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छवि से बाहर निकलने की चुनौती

Sun, 15 Sep 2013 07:15 PM IST
कमर वहीद नकवी
कमर वहीद नकवी Updated Sun, 15 Sep 2013 07:15 PM IST
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challenges of modi with own image

हरा समंदर, गोपी चंदर, बोल मेरी मछली कितना पानी। जुमे का दिन हो, कुरता भगवा के बजाय हरा हो और भाजपा में एक 'हिंदू राष्ट्रवादी' का राजतिलक हो रहा हो! है न कुछ अटपटा! ममता बनर्जी भी जुमे को मुख्यमंत्री पद की शपथ लें और नरेंद्र मोदी भी पार्टी में अपनी ताजपोशी के लिए जुमे का दिन ही चुनें, कुरता भी हरियाला हो जाए, जनसभाओं में बुर्कों और जालीदार गोल टोपियों की नुमाइश लगाई जाए, तो बेचारी मछली को पानी की थाह तो लेनी ही पड़ेगी!

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'धर्मनिरपेक्षता के बुर्के' से शुरू होकर अपनी सभाओं में 'खरीदे गए बुर्कों की छटा बिखेरने' तक नमोरथ को अपना मनोरथ पाने के लिए अभी न जाने क्या-क्या फट्टे-फच्चर कहां-कहां जुगाड़ने-उखाड़ने, काटने-पीटने और ठोकने-ठाकने पड़ेंगे, जाने कितने मुखौटे बदलने पड़ेंगे, जाने किस-किस रंग के कुर्ते पहनने पड़ेंगे! लेकिन फिलहाल तो सबसे बड़ा फच्चर हत्थे से उखड़ गया। पार्टी में अब कोई और 'वाणी' नहीं बची है। बस अब नमोराज है, नमोजाप है, नमोनाम है।
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ठीक है कि संघ की नमो-स्थापना अंततः निर्विघ्न संपन्न हो गई और पार्टी के सारे 'अ-सुरों' को आखिर सुर में सुर मिलाकर नमो राग गाना पड़ा। यह मजबूरी के चने थे, जो सबको चबाने पड़े। लेकिन ऐसे बेढंगे चने अक्सर आसानी से हजम नहीं होते और कई बार कई-कई दिनों तक पेट में गड़ते रहते हैं। इसलिए चक्रव्यूह का पहला चक्र भेद चुकने के बाद अब नमो को सबसे पहले अपनी पार्टी के कई नेताओं के बिगड़े हाजमे की तरफ ध्यान देना होगा।
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समस्या यह है कि बीमारों की यह लाइन जरूरत से कुछ ज्यादा ही लंबी नजर आ रही है। इनमें कुछ बोले बीमार हैं, जिन्हें दुनिया जानती है, तो बहुत-से अबोले बीमार भी हैं, जिन्हें कोई नहीं जानता। इतने बीमारों का इलाज कैसे होगा, यह मोदी की सबसे बड़ी चुनौती होगी। यानी मोदी अंदर भी लड़ेंगे और बाहर भी। अंदर पार्टी में और बाहर चुनावी प्रतिद्वंद्वियों से। पार्टी ऊपर से लेकर नीचे तक साफ-साफ दो हिस्सों में बंटी हुई है। एक वे लोग हैं, जो मोदी के साथ हैं और दूसरे वे, जो महज तस्वीरों में साथ दिख रहे हैं।

मोदी के सबसे बड़े दुश्मन मोदी ही हैं। मोदी यानी उनकी छवि। वही उनकी सबसे बड़ी दुश्मन है, जो न पार्टी के भीतर उनका पीछा छोड़ती है और न पार्टी के बाहर! यह बात विचित्र लगती है कि मोदी की छवि और उनका गुजरात मॉडल ही उनका सबसे बड़ा हथियार भी है और उनका सबसे बड़ा शत्रु भी। उनकी छवि के कई रूप हैं, एक जिसे वह खूब बढ़-चढ़कर और अक्सर राई का पहाड़ बनाकर प्रचारित करते हैं। वही विकास, गवर्नेंस, दृढ़ नेतृत्व, त्वरित निर्णय आदि-आदि।

