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राज्यविहीन आबादी का बोझ

Tue, 31 Jul 2018 06:56 PM IST
subir bhowmik सुबीर भौमिक
Updated Tue, 31 Jul 2018 06:56 PM IST
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Burden of Stateless Population
एनआरसी-असम

तीस जुलाई को जारी असम के राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के अंतिम मसौदे में चालीस लाख से ज्यादा लोगों के दावों को शामिल नहीं किया गया है। असम में भारतीय नागरिकों की सूची वाला यह रजिस्टर 1951 के बाद से पहली बार अद्यतन (अपडेट) किया जा रहा है, जब देश विभाजन के बाद भारत-बांग्लादेश सीमा पर विशाल आबादी की आवाजाही शुरू हुई थी।


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यह एक जटिल कवायद है, जिसका घोषित उद्देश्य राज्य में 'अवैध आप्रवासियों' को पहचानना और उन्हें बाहर निकालना है। छह वर्षों तक चले लंबे विदेशी-विरोधी आंदोलन के बाद 1985 में हुए असम समझौते के जरिये समावेशन की शर्तें निर्धारित की गई थीं, उस विदेशी-विरोधी आंदोलन ने राज्य में उग्रवाद को भी जन्म दिया था।

इन शर्तों के तहत, कोई भी व्यक्ति जो यह साबित नहीं कर सकता कि वह या उनके पूर्वज 24 मार्च, 1971 की मध्यरात्रि (बांग्लादेश युद्ध से पूर्व) से पहले इस देश में नहीं आए थे, उन्हें विदेशी घोषित किया जाएगा। नागरिकता के सत्यापन की प्रक्रिया, जो तीन साल पहले शुरू हुई थी, खासकर बांग्ला बोलने वाले मुसलमानों और हिंदुओं के खिलाफ पूर्वाग्रह के आरोपों के कारण विवादों में फंसी है।

हालांकि लाखों लोगों को अब भी भारतीय नागरिक के रूप में प्रमाणित किए जाने की उम्मीद है और सरकार राज्य में व्याप्त भय को दूर करने की कोशिश कर रही है। जाहिर है, इससे इस कवायद की जबर्दस्त महत्ता प्रकट होती है। राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर ने पहचान से संबंधित पुराने और संभवतः विस्फोटक सवालों को छेड़ दिया है।
 
असम में यह क्षेत्र के मूल निवासियों की तलाश के साथ 'माटी पुत्रों' की जातीय मातृभूमि के रूप में राज्य की आत्म पहचान से जुड़ गया है। इस राज्य ने 19वीं शताब्दी से ही आप्रवासियों की लहर देखी है और देसीयता की परिभाषा अनिवार्य रूप से इतिहास, प्रागैतिहास और मिथक तक पहुंच गई है। असम का प्रतिस्पर्धी जातीय राष्ट्रवाद, जिसने सशस्त्र विद्रोहियों को जन्म दिया, उसके पीछे हमेशा ‘जनसांख्यिकीय परिवर्तन' और देसज मातृभूमि पर बाहरी लोगों के 'कब्जे' कर लेने के भय को कारण माना गया।
 
पिछले चार दशकों में अक्सर उन्होंने 1983 के नेल्ली नरसंहार से लेकर 2012 के कोकराझार हत्याओं तक बंगाली मुसलमानों के खिलाफ हिंसक आक्रमण को अंजाम दिया है। वे राज्य में राजनीति का मुख्य आधार भी बन गए हैं, जहां प्रत्येक चुनाव 'अवैध बांग्लादेशी आप्रवासियों' के खिलाफ बयानबाजी में बढ़ोतरी, मतदाता सूची में घुसपैठ, चुनावी परिणामों को बदलने और राज्य की बहुमूल्य भूमि पर कब्जा करने का साक्षी बनता है।

