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चुनौती: प्लास्टिक मुक्त हों भी... तो कैसे, असल जिम्मेदारी है हम सबकी
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प्लास्टिक प्रदूषण
- फोटो :
अमर उजाला/एजेंसी
विस्तार
प्लास्टिक की स्थिति इस दुनिया में ठीक वैसी ही है, जैसे एक गरीब व्यक्ति की-जो हमारे कई काम आता है, लेकिन जब उससे कोई गलती हो जाती है, तो उसमें हमें सारी बुराइयां दिखाई देने लगती हैं। यही हाल प्लास्टिक का भी है-पूरी दुनिया में ऐसा कौन है, जिसने पिछले 30 वर्षों में प्लास्टिक का उपयोग न किया हो? कोई गांव, घर, गली, कस्बा या शहर ऐसा नहीं है, जो प्लास्टिक के उपयोग से वंचित हो। किसी न किसी रूप में प्लास्टिक हमारे जीवन का हिस्सा बन गया है।
असल में यह एक ऐसी चीज है, जो अब मनुष्य के गले पड़ चुकी है। सीधे शब्दों में कहें, तो आज भी, जब प्लास्टिक विरोधी तमाम नियम और कानून लागू हो चुके हैं, यह हमारे रोजमर्रा के जीवन में बना हुआ है। सब्जी, फल या फिर किराना दुकान में सामान खरीदते समय हम प्लास्टिक की थैली की अपेक्षा करते हैं, खरीदारी करने के लिए जूट या कपड़े के झोले का इस्तेमाल करना हमने छोड़ दिया है। इस तरह प्लास्टिक की थैली का उपयोग करके हम इस प्लास्टिक के प्रसार को और बढ़ावा देने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।
आज के संदर्भ में देखें, तो प्लास्टिक ने हमारे जीवन में इतनी गहराई से अपनी जगह बना ली है कि अब इससे मुक्त होने की कल्पना करना भी मुश्किल है। घर और बाहर के कामों में तो यह पहले से मौजूद है ही, लेकिन अब खेती-बाड़ी से लेकर उद्योगों में-हर जगह इसका उपयोग होता है। वैसे हम इसके कुप्रभावों को जानते हैं, फिर भी इसके बिना हमारा काम नहीं चलता। जब भी प्लास्टिक की बात होती है, तो सभी एक सुर में इसका विरोध करते हैं और इसकी निंदा करते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि हमने इसे अब तक गंभीरता से नहीं लिया है।
आज भी हालात ये हैं कि न चाहकर भी, कई वजहों से प्लास्टिक हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता बना हुआ है। यही कारण है कि बार-बार प्रतिबंध लगने और सरकारी नियम-कानून होने के बावजूद प्लास्टिक का उपयोग सबसे ज्यादा और सर्वोपरि बना हुआ है।
प्लास्टिक को दो दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है-एक तरफ, यह हमारे जीवन में कई रूपों में वरदान है। इसके कारण हम अपनी रोजमर्रा की सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं। दूसरी तरफ, जब भी प्लास्टिक का उपयोग बंद करने की बात होती है, तो रोजगार और स्वरोजगार की बात सामने आती है, जिसे हम नजर अंदाज नहीं कर सकते।
सरकारों का मानना है कि इससे मुक्त हुआ जाए। लेकिन जब आम लोग खुद ही इससे मुक्त होना नहीं चाहते, तो सरकारें इसे कैसे खत्म कर पाएंगी? यही हो रहा है-क्योंकि देश और दुनिया में प्लास्टिक उद्योग रोजगार का एक बहुत बड़ा साधन है। अगर इस उद्योग को बंद कर दिया जाए, तो लाखों लोग बेरोजगार हो जाएंगे। वैज्ञानिक भी प्लास्टिक के नए उपयोग और इसे खत्म करने के रास्ते तलाश रहे हैं, लेकिन वे भी कहीं न कहीं बेरोजगारी का सामना कर सकते हैं।
अब सवाल यह है कि हमारे पास क्या विकल्प हैं? एक तरफ इसके आकर्षक और उपयोगी उत्पाद, जो लकड़ी और लोहे के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं। इसकी मजबूती और टिकाऊपन हमें अपनी तरफ खींचता है। दूसरी ओर, इसका दुरुपयोग सीमाओं को पार कर चुका है। यह अब सिर्फ गाय-भैंस या अन्य जानवरों के पेट में नहीं पहुंचता, बल्कि माइक्रोप्लास्टिक के रूप में मनुष्य के शरीर में भी प्रवेश कर चुका है।
हाल के शोध बताते हैं कि हर व्यक्ति के शरीर में 50,000 से अधिक माइक्रोप्लास्टिक कण पहुंच चुके हैं, जो हमारे दिल, त्वचा और फेफड़ों पर सीधा असर डाल सकते हैं। तो सवाल यह है कि सब कुछ जानते हुए भी आम लोग और नीति-निर्माता मिलकर ऐसा क्या कर रहे हैं, जिससे प्लास्टिक से छुटकारा पाया जा सके। कुछ नहीं, क्योंकि हम अभी गंभीर ही नहीं हैं। हालांकि, प्लास्टिक से पूरी तरह मुक्त होना संभवतः न तो मुमकिन है और न ही व्यावहारिक। लेकिन एक रास्ता जरूर है-सिंगल यूज प्लास्टिक (एकल उपयोग वाली प्लास्टिक) पर नियंत्रण लगाया जाए। इसके लिए सरकार ने कई नियम और कानून बनाए, जुर्माने भी लगाए, लेकिन व्यवहार में कुछ खास असर नहीं पड़ा।
देश में प्लास्टिक के नए-नए प्रयोग और उपयोगों को समर्पित केंद्रीय प्लास्टिक व इंजीनियरिंग संस्थान भी चेन्नई में है, जिसके देश भर में 48 छोटे अनुषांगिक संगठन भी हैं, जो प्लास्टिक पर काम कर रहे हैं। वे मानते हैं कि प्लास्टिक को पूरी तरह से खत्म करना न संभव है और न इसका कोई तात्कालिक समाधान। लेकिन वेस्ट प्लास्टिक (अपशिष्ट प्लास्टिक) का सही उपयोग करके नए उत्पाद बनाए जा सकते हैं, जो टिकाऊ भी होंगे और तुरंत कचरा भी नहीं बनेंगे। इसमें एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक पहलू भी है-जब भी हम प्लास्टिक का उपयोग करें, उसकी प्रवृत्ति यह होनी चाहिए कि वह बार-बार उपयोग में आ सके। इससे प्लास्टिक के उत्पादन पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा और कुछ हद तक अंकुश लग सकेगा।
अब सवाल है-क्या केवल सरकार को दोष देने से समस्या हल होगी या नागरिक के रूप में कुछ जिम्मेदारी हमारी भी बनती है। सरकारें तो केवल नीति और कानून बना सकती हैं, लेकिन असली जिम्मेदारी हम सबकी है। अगर हमारे शरीर में माइक्रोप्लास्टिक कण प्रवेश कर रहे हैं और जीवन संकट में पड़ रहा है, तो हमें खुद कदम उठाने होंगे।
सरकारें नियम ही बना सकती हैं, लेकिन उनका पालन करना हम सबकी जिम्मेदारी है। और अगर सरकार दबाव बनाएगी, तो फिर दूसरे सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दे खड़े हो जाएंगे। लेकिन अगर हम इसी तरह अनदेखी करते रहे, तो इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी खोजों में से एक प्लास्टिक ही हमारे लिए सबसे बड़ा संकट बन जाएगा।