उनकी दूसरी छवि बुलडोजर की है। गुजरात में भाजपा मोदी से ही शुरू होती है और मोदी पर ही खत्म होती है। वहां पार्टी के सारे दिग्गज नेताओं को वह भूतपूर्व बना चुके हैं। ऐसे में दिल्ली और दूसरे प्रदेशों में भाजपा के दिग्गज महारथियों को मोदी का दिल्ली आक्रमण भला कैसे सुहाए? सबको पता है कि अगर मोदी अपने मिशन पीएम में कामयाब हो गए, तो भाजपा का गुजरात मॉडल देर-सबेर दिल्ली और बाकी इलाकों में भी लागू होगा और शायद भूतपूर्व वाली तख्तियों की संख्या अभूतपूर्व ढंग से बढ़ जाए।

इसी बुलडोजर छवि के साथ तीसरी छवि है दंगों की, मुसलमानों को 'सबक' सिखा देनेवाले एक 'हिंदू राष्ट्रवादी' मुख्यमंत्री की। हालांकि मोदी ने हाल में खुद ही घोषित किया कि वह 'हिंदू राष्ट्रवादी' हैं और उनके समर्थकों ने देश भर में पोस्टर लगाकर इस ऐलान को गर्व से प्रचारित किया।

वैसे मोदी यह न करते, तो भी किसी को उनके 'हिंदू राष्ट्रवादी' होने में कभी कोई संदेह नहीं रहा, न तो उनके समर्थकों को और न ही उनके विरोधियों को। कुछ लोग हैरान हैं कि मोदी को अपने आपको नए सिरे से 'हिंदू राष्ट्रवादी' के तौर पर स्थापित करने की ज़रूरत क्यों पड़ी? खासकर तब, जब अपनी मुस्लिम-विरोधी छवि की 'ड्राई क्लीनिंग' भी उनकी रणनीति के लिए जरूरी हो।

है न जबर्दस्त विरोधाभास! एक तरफ 'हिंदू राष्ट्रवाद' का पोस्टर ब्वॉय, दूसरी तरफ सभाओं में बड़ी मशक्कत करके बुर्केवालियों और टोपीवालों की मजमेबाजी। मोदी को मालूम है कि उन्हें अपनी मुस्लिम विरोधी छवि कितनी धोनी है। बस जरा-सी। या यों कहें कि धोनी नहीं, बल्कि उस पर कहीं-कहीं यह मुलम्मा चढ़ाना है कि मुसलमानों को मोदी से अब वैसा परहेज नहीं रहा।

दूसरी बात यह कि चुनाव बाद जरूरत हो, तो कुछ नए सहयोगियों के लिए मोदी से हाथ मिलाने का, आंखों की शर्म छिपाने का कोई रत्ती भर बहाना तो हो। इसलिए मोदी 'सेक्यूलर' हुए बिना सावधानी से मुसलमानों का जमावड़ा भी लगाते हैं और खुद को 'हिंदू राष्ट्रवादी' भी घोषित करते हैं, ताकि उनको लेकर हो रहा ध्रुवीकरण चलता और बढ़ता रहे।

अचरज की बात है कि नमोरथ की यात्रा में अड़ंगा डाल रहे भाजपा के तमाम नेताओं का तर्क यही था कि मोदी के नाम की घोषणा से ध्रुवीकरण होगा। लेकिन शायद संघ की नई रणनीति है कि ध्रुवीकरण हो।


संघ को लगता है कि मोदी के जरिये अगर 2014 में निशाना लग गया, तो लग गया, वरना इस बहाने वह भाजपा का पूरा चेहरा-मोहरा बदल कर हिंदुत्व के नए संस्करण को देश की राजनीति में उतार सकता है, जो मंदिर आंदोलन जैसी भदेस बैसाखियों पर न टिका हो, बल्कि विकास, कॉरपोरेट ग्रोथ, इंडिया स्टोरी जैसे चमकदार चांदी वर्क में लपेटा हुआ बीड़ा हो। चुनाव तो 2014 के बाद भी आएंगे। संघ इंतजार कर लेगा। तब तक हरा समंदर, गोपी चंदर, बोल मेरी मछली कितना पानी!

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