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बुलेट बनाम लेट
संजय जोशी
Updated Tue, 15 Jul 2014 08:09 PM IST
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देश में अब सबसे तेज चलने वाली बुलेट ट्रेनें चलेंगी, जो प्रगति की सूचक बनेंगी। लेकिन धीरे और लेट चलने वाली लोकल आम आदमी की ट्रेनों के हालात तो बद से बदतर हो रहे हैं। लेट-लतीफी में बड़े -बड़े कीर्तिमान हैं इनके। अब बुलेट ट्रेन अपनी तेज गति का मापदंड स्थापित करेगी। बहुत बड़ा वर्ग इनसे अछूता ही रहेगा। सिर्फ दर्शन मात्र से ही वह अपने आप को धन्य समझेगा। उसे देखने की खुशी में अपनी तमाम तकलीफें कुछ देर के लिए भूल जाएगा। हो सकता है, अगले चुनाव में सभी लोकल ट्रेनों को बुलेट में बदलने का लॉलीपाप थमाया जाए।
आम लोगों के अलावा एक खास वर्ग होता है, जो ट्रेन में अप-डाउन करता है। वह नींद में भी जागता रहता है और हमेशा ट्रेन के लेट होने के दर्द से विचलित होकर रेलवे को कोसता रहता है। वह रेलवे की कारगुजारियों व खामियों तथा देश की हर घटित-अघटित घटनाओं का विशेषज्ञ होता है।
ट्रेनों का लेट होना उसके ज्ञान में वृद्धि करने में सहायक होता है। ट्रेन के लेट होने की वजह से उसे ब्लड प्रेशर जैसी बीमारी उपहार में मिलती है और दफ्तर में रोज लेट से पहुंचने के बहाने बनाकर वह तंग आ जाता है। ऐसे ही एक महाशय ने अपना अर्जित ज्ञान उड़ेला कि बुलेट जेब पर भारी पड़ेगी और लोकल ट्रेन लेट होने के कारण समय पर भारी है। रेल के लेट होने की कोई सीमा नहीं। जहां चाहे रोक देते हैं, पड़े रहो घंटों।
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फास्ट ट्रेनों को निकलते हुए निहारते रहो। बुलेट ट्रेनों की गाज तो आम आदमी ओर लोकल ट्रेनें-सभी ट्रेनों पर गिरेगी। लोकल ट्रेनें लावारिस-सी लगती हैं। पहले लेट-लतीफी और सफाई पर काम होना चाहिए, फिर बुलेट ट्रेन का सपना साकार करना चाहिए।
वह निरंतर अपनी बात कहे जा रहे थे। अचानक लोकल ट्रेन की तरह बेपटरी होते हुए बोले, मौजूदा पटरियों का जाल बुलेट ट्रेन को नहीं सह पाएगा। खैर, हम जैसे लोग तो जान हथेली पर लेकर ही रोज घर से निकलते हैं कि कोई अनहोनी न हो जाए।ईश्वर आपकी यात्रा सफल करे वाली उद्घोषणा सुनकर भय और बढ़ जाता है कि रेलवे ने भी यात्री को भगवान भरोसे छोड़ दिया है।
मतलब यही है रेलवे की सुपर सेवा का कमाल। मैंने उन्हें रोकते हुए कहा, भाई बस करो, आपकी बात समझ में आ गई कि बुलेट ट्रेन चलाने से पहले लोकल ट्रेनों में लेट पर नियंत्रण जरूरी है। उन्होंने कहा, रेल वालों को समझ में आए तब न।
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आम लोगों के अलावा एक खास वर्ग होता है, जो ट्रेन में अप-डाउन करता है। वह नींद में भी जागता रहता है और हमेशा ट्रेन के लेट होने के दर्द से विचलित होकर रेलवे को कोसता रहता है। वह रेलवे की कारगुजारियों व खामियों तथा देश की हर घटित-अघटित घटनाओं का विशेषज्ञ होता है।
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ट्रेनों का लेट होना उसके ज्ञान में वृद्धि करने में सहायक होता है। ट्रेन के लेट होने की वजह से उसे ब्लड प्रेशर जैसी बीमारी उपहार में मिलती है और दफ्तर में रोज लेट से पहुंचने के बहाने बनाकर वह तंग आ जाता है। ऐसे ही एक महाशय ने अपना अर्जित ज्ञान उड़ेला कि बुलेट जेब पर भारी पड़ेगी और लोकल ट्रेन लेट होने के कारण समय पर भारी है। रेल के लेट होने की कोई सीमा नहीं। जहां चाहे रोक देते हैं, पड़े रहो घंटों।
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फास्ट ट्रेनों को निकलते हुए निहारते रहो। बुलेट ट्रेनों की गाज तो आम आदमी ओर लोकल ट्रेनें-सभी ट्रेनों पर गिरेगी। लोकल ट्रेनें लावारिस-सी लगती हैं। पहले लेट-लतीफी और सफाई पर काम होना चाहिए, फिर बुलेट ट्रेन का सपना साकार करना चाहिए।
वह निरंतर अपनी बात कहे जा रहे थे। अचानक लोकल ट्रेन की तरह बेपटरी होते हुए बोले, मौजूदा पटरियों का जाल बुलेट ट्रेन को नहीं सह पाएगा। खैर, हम जैसे लोग तो जान हथेली पर लेकर ही रोज घर से निकलते हैं कि कोई अनहोनी न हो जाए।ईश्वर आपकी यात्रा सफल करे वाली उद्घोषणा सुनकर भय और बढ़ जाता है कि रेलवे ने भी यात्री को भगवान भरोसे छोड़ दिया है।
मतलब यही है रेलवे की सुपर सेवा का कमाल। मैंने उन्हें रोकते हुए कहा, भाई बस करो, आपकी बात समझ में आ गई कि बुलेट ट्रेन चलाने से पहले लोकल ट्रेनों में लेट पर नियंत्रण जरूरी है। उन्होंने कहा, रेल वालों को समझ में आए तब न।