दिलों को जीतने की चुनौती
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अंतिम विश्लेषण के तौर पर देखें, तो साफ है कि इन चुनावों पर राष्ट्रीय स्तर का केवल एक ही मुद्दा छाया रहा, और वह थे, खुद नरेंद्र मोदी। हालांकि विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों के स्थानीय मुद्दे बेशक थे, मगर इन सब पर हावी रही मोदी की कद्दावर शख्सियत। उनको मिले इस जनादेश की सबसे खास बात यह रही कि यह उन्हें अपनी शर्तों पर हासिल हुआ है। सितंबर, 2011 में आरंभ किए गए 'सद्भावना' कार्यक्रम से शुरू हुए उनके पूरे चुनावी अभियान को उन्होंने बगैर किसी समझौते के अपनी तरह से आगे बढ़ाया। दिसंबर, 2012 तक चलने वाले इस अभियान के पहले चरण में लगातार तीसरी बार गुजरात विधानसभा चुनाव में कामयाबी हासिल करने के बाद भी उन्होंने काम करने की अपनी शैली नहीं बदली। हालांकि यह तर्क दिया जा रहा था कि विधानसभा चुनावों के बाद गठबंधन सहयोगियों की भावी जरूरत के मद्देनजर वह अपना रुख कुछ नरम करेंगे। पर उन्होंने ऐसा नहीं किया।
दरअसल मोदी को अपनी कामयाबी पर पूरा भरोसा था। संघ परिवार के भीतर उन्होंने कभी अपना रुख समझौतावादी नहीं रखा। और दिसंबर, 2012 से सितंबर, 2013 के बीच उन्होंने नेतृत्व पर भी अपनी पकड़ मजबूत कर ली। हालांकि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होने की घोषणा के तुरंत बाद पार्टी ने जब अपने सबसे बड़े सहयोगी जद (यू) को खो दिया था, तो उस वक्त ऐसा लगा था कि ज्यादा सहयोगियों की तलाश में मोदी थोड़े लचीले बनेंगे। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। इस जीत की कहानी का सबसे अहम पहलू उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में भाजपा को मिली जबर्दस्त कामयाबी है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश में भी पार्टी का संतोषजनक प्रदर्शन भी महत्वपूर्ण है। भाजपा की इस जीत में मोदी की करिश्माई लोकप्रियता के अलावा जिस कुशल ढंग से संघ की विभिन्न इकाइयों ने काम किया, वह भी काबिले गौर है। मजबूत नेतृत्व को ढूंढ रहे मतदाता को नरेंद्र मोदी ने अपनी छवि के जरिये उम्मीद का आईना दिखाया, वहीं संघ परिवार ने मोदी ब्रांड को लोगों तक पहुंचाने का काम किया।
इसके अलावा भाजपा ने जिस ढंग से युवा मतदाताओं तक अपनी पहुंच बनाई, वह उसकी अद्भुत कामयाबी का सबसे अहम पहलू है। इसके साथ ही जिस तरह से भाजपा ने दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों तक अपनी पहुंच बनाई है, उससे मोदी की देशव्यापी छवि का पता चलता है। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी को मिली जीत के बाद अब तक कोई भी नेता इतने राज्यों में इतनी सीटें नहीं जीत पाया है। सच तो यह है कि महज दो वर्ष पहले तक एक बड़े वर्ग की आलोचना का शिकार बनने वाले राज्य स्तर के एक नेता से सफर शुरू करके आज मोदी देश में पिछले दो दशकों से भी ज्यादा समय के दौरान हुए सबसे शक्तिशाली नेता बनकर उभरे हैं।
मगर बड़ा सवाल यह है कि वह कैसे प्रधानमंत्री साबित होंगे। भारतीय राजनीति में देखा गया है कि अतिवादी विचारधारा के नेता भी केंद्र की सत्ता में आते ही अपना रुख कुछ नरम कर देते हैं। गौरतलब है कि मोदी उत्साही राजनीति के बजाय राजनीतिक यथार्थवाद में ज्यादा यकीन करते हैं। ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि वह देश के किसी भी हिस्से में अशांति नहीं फैलने देंगे।
आखिर मोदी को यह जनादेश कैसे मिला? यह जीत दरअसल चालाकी के साथ हिंदुत्व और विकास के मुद्दे के सामंजस्य से मिली है। उन्होंने हिंदुत्व के मुद्दे को विकास, सुशासन, अर्थव्यवस्था को मजबूती देने, भ्रष्टाचार को मिटाने और ज्यादा रोजगार सृजन के वायदों के साथ जोड़ा। मगर मोदी की छवि को लेकर मुस्लिमों की चिंता का जवाब केवल मोदी के पास ही है। अच्छा तो यह होगा कि वह मुस्लिमों समेत समाज के हर उस तबके तक पहुंचने की कोशिश करें, जो खुले या छिपे तौर पर उनकी नीतियों से भयभीत हैं। यह कैसे होगा, इसका फैसला तो मोदी ही करेंगे। मगर यह जरूर है कि चुनावी जीत के बाद अब उनके लिए दिलों को जीतने की चुनौती है।