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पूर्ण बजट : प्रतिस्पर्धी विचारों की जरूरत, ताकि संसाधनों का हो सके प्रभावी इस्तेमाल
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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण
- फोटो :
ANI
विस्तार
बजट का इतिहास खुद में एक दिलचस्प यात्रा है। किवदंती है कि मध्ययुगीन फ्रांस में यायावर गीतकार बोगेट (बजट) में रखे गए अपने धन का प्रबंधन किसी संरक्षक को सौंपते थे, जिसे बजटकर्ता के रूप में जाना जाता था। ब्रिटेन में जब 'बजट' शब्द का उपयोग होने लगा, तो इसने अपना प्रभामंडल और कद हासिल किया। 1400 ईस्वी तक ब्रिटिश संसद महज एक याचिका निकाय थी, जहां सांसद अपनी शिकायतों के समाधान की मांग करते थे और राजशाही खर्च योजना को मंजूरी देती थी। 18वीं सदी तक, चांसलर द्वारा पेश किए जाने वाले बजट का उद्देश्य खर्च को कम करना और एक नए सामाजिक अनुबंध के अनुसार, राजा की कर लगाने की शक्ति पर अंकुश लगाना था।
आधुनिक काल में ब्रिटेन में कड़ी प्रतिद्वंद्विता के कारण छाया मंत्रिमंडल और छाया बजट की रूपरेखा तैयार हुई, जिससे संस्थाओं को प्रतिस्पर्धी दृष्टिकोण एवं योजनाएं पेश करने का मौका मिला। वास्तव में मौजूदा चुनाव में भी सट्टेबाजी और अन्य घोटालों के अलावा प्रमुख मुद्दा टोरिज और लेबर पार्टी के बीच वैचारिक प्रतिद्वंद्विता है। वैकल्पिक बजट केवल ब्रिटेन में ही नहीं, बल्कि ऑस्ट्रेलिया, फिनलैंड और दक्षिण अफ्रीका तक में प्रचलित है।
इसी महीने बाद में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण 2024–25 के लिए पूर्ण बजट पेश करेंगी। यह कवायद ऐसे समय हो रही है, जब कुछ दिनों पहले लोकसभा चुनाव में दोनों गठबंधनों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर घोषणापत्रों एवं बयानबाजी के जरिये अपने दृष्टिकोण पेश किए, जिनमें बेरोजगारी, कृषि संकट, महंगाई, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा जैसे ज्वलंत मुद्दे शामिल थे। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र (न्याय पत्र) में कई विचार पेश किए। भाजपा के प्रतिस्पर्धी दृष्टिकोण 'मोदी की गारंटी' की झलक स्पष्ट रूप में बजट में दिखेगी। आम तौर पर किसी भी बजट के बाद होने वाली बहस दावों और प्रतिदावों के शोर की प्रतिस्पर्धा होती है। इसके बाद विलाप का एक सुनियोजित कोरस होता है कि किसने किया और क्या नहीं किया। इस बहस में बजट आवंटन पर कोई सूचना नहीं होती। विपक्ष हमेशा दावा करता है कि इसे बेहतर किया जा सकता था। सवाल उठता है कि विपक्षी गठबंधन में शामिल दलों को छाया मंत्रिमंडल बनाने से कौन रोकता है, जिसमें मंत्री मंत्रालयों की निगरानी करते हैं और एक प्रतिस्पर्धी बजट पेश करते हैं। विपक्षी गठबंधन अपने दावों को दस्तावेज के रूप में क्यों नहीं 'दूध का दूध और पानी का पानी' की तरह साबित कर सकता?
