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गए पूत दक्खिन
मूलचंद गौतम
Updated Sun, 06 Jul 2014 05:34 PM IST
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क्रोनी कैपिटलिज्म ने रामलाल की नींद हराम कर रखी है। वह अम्मा की सलाह पर कभी दक्षिण दिशा में पैर करके भी नहीं सोए। अगस्त्य मुनि ने इसीलिए उत्तर-दक्षिण के बीच विंध्याचल खड़ा किया था कि दोनों तरफ आवाजाही बंद रहे। लेकिन बुरा हो इस आईटी-सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री का कि रामलाल को न चाहते हुए भी दक्षिण की ओर जाना पड़ा। भारत की सिलिकॉन वैली में रहते हुए भी वह कभी दक्षिण की भाषा संस्कृति में रम नहीं पाए। अलबत्ता मजबूरी में इडली-डोसा जरूर भकोसते रहे।
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रामलाल अंग्रेजी के सीमेंट में ही भारत की मजबूती देखते रहे हैं। उन्हें लगता है कि यही सीमेंट और फेवीकॉल देश को एकजुट रख सकता है। देसी भाषा-बोलियों का गारा तो एक बरसात भी नहीं झेल पाएगा। हिंदी साम्राज्यवाद का डर दक्षिण में अंग्रेजी को मजबूत करता रहा है और हिंदी क्षेत्र बिना अंग्रेजी के गोबर पट्टी होने को मजबूर है। राष्ट्रीय एकता का यह भाषायी वैविध्य तमाम भारतीयों को एक दूसरे से अपरिचित और अनजान बनाए रखने की औपनिवेशिक साजिश है क्या?
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रामलाल आजकल परेशान हैं कि उन्हें खुलेआम दक्षिणपंथी कहा जा रहा है, जबकि दक्षिणपंथी कहलाना किसी गाली से कम नहीं है। वाममार्गी होना तो और भी निकृष्ट धारणा रही है-पंचमकार सेवी। मजदूर संघों के अनुभवी और किसी संघ को नहीं जानते। संघे शक्ति कलौयुगे का मतलब कौन-सा संघ था, यह उन्हें अब समझ में आया है। इसीलिए अब वह संघ शरणम हो गए हैं। संघी लेखकों ने भी उन्हें सहर्ष अपना लिया है। अब उन्हें आगे के संघ के बजाय पीछे के संघ में शुभ-लाभ दिखने लगा है। मार्क्स-लेनिन की जगह लक्ष्मी-गणेश ने ले ली है।
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रामलाल की अम्मा उन्हें कभी दक्षिण दिशा में पैर करके सोने नहीं देती थी, क्योंकि यह मृत्यु की दिशा है। जब वह नौकरी करने दक्षिण दिशा में गए, तो उन्होंने लंबी सांस लेकर अपने आगामी दुखद भविष्य को देख लिया था। अब जब वह दक्षिणपंथी हो गए हैं, तब तो विनाश अवश्यंभावी है, जिसे दैव भी नहीं टाल सकता।