क्षेत्रीय दलों की चुनौती
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अपने देश में आज एक बड़े हिस्से में क्षेत्रीय राजनीति हावी होती जा रही है। राजनीतिक विश्लेषक सुधा पई का ऐसा मानना है कि वर्ष 1990, और विशेष रूप से वर्ष 2000 के बाद क्षेत्रीय दलों का केंद्र पर हावी होना ही नए राजनीतिक चित्र का परिचायक है। ऐसे राज्यों में कमोबेश स्थानीय राजनीति, खंडित राजनीति, माओवादी राजनीति और जाति-उपजाति की राजनीति ही होती रही हैं। लेकिन राष्ट्रीय नेता के रूप में नरेंद्र मोदी के उभार की वजह से अब उन क्षेत्रों में भी राष्ट्रीय राजनीति की चर्चा होने लगी है। हाल के महीनों में नरेंद्र मोदी एक ऐसे राजनेता के रूप में सामने आए हैं, जो राष्ट्रीय नेताओं के साथ-साथ स्थानीय क्षत्रपों को भी कड़ी चुनौती दे रहे हैं।
इसकी वजह स्वाभाविक रूप से गुजरात में उनके विकास कार्यों के साथ ही उनकी वाक्-शैली है। उनकी अधिकतर रैलियां उन स्थानों पर रखी गईं, जहां क्षेत्रीय राजनीति हावी है। वहां उन्होंने अपने भाषणों से यह सवाल उठाया कि 'आइडिया ऑफ इंडिया' कैसे पिरोया जाए; पूरे देश को एक साथ लेकर कैसे चलें। इसका व्यापक प्रभाव पड़ा है। यानी वह क्षेत्रीय राजनीति को सैद्धांतिक तौर पर चुनौती दे रहे हैं। इसे उत्तर प्रदेश के उदाहरण से समझा जा सकता है। अब तक देश के इस सबसे बड़े राज्य में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का ही दबदबा दिख रहा था, जबकि मुसलमान कौमी एकता दल के पाले में जाते दिख रहे थे, लेकिन मोदी के राजनीतिक फॉर्मूले ने यहां के राजनीतिक गणित को बदल दिया है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अटल बिहारी वाजपेयी की तरह नरेंद्र मोदी सर्वस्वीकार्य नेता बन गए हैं। लोकसभा चुनाव से संबंधित लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स के एक शोध के सिलसिले में मुझे दिल्ली के विभिन्न पिछड़े इलाकों में जाने का मौका मिला। यहां कई मुसलमानों की स्पष्ट राय थी कि वे मोदी को वोट नहीं देना चाहते। इसका कारण 2002 का वह गुजरात दंगा है, जिसकी छवि से मोदी अब तक बाहर नहीं निकल सके हैं। लेकिन ऐसे लोगों ने स्पष्ट तौर पर कांग्रेस को वोट दिया हो या देंगे ऐसा भी नहीं, क्योंकि कांग्रेस के खिलाफ अभी एक नकारात्मक माहौल-सा बन गया है, जिससे निकलना देश की इस सबसे पुरानी पार्टी के लिए काफी कठिन-सा लग रहा है। मोदी के प्रति अपनी राय इस तरह स्पष्ट तौर पर जाहिर कर मुसलमान यह धारणा भी पक्की कर रहे हैं कि यह अल्पसंख्यक वर्ग अब निर्भीक होकर अपना प्रतिनिधि चुनेगा। भय की राजनीति की जगह देश में अब चयन की राजनीति हो रही है, जो बड़े बदलाव का सूचक है। यानी लोकसभा चुनाव में मोदी की जीत होगी या नहीं, लेकिन देश का लोकतंत्र जरूर विजयी हो रहा है।
बहरहाल, नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय चुनाव का माहौल बनाने में काफी हद तक सफल रहे हैं। यह तो पहले से ही कहा जा रहा था कि कांग्रेस चुनाव हार रही है, लेकिन अब उसके हार का अंतर और मोदी का प्रधानमंत्री बनना या नहीं बनना ही चुनावी विमर्श हो चला है। इस बहस को भारतीय जनता पार्टी द्वारा उठाए गए हालिया कदम ने आगे बढ़ाया है। जिस तरह भाजपा नए राष्ट्रीय गठबंधन के संकेत दे रही है, उसका दूरगामी प्रभाव पड़ना तय है। एकाध अपवाद को छोड़ दें, तो भाजपा इस बार ऐसे दलों के साथ सीट साझा कर रही है, जिसमें पार्टी के बजाय नेता ज्यादा प्रभावी हैं। मसलन, उदित राज या उपेंद्र कुशवाहा जैसे लोग किसी पार्टी का नहीं, बल्कि जाति का प्रतिनिधित्व करते हैं। लोक जनशक्ति पार्टी जरूर एक दल है; छोटा ही सही, लेकिन इसकी पहचान भी रामविलास पासवान की वजह से ही ज्यादा है। हालांकि भाजपा की यह रणनीति ओडिशा, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में ज्यादा सफल होती नहीं दिख रही है। इन तीन राज्यों में क्रमशः नवीन पटनायक, ममता बनर्जी और जयललिता का ही प्रभाव ज्यादा दिख रहा है। लेकिन तब भी नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के बाद भाजपा कांग्रेस को सीधी चुनौती तो दे ही रही है, क्षेत्रीय दलों से भी स्पष्ट तौर पर दो-दो हाथ कर रही है।
नरेंद्र मोदी के बहाने राष्ट्रीय राजनीति के यों प्रभावी होने से देश में बड़ा लोकतांत्रिक बदलाव होना तय है। आज आम मतदाता यह सोचने को मजबूर हो गया है कि वह क्षेत्रीय दल को अपना मत दे या किसी राष्ट्रीय दल को? वह नहीं चाहता कि उसका वोट बेकार चला जाए। दो राय नहीं कि इसकी एक वजह अन्ना हजारे के नेतृत्व में हुआ भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन है, लेकिन इस बदलाव के वाहक नरेंद्र मोदी भी हैं, जो अपने भाषणों में राष्ट्रीय दलों की पुरजोर वकालत कर रहे हैं। इसमें उनकी मदद मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री क्रमशः शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे, रमन सिंह भी कर रहे हैं, जो राष्ट्रीय राजनीति के नए सृजनहार के रूप में उभरे हैं।
बहरहाल, तमाम दावों के बावजूद अभी यह कहना जल्दबाजी है कि नरेंद्र मोदी देश के अगले प्रधानमंत्री बन रहे हैं। उन्हें कई मोर्चों पर अभी जूझना है। उनके सामने कई बाहरी और आंतरिक चुनौतियां भी हैं। एक तरफ जहां भाजपा के भीतर ही कुछ लोग मोदी को खुले तौर पर स्वीकार करने से हिचक रहे हैं, वहीं यह सवाल भी राजनीतिक विश्लेषकों के सामने है कि स्थानीय क्षत्रपों को अपने साथ मोदी कितना जोड़ पाएंगे। बेशक कई क्षेत्रों में मोदी का 'एकीकृत भारत' का प्रयोग सफल होता दिख रहा है, लेकिन दक्षिण के कई राज्यों में इस प्रयोग को लिटमस टेस्ट पास करना होगा। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश ऐसे ही राज्य हैं, जहां मोदी की परीक्षा अभी बाकी है।