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किस किस को साधेंगे कोइराला
सविता पांडे
Updated Mon, 10 Feb 2014 07:30 PM IST
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नेपाल में लोकतंत्र की जड़ न जम पाने का एक प्रमुख कारण वहां के राजनीतिक दलों का जनता की आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाना है। लोकतंत्र को मजबूत बनाने के बजाय वे आपसी झगड़े में ही उलझे रहे। मौजूदा परिदृश्य भी इससे अलग नहीं है, फिर भी अंततः सुशील कोइराला के प्रधानमंत्री के रूप में पदभार संभालने का रास्ता साफ हो गया है। सबसे बड़ी पार्टी नेपाली कांग्रेस की सदन में 194 सीटें हैं, जबकि यूएमएल के पास 173 सीटें।
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ये दोनों पार्टियां मिलकर 601 सदस्यीय सदन में 367 सीटों के बहुमत का आंकड़ा बनाती हैं। सुशील कोइराला की उम्मीदवारी तभी संभव हुई, जब दोनों बड़ी पार्टियों ने कोइराला के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनाने पर सहमति बनाई। यूएमएल जहां राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति के पद पर फिर चुनाव कराने के लिए सहमत हुई, वहीं नेपाली कांग्रेस यूएमएल को गृह मंत्रालय समेत अहम मंत्रालय देने पर राजी हुई। संभावना है कि यूएमएल के उपाध्यक्ष बामदेव गौतम उप प्रधानमंत्री पद के अलावा गृह मंत्रालय का पदभार भी संभालेंगे।
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जहां तक पार्टी के आंतरिक एवं बाहरी समीकरणों का सवाल है, सरकार की प्रकृति जगजाहिर हैः नेपाली कांग्रेस के संसदीय नेता के चुनाव में कोइराला अपने प्रतिद्वंद्वी शेरबहादुर देउबा से मात्र 16 वोटों के अंतर से जीते हैं, जो भावी राजनीतिक परिदृश्य के उजागर होने पर एक मजबूत ताकत के रूप में उभरेंगे। वहीं माओवादी नेता प्रचंड ने पहले ही विपक्ष में रहने की घोषणा की है।
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नेपाल में लोकतंत्र का रास्ता 28 मई, 2008 को तब साफ हुआ, जब पहली बार नवनिर्वाचित सदन ने घोषणा की कि देश एक धर्मनिरपेक्ष एवं समावेशी लोकतांत्रिक गणराज्य बन गया है। नेपाल की माओवादी पार्टी के नेता प्रचंड देश के प्रधानमंत्री बने। तब से कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन देश का संविधान नहीं बन पाया। 28 मई, 2012 को बाबूराम भट्टराई ने संविधान सभा को भंग कर दिया, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने संविधान सभा का कार्यकाल पांचवीं बार बढ़ाने से मना कर दिया और सभी राजनीतिक दलों को फिर से जनादेश हासिल करने के लिए कहा। यह सांविधानिक संकट 13 मार्च, 2013 को तब खत्म हुआ, जब प्रधान न्यायाधीश खिल राज रेग्मी को सरकार का मुखिया घोषित किया गया।
संविधान सभा पीएलए (पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) को सेना में शामिल करने, राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री के बीच सत्ता बंटवारे और संघवाद (पहचान बनाम संसाधन आधारित) में प्रांतों की संख्या जैसे मुद्दों में उलझकर रह गई थी। इस बार भी लग रहा है कि राजनीति सत्ता के बंटवारे में उलझकर रह जाएगी। कोइराला के सामने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार किए बिना सत्ता के बंटवारे का सवाल तो महत्वपूर्ण है ही, उन्हें यूएमएल की आकांक्षाओं को भी पूरा करना होगा। राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति पद के लिए ताजा चुनाव की मांग के साथ-साथ वे गृह मंत्रालय (उप प्रधानमंत्री पद भी) से कम पर शायद ही संतुष्ट होंगे।
फिर राजशाही समर्थक राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी जैसे दल भी हैं, जिसके मुखिया ने पहले ही कहा है कि वे पहले की तरह सदन के कार्यकाल को बढ़ाने की अनुमति नहीं देंगे। यह एक संकेत है कि अगर तीनों बड़ी पार्टियां सत्ता पर एकाधिकार जमाने की कोशिश करेंगी या उनकी पसंद के मुताबिक संविधान तैयार नहीं करेंगी, तो प्रतिरोध होगा। मधेशियों ने तो अभी अपने पत्ते भी नहीं खोले हैं।
एक वर्ष के भीतर संविधान तैयार करने का लक्ष्य और कोइराला की कार्ययोजना के प्रारंभिक दावे में भी विरोधाभास है- 'सरकार के गठन में संतुलन होना चाहिए और प्रधानमंत्री को संसद के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। माओवादी चाहते हैं कि राष्ट्रपति का चुनाव प्रत्यक्ष (सीधे) हो, लेकिन यह तानाशाही को जन्म देगा।'
संघीय ढांचे के बारे में उनका मानना है कि चार-पांच-छह से ज्यादा प्रांत बनाना आर्थिक रूप से असंभव है, क्योंकि पर्याप्त बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। प्रांतों का निर्माण बहुजातीय होना चाहिए, ताकि किसी भी क्षेत्र में किसी एक समुदाय का वर्चस्व न हो। धर्मनिरपेक्षता के मामले में कोई समझौता नहीं होगा। विवादित मुद्दों को संविधान सभा में वोटों के आधार पर सुलझाया जाएगा। जनमत संग्रह अंतिम विकल्प हो सकता है। प्रसंगवश याद दिला दें कि संसद के भंग होने से पहले मार्च, 2012 में सभी दलों के बीच हुए समझौते में राष्ट्रपति का चुनाव प्रत्यक्ष होने और सांसदों द्वारा प्रधानमंत्री चुनने और 11 प्रांत बनाने पर बात हुई थी।
नेपाली कांग्रेस और यूएमएल गठबंधन एवं यूसीपीएन-एम के बीच का विवाद भी भूलने योग्य नहीं है, खासकर माओवादियों के असंरक्षण के मामले में। यह एक ऐसा मुद्दा है, जिसको लेकर यूसीपीएन-एम असहयोगात्मक रवैया अपना सकती है। यह ऐसी स्थिति होगी, जिसमें शांति प्रक्रिया और संविधान तैयार करना, दोनों असंभव हो जाएगा।
इसके अलावा, प्रधान न्यायाधीश खिल राज रेग्मी का राज्य के तीनों अंगों का मुखिया होना नेपाल के लोकतंत्र के लिए खतरनाक प्रवृत्ति है, क्योंकि न्यायपालिका को प्रभावित करने का उनका अधिकार बरकरार है और उन्हें विशेषाधिकार भी प्राप्त है। कोइराला कभी सरकार में नहीं रहे, लिहाजा यह देखना होगा कि वह कैसे देउबा गुट का समर्थन जुटा पाते हैं। इसके अलावा उन्होंने 'भारत विरोधी' छवि भी अपना ली है। हालांकि चुनाव के बाद उन्होंने चीन के साथ ही भारत से भी अच्छे संबंध बनाए रखने की बात की थी। वस्तुतः नेपाल का भविष्य वहां की आंतरिक राजनीतिक स्थिति और देश को अस्थिरता से बाहर लाने की राजनीतिक दलों की इच्छाशक्ति पर ही निर्भर होगा।