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आखिरी मील की चुनौतियां

Fri, 02 May 2014 02:16 AM IST
तरुण विजय
तरुण विजय Updated Fri, 02 May 2014 02:16 AM IST
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Challenges of last miles

किसी भी यात्रा का आखिरी मील सर्वाधिक तनाव और चुनौतियों से भरा होता है। लंबा सफर तय करना आसान लगता है, लेकिन जब लक्ष्य पहुंच के करीब हो, तो वह छोटी यात्रा अधिक खतरों भरी हो जाती है। अब जबकि माना जाता है कि प्रधानमंत्री पद की शपथ के लिए राष्ट्रपति भवन की सीढ़ियां चढ़ने में नरेंद्र मोदी के लिए 15 दिन से कम का वक्त रह गया है, तो ये दो आखिरी चुनावी दौर अचानक आखिरी कोशिशों की छटपटाहट दिखाने लगे हैं। गाली-गलौज, अपशब्द, अभद्रता, तीखे तेजाबी कटाक्ष बढ़ गए हैं, और जो नेता हमेशा अपने अहंकार तथा त्योरियां चढ़ाकर बात करने के लिए जाने जाते रहे हैं, वे विनम्रता की प्रतिमूर्ति बनकर बता रहे हैं कि आम जनता के लिए उनके दिल में हमेशा से कितना दर्द रहा है।

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लेकिन सबसे रोचक पक्ष उन सेक्यूलरों का है, जो अब देश में धर्मनिरपेक्षता की तथाकथित आखिरी आशा बचाने के नाम पर घोर सांप्रदायिक एवं जातिवादी लामबंदी में जुट गए हैं। अब सेक्यूलर होने का अर्थ यह सामने आया है कि मुसलमानों से कहा जाए कि वे थोड़ा कॉम्यूनल हो जाएं और जत्थाबंद होकर किसी पार्टी की नीतियों या कार्यक्रमों के आधार पर नहीं, बल्कि उस एक व्यक्ति के विरुद्ध वोट डालें, जो उनकी निगाह में उनकी धर्मनिरपेक्षता का सबसे बड़ा शत्रु हो गया है। दुनिया में शायद भारत ही ऐसा देश होगा, जहां घनघोर सांप्रदायिक लोगों तथा मजहबी नेताओं से राजनीतिक समर्थन मांगना धर्मनिरपेक्षता का प्रमाणपत्र मान लिया जाता है।
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इन दिनों विभिन्न समाचारपत्रों और चैनलों पर मुस्लिम मतदाताओं को उकसाने और उन्हें एक व्यक्ति के विरुद्ध वोट डालने के लिए घेरा जा रहा है। मजेदार बात यह है कि ये काम वे लोग कर रहे हैं, जो आज तक धर्मनिरपेक्षता के गद्दीनशीन बने हुए थे। बात-बात पर मोमबत्तियां जलाना, हिंदू आतंकवाद के जुमले गढ़ना, पाकिस्तान से बार-बार अपमानित और रक्तरंजित होते हुए भी ट्रैक-2 डिप्लोमैसी के मायाजाल में कराची, लाहौर और इस्लामाबाद की तरफ अमन की पाखंड यात्राएं करना, अखबार, चैनल और अन्य मीडिया में यह सुनिश्चित करना कि नरेंद्र मोदी और हिंदुत्व समर्थकों के बारे में कुछ भी सकारात्मक न प्रसारित हो, कहीं भी इन हिंदुत्व समर्थकों को राजकीय कार्यक्रमों में या तो आमंत्रित न किया जाए या उन्हें सम्मान न मिले- ऐसा करना जिनकी खासियतें रही हैं, वे अब आखिरी कोशिश के उस भयावह दौर में आ गए हैं, जहां हार से बचने के लिए कुछ भी करना और किसी भी सीमा तक जाना जायज मान लिया जाता है। अब इनके लिए कोई गंदगी-गंदगी नहीं, सांप्रदायिक फिरकापरस्ती अब इनका सेक्यूलर कवच है और पराजय को शालीनता से स्वीकार न करते हुए अभद्रता से अस्वीकार करना इनकी बौखलाहट बताता है।
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पूरा चुनाव एक नेता की जीत-हार का मामला जैसा बना दिया गया है। आर्थिक विकास, भ्रष्टाचार, गरीबी, महिला सशक्तिकरण, सरहद की सुरक्षा और सैनिकों का सम्मान हमारे मुख्य मुद्दे होने चाहिए थे। इनको उठाया भी गया, लेकिन भ्रष्टाचार, महंगाई और आर्थिक विकास की स्थिति पर चर्चा से कतराकर हिंदू-मुस्लिम तथा गुजरात के दंगों पर राष्ट्रीय बहस को घसीट लाने से किसे राहत मिली और किसे लाभ हुआ?

