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अशांत पाकिस्तान में चुनाव की चुनौती

Tue, 30 Apr 2013 10:02 PM IST
Updated Tue, 30 Apr 2013 10:02 PM IST
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challenges of elections in unrest pakistan

सरबजीत मामले ने पाकिस्तान की जेलों में सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है। लेकिन चुनाव के दौरान जहां पूरे मुल्क में सुरक्षा व्यवस्था की धज्जियां उड़ रही हों, वहां जेल में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना मामूली बात है।

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पाकिस्तान में आम चुनाव 11 मई को होने वाले हैं। चुनाव के दिन नजदीक आने के साथ ही प्रत्याशियों की चुनावी सभाओं पर पाक तालिबान द्वारा बम धमाके तेज होते जा रहे हैं। इन हमलों में कई उम्मीदवारों-कार्यकर्ताओं को जान से हाथ धोना पड़ा है।
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सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में पिछली सरकार में शामिल धर्मनिरपेक्ष अवामी नेशनल पार्टी, मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट यानी एमक्यूएम और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने अपनी चुनावी गति धीमी कर दी है।
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बहरहाल, पंजाब प्रांत में मुस्लिम लीग नवाज और इमरान खान की तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी बड़े-बड़े जलसे-जुलूसों का आयोजन कर रही हैं। बेशक प्रत्याशियों और मतदाताओं की सुरक्षा का मसला बड़ा है, बावजूद इससे जनता चुनाव चाहती है।

तालिबान की मौजूदा हिंसक कार्रवाइयों की दो वजहें हैं। एक तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ होने और देश में इस्लामी कानून लागू करने पर जोर देने के कारण ही आगामी चुनाव को बाधित किया जा रहा है।

तिस पर अवामी नेशनल पार्टी, पीपीपी और एमक्यूएम खासकर निशाने पर हैं, क्योंकि पिछली सरकार में शामिल इन तीनों पार्टियों को अमेरिका का कठपुतली माना जाता है।

अवामी नेशनल पार्टी से तालिबान इसलिए भी नाराज है कि उसने खैबर पख्तूनख्वा और फाटा के इलाके में फौजी कार्रवाई करवाई, जिसमें हजारों निर्दोष लोग मारे गए। सरकार ने प्रांत में जनता की समस्याओं के समाधान के लिए कोई कदम नहीं उठाया।

पाक तालिबान ने अपनी धमकियों पर बड़ी शिद्दत से अमल शुरू किया है। पिछले कुछ दिनों में ऐसे हमलों में 30 से भी अधिक लोग मारे जा चुके हैं और सैकड़ों घायल हुए हैं। एएनपी के नेता मुकर्रम शाह की एक रिमोट कंट्रोल बम के धमाके में की गई हत्या और पेशावर में एएनपी की चुनावी रैली में किया गया आत्मघाती हमला, जिसमें आठ लोग मारे गए, खासकर याद रखने लायक है।

चुनाव आयोग और सरकार ने उम्मीदवारों को सलाह दी है कि वे अपनी चुनावी गतिविधियां चारदीवारी तक ही सीमित रखें और बड़ी सभाएं करने के बजाय घर-घर जाकर वोट मांगें।

बलूचिस्तान में भी उम्मीदवारों व राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ताओं की सुरक्षा का पुख्ता प्रबंध नहीं किया गया। राजनीतिक नेतृत्व कहीं नजर नहीं आ रहा। कार्यवाहक सरकार व खुफिया एजेंसियां विफल साबित हो रही हैं।
 
लगभग सभी बलूच राष्ट्रवादी संगठन चुनाव के खिलाफ हैं। उनका मानना है कि पिछली सरकार ने उनकी मुश्किलें बढ़ाई ही हैं। उनके सैकड़ों अजीजों को खुफिया एजेंसियां उठाकर ले गईं, पर बाद में उनका कोई पता नहीं लगा। वैसे भी बलूच नेशनल फ्रंट व दूसरे बलूच राष्ट्रवादी संगठनों ने चुनाव के खिलाफ पांच से 11 मई तक बलूचिस्तान में हड़ताल करने की घोषणा की है।

सिंध प्रांत की राजधानी कराची, हैदराबाद और अन्य शहर भी पाक तालिबान के निशाने पर हैं। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के हजारों लड़ाके सिंध में दाखिल हो चुके है। पिछले दिनों हैदराबाद शहर में एमक्यूएम के एक उम्मीदवार की हत्या कर दी गई।

विडंबना यह है कि यूरोपीय संघ के चुनाव पर्यवेक्षकों ने भी सुरक्षा कारणों से पाकिस्तान के अशांत कबायली क्षेत्र, खैबर पख्तूनख्वा प्रांत व उग्रवाद प्रभावित बलूचिस्तान में जाने से अपनी असमर्थता जताई है। अभी तक यह भी तय नहीं हुआ कि चुनाव बूथों पर सेना तैनात होगी या नहीं।

बल्कि परवेज मुशर्रफ के साथ हो रहे सुलूक पर सेनाधिकारियों ने जिस तरह नाराजगी जताई है और सेना की बदनामी के लिए राजनेताओं को जिम्मेदार ठहराया है, उसके बाद आगामी चुनाव में सेना के सहयोग की बहुत अपेक्षा शायद ही की जा सकती है।


अगर सुरक्षा का समुचित इंतजाम न किया गया, तो उम्मीदवारों के लिए तो चुनावी मुहिम चलाना मुश्किल होगा ही, मतदाता भी डर के कारण घर से बाहर नहीं निकलेंगे। वर्ष 1970 के बाद पाकिस्तान में पहली बार मतदाता सूची तैयार की गई है, लेकिन सुरक्षा के अभाव में सारे किए-कराए पर पानी फिर सकता है।

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