अंतिम यात्रा में भी जातिवाद! आजाद भारत में इस तरह की बैठक की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए
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पंद्रह अगस्त और रक्षाबंधन एक ही दिन पड़ जाने से आजादी और भाईचारा, दोनों को एक साथ मनाने का मौका मिल गया। संयोग से मैं उस दिन तामिलनाडु में थी। 16 अगस्त को, मैं तंजावुर जिले के सेरागुड़ी गांव गई थी। वहां पता चला कि छुआछूत की पीड़ा से मौत के बाद भी छुटकारा नहीं मिल पाता है। इस गांव में अनुसूचित जाति को अपनों की लाश को ‘आम’ रास्ते से ले जाने पर मनाही है।
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पंद्रह अगस्त और रक्षाबंधन एक ही दिन पड़ जाने से आजादी और भाईचारा, दोनों को एक साथ मनाने का मौका मिल गया। संयोग से मैं उस दिन तामिलनाडु में थी। 16 अगस्त को, मैं तंजावुर जिले के सेरागुड़ी गांव गई थी। वहां पता चला कि छुआछूत की पीड़ा से मौत के बाद भी छुटकारा नहीं मिल पाता है। इस गांव में अनुसूचित जाति को अपनों की लाश को ‘आम’ रास्ते से ले जाने पर मनाही है।
इसे लेकर प्रशासन से कई बार शिकायत की गई है। कुछ माह पूर्व प्रशासन ने अनुसूचित जाति और गैर अनुसूचित जाति के लोगों (वानियर, जो एक पिछड़ी जाति है) के साथ बातचीत कर यह फैसला कर दिया कि अब अनुसूचित जाति की लाशों को ‘आम’ रास्तों से ले जाने पर आपत्ति नहीं की जाएगी।
आजाद भारत में इस तरह की बैठक की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए। ‘आम’ रास्ते पर किसी को चलने से कैसे रोका जा सकता है? लेकिन, ‘आम’ का अंग्रेजी अनुवाद है ‘जनरल’, जिसका मतलब बहुत से लोग यह लगाते हैं कि जो कुछ जनरल है वह गैर-अनुसूचित जाति के लिए है। लेकिन बीते 13 अगस्त को अनुसूचित जाति की एक महिला अन्नलक्ष्मी की मौत हो गई।
14 तारीख को शवयात्रा से पहले ही गांव में बड़ी संख्या मे पुलिस और प्रशासन के लोग पहुंच गए। वहीं वानियर लोग अनुसूचित जाति की बस्ती की ओर जाने वाले ‘आम’ रास्ते को रोककर खड़े हो गए। अनुसूचित जाति के लोगों में बेचैनी पैदा हुई। फैसले के बाद भी ऐसा क्यों?
पंद्रह अगस्त को रात करीब एक बजे गांव में फिर पुलिस आई। दो अनुसूचित जाति के और तीन वानियर गिरफ्तार किए गए। उनमें से एक अन्नलक्ष्मी का बेटा ईलियाराज भी था। हालांकि माकपा के हस्तक्षेप पर शाम तक उन्हें छोड़ दिया गया। सेरागुड़ी में अनुसूचित जाति के पास जमीन नहीं है। उनकी बस्ती में केवल चार-पांच घरों में शौचालय है।
घरों की औरतों को वानियर लोगों के खेतों में ही शौच के लिए जाना पड़ता है। उनकी बस्ती में नलकूप भी नहीं है। सारी जमीन वानियर लोगों की है, ऐसे में मजदूरी बेहद कम मिलती है। पुरुष काम की तलाश में केरल जा रहे हैं, क्योंकि वहां उन्हें ज्यादा मजदूरी भी मिलती है और भेदभाव से छुटकारा भी।
फिर एक खबर आई कि तामिलनाडु के वेल्लूर जिले में अनुसूचित जाति के एक पुरुष की लाश को लोग श्मशान ले जा रहे थे। भारी वर्षा के कारण उन्हें गैर अनुसूचित जाति के लोगों के खेतों से जाना पड़ा, तो रोक दिया गया। आखिरकार उन्हें लाश को पुल से नीचे फेंकने के बाद फिर नीचे जाकर उसे उठाकर आगे बढ़ना पड़ा।
हाल ही की खबर है कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत आरक्षण के मुद्दे पर बहस छेड़ना चाहते हैं। उनका पक्ष क्या होगा? क्या ‘आम’ रास्तों या ‘आम’ नौकरियों में आम लोगों के लिए मौजूदा आरक्षण का वह समर्थन करेंगे? या फिर तमाम अधिकारों के छोटे से हिस्से का आरक्षण, जो देश के अनुसूचित जातियों और जनजातियों को प्राप्त है, उसके खात्मे का पक्ष लेंगे? सच्ची आजादी और भाईचारे से जुड़ा है यह प्रश्न।
-लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं।