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मुद्दा: ओबीसी कार्ड का लाभ किसे, पांच राज्यों में होने वाले चुनाव क्या बदलेंगे सियासत की दिशा

Thu, 12 Oct 2023 08:15 AM IST
Vijay Vidrohi विजय विद्रोही
Updated Thu, 12 Oct 2023 08:15 AM IST
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सार
पांच राज्यों में चुनाव का नतीजा देश में ओबीसी की राजनीति की दिशा बदल देगा। इससे हो सकता है कि पूरे देश में ओबीसी सर्वे की मांग उठे।
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caste survey and results of assembly elections in five states will change OBC politics in India
सांकेतिक तस्वीर (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राहुल गांधी के पास क्या गेम चेंजिंग आइडिया आ गया है? भले ही 'इंडिया' गठबंधन के सभी दल जातीय जनगणना के पक्ष में न हों, पर राहुल गांधी इसे मुख्य चुनावी मुद्दा बता रहे हैं। कांग्रेस शासित राज्यों में जातिगत जनगणना की गारंटी दी जा रही है। यहां तक कि महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री ने भी अपने अधिकारियों को बिहार के अधिकारियों से जातिगत जनगणना की प्रक्रिया की जानकारी लेने को कहा है। असम के मुख्यमंत्री सामाजिक-आर्थिक जातिगत जनगणना कराने की घोषणा कर चुके हैं।



ओडिशा में नवीन पटनायक जातिगत सर्वे करवा चुके हैं और पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट का इंतजार है। कर्नाटक में मुख्यमंत्री के पास ओबीसी सर्वे की रिपोर्ट तैयार पड़ी है, जिसे उचित समय में सार्वजनिक करने की बात की जा रही है। आचार संहिता लागू होने से पहले राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जातीय सर्वे की घोषणा तो कर ही चुके हैं, राहुल गांधी की मौजूदगी में ओबीसी का आरक्षण 21 फीसदी से बढ़ाकर 26 करने का एलान भी कर चुके हैं।


अब नीतीश कुमार सरकार की अगली रिपोर्ट का इंतजार हो रहा है। उसमें पता चलेगा कि किस जाति के कितने लोग सरकारी नौकरी में हैं, किस पद पर हैं, निजी क्षेत्र में किस जाति के कितने लोग हैं, कितनों के पास कार-मोटरसाइकिल या साइकिल है और कितनों के पास कितनी जमीन है। इससे यह भी पता चलेगा कि सुशासन बाबू के राज में सामाजिक न्याय की दिशा में कितना काम हुआ, महादलितों, महापिछड़ों और पसमांदा मुस्लिमों की आर्थिक हालत कैसी है? नीतीश कुमार इसे समझ रहे हैं, तभी तो कह रहे हैं कि सर्वे कराने का मकसद राजनीति करना नहीं, बल्कि ओबीसी की वास्तविक संख्या का पता लगाकर उसके हिसाब से विकास की योजनाएं बनाना है।

यही बात राहुल गांधी भी कर रहे हैं। वह समझ रहे हैं कि ओबीसी जनगणना को युवा ओबीसी को मिले रोजगार के मौकों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण से जोड़ना है। पढ़ाई और नौकरी युवा ओबीसी को लंबे समय तक 'इंडिया' से जोड़े रख सकती है। कांग्रेस समझ रही है कि उसे सत्ता में आना है, तो अपने वोट बैंक में भारी-भरकम इजाफा करना है। ऐसा वोट बैंक महापिछड़े ही हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 15 फीसदी ओबीसी वोट, जबकि भाजपा को 44 फीसदी ओबीसी वोट मिला था। यहां तक कि सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले दलों के हिस्से में भी 41 फीसदी ओबीसी वोट ही आया था। जबकि 1996 में भाजपा को 21 फीसदी, सामाजिक न्याय वाले दलों को 54 फीसदी और कांग्रेस को 24 फीसदी ओबीसी वोट मिला था। ये आंकड़े ही बता देते हैं कि क्यों राहुल गांधी से लेकर अखिलेश यादव, लालू प्रसाद और नीतीश कुमार को ओबीसी वोट बैंक में सेंध लगाने की जरूरत है।

इस हिसाब से आगामी दिसंबर से देश में सियासत करने का तरीका बदलने वाला है। अगर कांग्रेस ने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और तेलंगाना में जीत हासिल की, तो ऐसा नरैटिव स्थापित किया जाएगा, जैसे यह ओबीसी वोट की गोलबंदी से हुआ है। वैसी स्थिति में जातीय सर्वे की घोषणा कर दी जाएगी। आगामी जनवरी में जब भाजपा अयोध्या में राम मंदिर का भव्य उद्घाटन समारोह करवा रही होगी, तब 'इंडिया' के भीतर से ओबीसी सर्वे की मांग उठ रही होगी।

बिहार का सर्वे सामने आया, तो प्रधानमंत्री मोदी ने इसे विपक्ष का पाप बताया। मोदी ने अगले दिन गरीब को सबसे बड़ी जाति बताया, तो कांग्रेस पर मुसलमानों का हक छीनने का अजीब-ओ-गरीब आरोप जड़ दिया। इससे पता चलता है कि भाजपा इस मुद्दे पर फिलहाल चौराहे पर खड़ी है। एक रास्ता रोहिणी कमीशन की ओबीसी कोटे को चार श्रेणियों में बांटने की सिफारिश की तरफ जाता है। पर इसके अपने राजनीतिक जोखिम हंै। भाजपा को सवर्णों का भी ध्यान रखना है, जो उसका कोर वोट बैंक है। संघ ने वर्षों की मेहनत के बाद ओबीसी को भाजपा के पक्ष में लाने में सफलता पाई है। दलितों में महादलित और पिछड़ों में महापिछड़ों को लेकर भाजपा नए सिरे से गोलबंदी करने की सोच रही है। अगर ऐसा हुआ, तो देश में नए सिरे से जातीय गोलबंदी होगी और इस सोशल इंजीनियरिंग की गंगा में कौन बचेगा, कौन बह जाएगा, अंदाजा लगाना मुश्किल है।

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