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नए पोप की चुनौतियां
Updated Thu, 14 Mar 2013 10:01 PM IST
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अपने देश में धर्मनिरपेक्षता वाली बहस जितने पाखंड के साथ जारी है, उसे देखते यह नहीं लगता कि नए पोप के चुनाव का ‘अर्थ’ या समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर इसके असर की कोई चर्चा भारत में होगी। खतरा तो यह है कि इस विषय पर कोई भी टिप्पणी अभद्र अथवा अल्पसंख्यक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली कहकर खारिज की जा सकती है।
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जिस तरह की प्रतिक्रिया पश्चिम के ईसाई बहुल जनसंख्या वाले देशों के मीडिया में मुखर हो रही है, उनसे पता चलता है कि वास्तव में आधुनिक जनतंत्र नागरिक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कितनी अहमियत देता है।
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आज ‘सेक्यूलर’ नामक जिस शब्द का अनुवाद धर्मनिरपेक्षता या पंथ निरपेक्षता के रूप में कर हम अपना काम चलाने की कोशिश करते हैं, वह पश्चिमी यूरोप में राजसत्ता और चर्च के बीच संघर्ष से उपजा विचार है, जिसका सीधा-सच्चा मर्म है, सार्वजनिक जीवन से धर्म का विस्थापन। इसे स्वीकार करने के बाद सांप्रदायिक आधार पर आस्था-विश्वास का कोई स्थान राजनीति में नहीं रह जाता।
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याद रहे यह उपलब्धि अनायास, शांतिपूर्ण परामर्श के बाद सर्वसहमति पर आधारित सामाजिक अनुबंध की नहीं- हिंसक सैनिक मुठभेड़ों के बाद हाथ लगी है। पहले रोमन कैथौलिक संप्रदाय और प्रोटेस्टेंट संप्रदाय के अनुयाइयों ने ईसाई धर्माधिकारियों की फूट का लाभ उठाने का मौका महत्वाकांक्षी शासकों को दिया, बाद में उपनिवेशवादी साम्राज्यवाद के प्रसार वाले युग में यह भिड़ंत कुछ समय के लिए शिथिल, स्थगित-सी होती लगी।
मध्यकाल में कट्टरपंथी इस्लाम तथा कट्टरपंथी ईसाइयत के बीच लड़े जिन धर्मयुद्धों को क्रूसेड का नाम दिया जाता है और जिनकी अनुगूंज 21वीं सदी में साफ सुनी जा रही है, वह भी मानव मात्र को प्रेम तथा शांति का संदेश देने वाले असहिष्णु सांसारिक सत्ता लोलुपों के मजहबी दावेदारों की कलई खोलते हैं।
औद्योगिक क्रांति तथा वैज्ञानिक आविष्कारों ने निरंतर चर्च की महिमा का क्षय किया, भले ही रोमन कैथोलिक चर्च ने लगातार अपने वर्चस्व को बरकरार रखने के लिए लड़ाई जारी रखी। रूढ़ियों को, अंधभक्ति तथा अंधविश्वासी मान्यता को चुनौती देने वाले या असहमति का स्वर मुखर करने वालों का बर्बरता से दमन किया गया। विरोधियों को जिंदा जला देने वाले ‘इनक्वीजिशन’ का क्रूर अध्याय इसी इतिहास का अभिन्न हिस्सा है।
गैलीलियो की बात भूल भी जाएं, तो यह बिसराना कठिन है कि डॉर्विन तक को अपने विकासवादी सिद्धांत के प्रतिपादन के समय कैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। जिस ईशनिंदा के ‘अपराध’ के लिए मृत्युदंड निर्धारित कर आज पाकिस्तान बदनाम है, उसकी प्राण प्रतिष्ठा भी मूलतः रोमन कैथोलिक चर्च ने ही की थी।
स्वेच्छा से मृत्यु का वरण हो, विवाह विच्छेद, गर्भपात अथवा समलैंगिकता को सहज भाव से स्वीकार करना, स्टेम सेल शोध हो, महिला पुरोहितों-धर्माधिकारियों की नियुक्ति, इन सभी संवेदनशील मुद्दों पर रोमन कैथोलिक चर्च के अनुयायी पोप के आदेशों को मानने को बाध्य हैं।
यदि ऐसा नहीं करते, तो धर्मच्युत-बहिष्कृत किए जा सकते हैं। मृत्यु की वेला में पाप से मुक्ति दिलाने वाले आशीर्वचन-क्षमादायिनी कृपाभिषेक से वंचित हो जाते हैं। अनेक धर्मभीरु राजनेता या पेशेवर वैज्ञानिक भी यह जोखिम उठाने से कतराते हैं। पोप को किसी राजनेता से कम शक्तिमान समझने की भूल घातक हो सकती है।
इस सिलसिले में अक्सर वह किस्सा याद दिलाया जाता है, जब द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान स्टालिन ने रोम पर कब्जा करने के पहले पूछा था कि वेटिकन के सिंहासन पर विराजमान पोप के पास कितनी बटालियन सेना है? पोप को कभी निजी सैन्य शक्ति की जरूरत नहीं महसूस होती। आज जिसे ‘सॉफ्ट पावर’ कहते हैं, यह उसी का कमाल रहा है। हिटलर या स्टालिन जैसे तानाशाह के सामने कुछ समय के लिए वह लाचार रहे हों, आमतौर पर उनकी प्रभुसत्ता को प्रभु अक्षत रखता है!
21वीं सदी की जिंदगी की असलियत से साक्षात्कार करने का विकट दबाव आज रोमन कैथोलिक चर्च पर है। जितने विवादास्पद मुद्दे ऊपर गिनाए गए हैं, उनके बारे में किसी भी पोप की निजी राय-मान्यता का बहुसंख्यक रोमन कैथोलिक आबादी के जनमत पर प्रभाव अवश्यंभावी है। अमेरिका, फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल, कहीं भी नीति-निर्धारक इसे अनदेखा नहीं कर सकता।
नए पोप फ्रांसिस की राजनीतिक सोच के बारे में अटकलबाजी शुरू हो चुकी है। उनकी जन्मभूमि अर्जेंटीना है, जहां पिछले चार दशक से उत्पीड़क तानाशाही का दिखावटी प्रतिरोध करने का लांछन उन पर लगाया जाता है। अपने पूर्ववर्ती की तुलना में, जो किशोरावस्था में नाजी युवा दस्ते के सदस्य रहे थे, भले ही वह उदार दिखलाई देते हैं, उनसे यह उम्मीद करना तर्कसंगत नहीं है कि वह किसी विवादास्पद मसले पर नई रचनात्मक पहल करेंगे।
समलैंगिकता के विषय में इसे अप्राकृतिक पापाचार मानने वाले उनके चर्च पर खुद किशोरों के यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए जाते रहे, जिनकी पुष्टि एक वरिष्ठ कार्डिनल के इस्तीफे के बाद आत्म-स्वीकृति से हो चुकी है। धर्मांतरण में वेटिकन की परोक्ष सहमति और पोषण धर्मनिरपेक्ष लोगों के लिए चिंता का विषय है।
किसी भक्त को संत की पदवी देने का अधिकार भी राजनीतिक अवसरवाद से मुक्त नहीं कहा जा सकता। नए पोप के चुनाव के बाद ब्राजील के उन मायूस भक्तों की टिप्पणी रोचक है, जो सोचते थे कि इस बार पोप उनके देश का होगा, ‘पोप अर्जेंटीना का सही, ईश्वर तो ब्राजील का ही है!’ इस बहाने यदि हम अंतरराष्ट्रीय जगत में धर्म तथा राजनीति के रिश्तों की तटस्थ पड़ताल शुरू करें, तभी यह समाचार किसी काम का होगा।