सार्वजनिक क्षेत्र में उपलब्ध जानकारी तक विपक्ष की पहुंच है। फरवरी, 2024 में पेश किए गए अंतरिम बजट में बुनियादी मैक्रो डाटा शामिल है। इसके अलावा, पूर्वानुमानों के अद्यतन आंकड़े भी उपलब्ध हैं-इसमें 2023-24 के लिए जीडीपी के अनंतिम अनुमान, बेहतर प्रत्यक्ष कर संग्रह का विवरण, जीएसटी प्राप्तियों के आंकड़े, भारतीय रिजर्व बैंक से अधिशेष, मौद्रिक नीति समिति के बयानों में विकास और मुद्रास्फीति के पूर्वानुमान शामिल हैं। वैकल्पिक बजट को सरकार द्वारा बजट पेश किए जाने के एक या दो दिन पहले या बजट के एक दिन बाद जारी किया जा सकता है।
बजट तैयार करना राजनीतिक एवं आर्थिक आवश्यकताओं को एक साथ जोड़ने का विज्ञान और कला, दोनों है। यह देश के लोगों के लिए उपयोगी होगा, ताकि वे 'विकास के एजेंडे को कैसे तैयार किया जाए' इस पर दोनों पक्षों के फोकस और दृष्टिकोण की तुलना कर पाएंगे। चुनाव अभियान ने मुद्रास्फीति, कृषि संकट और बेरोजगारी के मुद्दों पर बढ़ती चिंता और मध्यम वर्ग की कथित उपेक्षा की पीड़ा को उजागर किया। कांग्रेस के पास यह दिखाने का अवसर है कि वह किस तरह से अपने विचारों को सामने रखेगी और अर्थव्यवस्था को गति देगी। मसलन, प्रशिक्षुता कार्यक्रम और प्रति वर्ष एक लाख रुपये का भुगतान, प्रत्येक गरीब परिवार को एक लाख रुपये बिना शर्त नकद हस्तांतरण की महालक्ष्मी योजना। यह कोई रहस्य नहीं है कि नोटबंदी, जीएसटी की शुरुआत और कोरोना महामारी जैसे कई व्यवधानों के कारण राज्यों में कई अनौपचारिक उद्यम और एमएसएमई बंद हो गए।
असंगठित क्षेत्र के उद्यमों के ताजा वार्षिक सर्वे के विश्लेषण से पता चलता है कि 18 लाख उद्यमों के बंद होने से 50 लाख से ज्यादा नौकरियों का नुकसान हुआ। कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी गठबंधन उत्तर प्रदेश या महाराष्ट्र में कौशल विकास वृत्ति द्वारा सक्षम एक मॉडल कार्यक्रम या ‘आकांक्षी जिलों’ में एक बड़ा कार्यक्रम पेश कर सकता है। यह भी सबको मालूम है कि प्राथमिक स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में जरूरत और उपलब्धता के बीच भारी अंतर है। विपक्षी पार्टियां स्वास्थ्य और अन्य पहलों के विस्तार के लिए एक फंडिंग योजना की रूपरेखा बना सकती हैं, साथ ही विकास को समर्थन देने के लिए एक विधायी एजेंडा भी बना सकती हैं।
वैकल्पिक बजट विपक्षी गठबंधन को यह दिखाने का मौका दे सकता है कि संसाधनों (जैसे बढ़े हुए राजस्व और आरबीआई के अधिशेष) को बेहतर परिणामों के लिए कैसे इस्तेमाल किया जाता है या किया जाना चाहिए। इसके लिए विपक्षी गठबंधन पूर्व वित्त मंत्रियों, अर्थशास्त्रियों जैसे जानकार लोगों को इकट्ठा करके इस कार्य के लिए आर्थिक सलाहकार परिषद का गठन कर सकता है। पार्टियां बजट की तरह बुनियादी टेम्पलेट पेश करने के लिए सहयोग कर सकती हैं, जिसमें राजस्व की प्राप्ति और खर्च के साथ उद्देश्य को दर्शाया गया हो।
वैकल्पिक दृष्टिकोण केवल राजनीतिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहे। यह काम कॉरपोरेट द्वारा वित्त पोषित थिंक टैंक एवं उद्योग मंडलों द्वारा भी किया जा सकता है। उद्योग मंडलों की इच्छा सूची में पूंजीगत व्यय में 25 फीसदी की वृद्धि, पीएलआई का विस्तार, निम्न एवं मध्य आय वर्ग के परिवारों को आयकर में राहत का प्रावधान, स्वास्थ्य एवं शिक्षा पर निवेश में वृद्धि, छोटे उद्यमियों को समर्थन, मौजूदा कॉरपोरेट टैक्स पर यथास्थिति शामिल हैं, हालांकि इसमें वित्तीय समेकन पर जोर दिया गया है। भारत इस समय एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। ऐसे में 'क्या है और क्या हो सकता है' के बीच राजनीति फंसी नहीं रह सकती। जलवायु परिवर्तन, प्रौद्योगिकी व भू-राजनीति जैसे व्यवधान अनिश्चितता को बढ़ा रहे हैं। एक अरब से अधिक लोगों की आकांक्षाएं जीवन और आजीविका के मुद्दों पर हितधारकों से प्रतिस्पर्धी विचारों की हकदार हैं।