{"_id":"fb568167158b17de3f5dcc0501bdde13","slug":"can-superpower-nation-do-everything","type":"story","status":"publish","title_hn":"क्या महाशक्ति देश कुछ भी कर सकता है?","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
क्या महाशक्ति देश कुछ भी कर सकता है?
भारत डोगरा
Updated Wed, 04 Sep 2013 07:28 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हाल के समय में मध्य पूर्व में मिस्र और सीरिया का गंभीर घटनाक्रम इतना छाया रहा है कि एक अति महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन उपेक्षित ही रह गया। यह खुलासा ईरान में वर्ष 1953 में लोकतांत्रिक सरकार गिराए जाने के बारे में है। इस बहुचर्चित घटना के 60 वर्ष बीत जाने के बाद पिछले महीने अमेरिका ने पहली बार सरकारी तौर पर स्वीकार किया कि ईरान की उस लोकतांत्रिक सरकार को हटाने में उसकी गुप्तचर एजेंसी सीआईए ने मुख्य भूमिका अदा की थी।
विज्ञापन
ऐसा नहीं है कि यह कोई नया रहस्योद्घाटन हुआ है। जब भी ईरान के इतिहास के उस दौर की चर्चा हुई है, तो प्रायः ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि 1953 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मुहम्मद मोसादे की निर्वाचित सरकार को गिराने में सीआईए व अमेरिका की प्रमुख भूमिका थी, क्योंकि वह सरकार पश्चिमी देशों की बहुराष्ट्रीय, खासकर तेल कंपनियों के विरुद्ध कड़े कदम उठा रही थी।
विज्ञापन
पर आरोप लगाने में और सरकारी तौर पर स्वीकार करने में बहुत अंतर होता है। अब आरोप तो कई तरह से लगते रहते हैं। हो सकता है, उनमें सच्चाई भी हो, पर पूर्ण तौर पर प्रमाण प्रायः नहीं मिल पाते हैं। पर जब सरकार स्वयं स्वीकार कर ले कि उसने कोई अनुचित कार्रवाई की है, तो फिर संदेह की कोई गुंजाइश ही नहीं रह जाती।
विज्ञापन
सीआईए के सरकारी तौर पर स्वीकृत इतिहास के कुछ वाकये जो पहले सार्वजनिक नहीं किए गए थे, वे अब जॉर्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय स्थित सुरक्षा संग्रहालय ने उपलब्ध करवाए हैं। ‘द बैटल फोर ईरान’ शीर्षक से जारी इन दस्तावेजों में कहा गया है, सेना के जिस तख्तापलट ने मोसादे और उनके नेशनल फ्रंट के मंत्रिमंडल को हटाया, उसे सीआईए के निर्देश पर अमेरिका की विदेश नीति के कार्य के रूप में किया गया। अमेरिकी सरकार में उच्चतम स्तर पर यह योजना बनाई गई और उसे स्वीकृति प्राप्त हुई। यह दस्तावेज संग्रहालय की वेबसाइट पर सूचना के अधिकार के कानून के अंतर्गत प्रकाशित हुआ।
उस तख्तापलट के बाद ईरान के शाह के तानाशाही शासन को अमेरिकी सहायता ने इस आधार पर मजबूत किया कि वह शासन अमेरिका, ब्रिटेन और सहयोगी देशों के तेल और गैस संबंधी हितों की रक्षा करेगा। उस पूरे प्रकरण में ब्रिटेन की भूमिका भी बहुत संदेहास्पद थी। पर ब्रिटिश सरकार ने अभी तक इस संबंध में अपना रिकॉर्ड पारदर्शी नहीं किया है। मोसादे से ब्रिटिश सरकार को सबसे ज्यादा चिढ़ थी, क्योंकि वह सरकार ब्रिटिश कंपनी एंगलो-ईरानियन तेल कंपनी का राष्ट्रीयकरण करना चाहती थी।
मोसादे द्वारा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विरुद्ध यह और दूसरे कदम उठाने से रोकने के लिए पहले ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए। अमेरिका और ब्रिटेन को जब इसमें सफलता नहीं मिली, तो सुनियोजित तरीके से मोसादे की सरकार ही गिरा दी गई। उस तख्तापलट के साथ ईरान के शाह की शक्ति बहुत बढ़ गई।
शाह को नियंत्रण में रखने के लिए जो लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं मोसादे जैसे राष्ट्रवादी नेताओं ने आरंभ की थी, उन्हें हिंसक ढंग से रोक दिया गया। बहुत से राष्ट्रवादी व वामपंथी नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को मार डाला गया, जबकि हजारों को जेल में डाल दिया गया। शासन में आते ही शाह ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों का स्वागत करना और उन्हें दूसरी सुविधाएं देना शुरू कर दिया।
लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित सरकारों को इस तरह हटाना अंतराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध है। अब जब ऐसी एक गंभीर गलती को अमेरिका ने स्वीकार कर लिया है, तब सवाल उठता है कि क्या इसके बारे में कोई ऐसी न्यायिक कार्रवाई अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो सकती है, जो कि आगे के लिए एक सबक बने और हिंसा के बल पर इस तरह की लोकतांत्रिक सरकारों को मिटाने की महाशक्तियों की प्रवृत्ति पर रोक लग सके।
ऐसा कोई कदम उठाना इसलिए जरूरी है, क्योंकि ताकतवर देशों द्वारा दूसरे देशों में तख्तापलट की कोशिशें अब भी जारी हैं। मध्य पूर्व में ही अमेरिका इस तरह की कवायदें कर रहा है। इसके अलावा अंतराष्ट्रीय वित्तीय और व्यापार संगठनों, जैसे विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से गरीब व विकासशील देशों की आर्थिक व व्यापार नीतियों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करने के प्रयासों पर भी रोक लगनी चाहिए।