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देश की दिशा बदली है और मंत्रियों की भाषा भी

Sun, 10 Apr 2016 06:15 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 10 Apr 2016 06:15 PM IST
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change in direction of nation and minister's language
तवलीन सिंह

भारत में एक भी भारतवासी मुझे ऐसा नहीं मिला है, जो अपने देश के बारे में कोई अच्छी बात कहने के लिए तैयार हो। जो भी लोग मुझे मिले हैं, उनके मुंह से भारत की आलोचना ही निकलती है। ये शब्द मैंने सिंगापुर के उप-प्रधानमंत्री थर्णम शनमुर्गरत्नम से मुंबई के एक सम्मेलन में सुने, जहां सिंगापुर और भारत के आर्थिक-राजनीतिक रिश्तों के बारे में बात हो रही थी। उन्होंने आगे यह भी कहा कि अधिकतर भारतीय देख ही नहीं पाए हैं कि उनके देश में कई क्षेत्रों में कितनी तेजी से परिवर्तन आ रहा है।

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सिंगापुर के उप-प्रधानमंत्री की बातों से प्रेरणा लेकर आज मैं परिवर्तन के उन पहलुओं के बारे में लिखना चाहूंगी, जो मैंने नरेंद्र मोदी सरकार के पहले दो वर्षों में देखे हैं। हम पत्रकार एक तो आलोचना के मामले में मजबूर हैं, ऊपर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमें अपने से इतना दूर रखा है कि हम उनसे नाराज भी हैं। सो उनकी सरकार की आलोचना इतनी हुई है कि हम भूल ही चुके हैं कि उनके दौर में कई अच्छे काम भी हुए हैं। देश की आर्थिक नीतियों में इतना परिवर्तन आया है कि दिशा बदल गई है देश की और मोदी के मंत्रियों की भाषा भी। सोनिया गांधी के समय जब भी उनका कोई मंत्री आर्थिक मामलों का जिक्र करता था, तो यही कहता था कि आर्थिक नीतियां गरीबों के लिए बनाई जानी चाहिए। राहुल गांधी आज भी देश भर में यही कहते फिर रहे हैं, साथ ही वह यह दोष भी लगा रहे हैं कि नरेंद्र मोदी अपने कुछ उद्योगपति दोस्तों के लिए ही काम कर रहे हैं।
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सच यह है कि गरीबी हटाने के दो ही रास्ते हैं। एक वह, जिसे कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां पसंद करती हैं, और जिसमें अर्थव्यवस्था की बागडोर पूरी तरह राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों के हाथों में रहती है। आजादी के बाद से हम ज्यादातर इसी रास्ते पर चलते आए हैं, लेकिन इससे गरीबी उस तेजी से कम नहीं हुई है, जिस रफ्तार में चीन और दूसरे दक्षिण पूर्वी देशों की गरीबी कम हुई है। उन देशों की सरकारों ने निजी निवेशकों को आकर्षित किया और उन्हें अर्थव्यवस्था में भागीदारी करने की पूरी छूट दी। नरेंद्र मोदी ने इसी रास्ते पर चलने की कोशिश की है। इस रास्ते की विशेषता यह है कि निजी निवेशकों के आने से रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं, जैसे अपने यहां वर्ष 1991 में नई अर्थनीति लागू करने के बाद हुआ। सो, जो नौजवान सिर्फ सरकारी नौकरी के सपने देखा करते थे, उन्होंने निजी क्षेत्र में कदम रखे और भारत बदलने लगा। सोनिया गांधी ने समाजवाद के नाम पर इस परिवर्तन पर रोक लगाई थी। नरेंद्र मोदी के आने से दिशा दोबारा बदल गई है, राहुल गांधी के तानों के बावजूद।
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'बेटी बचाओ' और 'स्वच्छ भारत' जैसे अभियानों की शुरुआत से सामाजिक क्षेत्र में भी नई दिशाएं दिखती हैं। बेशक इन क्षेत्रों में समस्या गंभीर है और रास्ता भी लंबा है, लेकिन देश उस तरफ चलने तो लगा है। नरेंद्र मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि हमारे गंदे-बेहाल शहरों-महानगरों में परिवर्तन लाने की सख्त जरूरत है। नतीजतन देहातों में भी मॉडल गांव बनाने की बातें हुई हैं और शौचालयों का निर्माण शुरू हुआ है। सो, देश में हर तरह का परिवर्तन आने लगा है, लेकिन चूंकि हम उलझे रहे हैं हिंदुत्व और गोहत्या जैसे मसलों में, इसलिए हमने परिवर्तन पर उतना ध्यान नहीं दिया, जितना देना चाहिए था।

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