प्रियंका गांधी के लिए भारत और विश्व परिवार तक ही सीमित है। वरना वह राहुल के अलावा किसी और कांग्रेसी नेता के लिए चुनाव प्रचार के लिए क्यों नहीं गईं? वह बार-बार कहती हैं, और बड़ी भ्रदता और परिपक्वता से अपनी बात रखती हैं, कि कभी मेरे पिता की आलोचना की जाती है, तो कभी मेरे भाई की। पर वह कांग्रेस द्वारा नरेंद्र मोदी के विरुद्ध छेड़े गए घटिया व्यक्तिगत आक्रमण पर खामोश रहती हैं। शुरुआत किसने की थी? जहर की खेती, नपुंसक, हिटलर जैसे शब्द किसने इस्तेमाल किए थे?

यह उस प्रभुताशाली अति धनिक वर्ग की मानसिकता है, जो दूसरों की आलोचना करना अपना हक मानता है, लेकिन अपनी आलोचना करने वालों को देश का दुश्मन बना देता है। इनके लिए इनका अस्तित्व देश के अस्तित्व से बड़ा होता है। दूसरों की बात छोड़ दीजिए। कांग्रेस के जो सबसे सफल गैरखानदानी प्रधानमंत्री हुए, जिन्होंने आर्थिक सुधारों की शुरुआत की, उन नरसिंह राव को चुनाव प्रचार में एक बार भी याद नहीं किया गया और न ही उनके आर्थिक सुधारों की मनमोहन सिंह ने चर्चा की। यानी जो खानदान का नहीं, वह सफल होते हुए भी इनका नहीं हो सकता। लोकतंत्र भद्रता का संविधान है, अराजक अपशब्दों का अपशगुन नहीं। जिसे अपनी शक्ति पर भरोसा है, वह कभी दूसरों पर घटिया वार नहीं करेगा। शत्रु के विरुद्ध ओछे शब्दों का उपयोग नहीं करेगा। जो अटल जी की पाठशाला में पढ़े हैं, वे यह जानते हैं।

आज नरेंद्र मोदी चुनाव के पहले ही इसलिए जीते हुए लगते हैं, क्योंकि उनकी बातों से जनता को भरोसा मिलता है। पाकिस्तान भी उनकी बातों से बौखलाया हुआ है, क्योंकि उसे लगता है कि मोदी वाली दिल्ली दबकर समझौता नहीं करेगी। पहली बार किसी नेता ने चीन और पाकिस्तान, दोनों को चेतावनी देने की हिम्मत दिखाई है। पहली बार किसी ने कश्मीर के हिंदुओं पर सांप्रदायिक अत्याचार की बात उठाई है। और पहली बार किसी नेता के व्यक्तित्व ने चुनावी परिदृश्य को ही अपनी उपस्थिति से बदल दिया है।


अब इस दौर के आखिरी मील का सफर शुरू हो चुका है। यह दौर शब्द-हिंसा के प्रहारों से परे रहे और देश एक नए बदलाव का शालीनता से स्वागत करे, यही भारत की सबसे बड़ी जीत होगी।

(लेखक भाजपा के राज्यसभा सदस्य हैं)

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