व्यापक राष्ट्रीय कल्पना में, यह कवायद विभाजन के अनसुलझे सवालों को खत्म करती है और बताती है कि राज्य नागरिकता के लिए किस व्यक्ति को उपयुक्त मानता है। क्षेत्रीय आंदोलन सभी बाहरी लोगों, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, के खिलाफ हो सकता है, लेकिन जहां तक केंद्र का संबंध है, तो विदेशियों की पहचान और निर्वासन के पीछे हमेशा सांप्रदायिक उद्देश्य छिपा रहा है।
 
दशकों से भारतीय राज्य ने पड़ोसी देशों से उत्पीड़न के कारण भागकर आए हिंदू 'शरणार्थियों' और मुस्लिम 'घुसपैठियों' में फर्क किया है, जिससे राजनीति प्रभावित हुई है। इस अनौपचारिक भेदभाव को भारतीय जनता पार्टी के नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 में संहिताबद्ध किया गया था, जिसमें बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आने वाले गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए नागरिकता की राह आसान बनाई गई है।

लेकिन असम ने इस विधेयक के खिलाफ विरोध देखा है, क्योंकि यह 1985 के असम समझौते की शर्तों को कमजोर करता है। असम के जातीय (मूल) लोग बंगाली हिंदू और मुसलमान, दोनों को खतरे के रूप में देखते हैं, क्योंकि उनकी संयुक्त आबादी राज्य की आधी आबादी के करीब है। लेकिन गिनती की कवायद पर लगातार बंगाली मुसलमानों के खिलाफ अधिक कठोर रुख अपनाने का आरोप लगाया गया है, उन्हें उनकी धार्मिक और भाषायी पहचान के कारण 'अवैध बांग्लादेशी आप्रवासियों' के रूप में चिह्नित किया गया है। पिछले साल से राज्य के मुस्लिम अल्पसंख्यकों को तेजी से अपने बहिष्कार का डर था, क्योंकि गणना प्रक्रिया की शर्तों में बदलाव प्रतीत हुआ और नए नियम लागू किए गए।
 
हालांकि सरकार ने यह आश्वासन दिया है कि मसौदा सूची के प्रकाशन के बाद किसी का भी अधिकार या विशेषाधिकार खत्म नहीं होगा और न ही उन्हें हिरासत शिविरों में भेजा जाएगा। लेकिन जैसे ही यह मसौदा, अंतिम सूची बन जाएगा, कुछ कठिन सवालों का सामना सरकार को जरूर करना पड़ेगा। आखिर उन लोगों का क्या होगा, जो विदेशी पंचाट के सामने अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाएंगे और इसलिए राज्यविहीन करार दिए जाएंगे? बांग्लादेश के साथ प्रत्यावर्तन संधि के अभाव में क्या उन्हें निर्वासित किया जाएगा, या उन्हें देश में रहने की अनुमति मिलेगी या उनके अधिकारों और विशेषाधिकारों को खत्म कर दिया जाएगा, जिसका आश्वासन अभी सरकार दे रही है? और सरकार उस सामाजिक दरार को पाटने के लिए क्या योजना बनाएगी, जिसे इस कवायद ने एक बार फिर से चौड़ा कर दिया है?

एक ऐसे वर्ष में, जब संयुक्त राष्ट्र ने राज्यविहीनता को खत्म करने के लिए नए प्रयासों की घोषणा की है, भारत लाखों राज्यविहीन आबादी का बोझ उठा सकता है, जो अब न तो भारत की नागरिकता के योग्य होंगे और न ही जिन्हें बांग्लादेश भेजा जा सकता है, क्योंकि वहां शेख हसीना की दोस्ताना सरकार भी उन्हें स्वीकार करने के प्रति अनिच्छुक होगी। जाहिर है, असम उन्हें रखना नहीं चाहेगा और अन्य राज्य उन्हें लेना नहीं पसंद करेंगे। और अगर ममता बनर्जी उन्हें लेना भी चाहती हैं, तो क्या उनकी सरकार केंद्र को चुनौती दे पाएगी और उन्हें नागरिकता का लाभ लेने देगी! 

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