनके सामने कोई विपक्ष नहीं बचा है। नई सरकार गठन के अब लगभग एक महीने हो चुके हैं और वह देश को राजनीतिक स्थिरता प्रदान करने और तेज आर्थिक विकास की राह पर चल पड़ी हैं।


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जैसा कि चुनाव से एक दिन पूर्व भारतीय पत्रकारों के एक समूह के साथ बातचीत करते हुए उन्होंने कहा था कि अगर एक बार फिर से वह चुनाव जीत जाती हैं, तो 2021 में वह राष्ट्र की 50वीं वर्षगांठ का नेतृत्व करेंगी। उनकी यह इच्छा तो पूरी हुई, पर उनके सामने कुछ बड़ी चुनौतियां भी हैं। उन्हें राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से समावेशी विकास के लिए प्रयत्न करना चाहिए। खास तौर से उन्हें अर्थव्यवस्था का इस तरह से विकास करना होगा, जो बढ़ती असमानताओं को कम करे।

उनके नेतृत्व में अब बांग्लादेश पीढ़ीगत बदलाव के लिए भी तैयार है, जिसका पहला संकेत उन्होंने मंत्रिमंडल गठन के समय दिया। उन्होंने पुराने सलाहकारों को बेशक बनाए रखा है, पर मंत्रिमंडल में उन वरिष्ठों को जगह नहीं मिली है, जिनमें से कई उनके दिवंगत पिता शेख मुजीबुर्रहमान के साथ काम कर चुके थे। इसके बजाय उन्होंने मंत्रिमंडल में युवा चेहरों को ज्यादा जगह दी है। यह जरूरी भी था, क्योंकि उन्हें मुक्ति के बाद की पीढ़ियों की आकांक्षाओं को पूरा करना है। बांग्लादेश के युवा भी अन्य देशों के युवाओं की तरह महात्वाकांक्षी हैं और वे दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहते हैं। इसलिए इन्होंने देश को एक युवा मंत्रिमंडल दिया है, जो जोश और आत्मविश्वास के साथ नई पीढ़ी की आकांक्षाओं को पूरा करेगी।
 
जमीनी हकीकत यह है कि आर्थिक विकास में निरंतर तेजी और भारत सहित अन्य दक्षिण एशियाई देशों से सामाजिक विकास सूचकांकों में आगे रहने के कारण वहां हर कोई हसीना से खुश प्रतीत होता है या सापेक्ष राजनीतिक स्थिरता के प्रति सहमत है। अपनी तमाम खामियों के साथ इसमें हसीना के दस वर्षों के शासन का काफी योगदान है।
 
बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में वहां के गारमेंट उद्योग का बड़ा हाथ है, जिसमें 70 फीसदी से ज्यादा महिलाएं काम करती हैं। स्वयं महिला होने के नाते हसीना ने महिलाओं के सशक्तीकरण की दिशा में भी काफी काम किया है। गारमेंट उद्योग से बांग्लादेश को सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा हासिल होती है। अगर वह आंतरिक विरोधाभासों को ठीक से प्रबंधित कर पाती हैं और उम्मीद करें कि यदि उन्हें बाढ़ या चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं से निपटना नहीं पड़े, तो लगता है कि बांग्लादेश तेज आर्थिक विकास और बेहतर सामाजिक वातावरण के लिए तैयार है।

हालांकि एक खतरे की आशंका है। चुनावी हार और राज्य द्वारा जारी अभियोजन के चलते इस्लाम से बेहद प्रभावित युवाओं का एक वर्ग ज्ञात विदेशी संपर्क और धन के बल पर कट्टरपंथी बन सकता है। इसलिए हसीना सरकार को धार्मिकता और धर्म के बीच एक रेखा खींचने की जरूरत है, जिसका इस्तेमाल समाज को अस्थिर करने और भविष्य में परेशानियां पैदा करने के लिए किया जा रहा है। ऐसा करने के लिए नई सरकार को सेना, पुलिस और अर्ध सैनिक बलों को खुली छूट देने के खिलाफ बेहतर निगरानी रखनी होगी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे संविधानेतर प्राधिकरण न बनें। बांग्लादेश में 15 वर्षों तक सेना या सैन्य-निर्देशित शासन रहा है और एक नाजुक असैन्य नेतृत्व की सेना पर निर्भरता देश में फिर से सेना के लिए दरवाजे खोल सकती है। खुद हसीना सरकार को भी संविधानेतर शक्ति बनने से परहेज करना चाहिए।

इस चुनाव पर भारत के लोगों की काफी नजर थी और इसके नतीजे को लेकर गहरी दिलचस्पी थी। इसकी मुख्य वजह यह है कि इस चुनाव के नतीजे का स्पष्ट असर भारत के पूर्वी और पूर्वोत्तर क्षेत्र की आंतरिक सुरक्षा पर असर पड़ने वाला है। इसके अलावा बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत समर्थक मानी जाती हैं और उनका रुख हमेशा भारत के प्रति सकारात्मक रहा है। इस चुनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू था कि पहली बार भारत चुनावी बहस का हिस्सा नहीं बना। पिछले के चुनावों में भारत को या तो खलनायक दिखाया जाता था या सहयोगी के रूप में वर्णित किया जाता था। भारत विरोधी राजनेता बांग्लादेश के लोगों को भारतीय आधिपत्य के खिलाफ चेताते थे। पिछले चुनाव में शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को 'भारत का दलाल' कहा गया था। ऐसी बातें इस बार के चुनाव में नहीं हुईं। 
हसीना ने हमेशा अपने देश की आजादी की लड़ाई में भारत की सहायता को स्वीकार किया है और पूर्वोत्तर भारत के उग्रवादियों को बांग्लादेश की धरती का इस्तेमाल करने से रोकने के लिए उनके शिविरों को दृढ़ता से खत्म किया है। हम भी अपने इस पड़ोसी देश को ऊर्जा और व्यापार के क्षेत्र में लगातार मदद कर रहे हैं। हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि मौजूदा समय भारत-बांग्लादेश रिश्ते के लिए स्वर्ण काल की तरह है। खालिदा जिया के शासन काल में (वर्ष 2001-06 के दौरान) भारत को काफी कुछ सहना पड़ा था, जबकि शेख हसीना का शासन भारत के अनुकूल है। भारत के अलावा हसीना ने चीन से भी अच्छे संबंध विकसित किए हैं, जिस पर मुझे नहीं लगता कि भारत को तब तक कोई एतराज होना चाहिए, जब तक उसका कोई कदम भारत के खिलाफ न जाए।

कम से कम चुनाव में इस्लामवादियों को पराजित कर हसीना एक अस्थिर राष्ट्र को राजनीतिक स्थिरता प्रदान कर सकती हैं। हालांकि ऐसा कोई नहीं है, जिसे पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष कहा जा सकता है और हसीना खुद धार्मिक रूढ़िवाद के एक हिस्से से जुड़ी हैं और इस्लाम को वहां के राष्ट्र धर्म के रूप में बनाए रखा है, फिर भी उम्मीद की जा सकती है कि बांग्लादेश एक उदारवादी इस्लामी राष्ट्र बना रहेगा। जब दुनिया के कई हिस्से में चरमपंथ और आतंकवाद से मुकाबला जारी है, तब यह पर्याप्त है।

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