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बजट 2021:आंकड़ों के जरिए पी चिदंबरम उठा रहे हैं ये अहम सवाल
Sun, 21 Feb 2021 02:25 AM IST
पी. चिदंबरम
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पी. चिदंबरम
Published by: पी. चिदंबरम
Updated Sun, 21 Feb 2021 02:25 AM IST
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बजट 2021
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 12 फरवरी को राज्यसभा में और 13 फरवरी को लोकसभा में आक्रामक बजट भाषण दिया। लोकसभा में उन्होंने एक दिन पहले किए गए मेरे हस्तक्षेप का एक दर्जन बार जिक्र किया, जिसे मैंने संसदीय बहस में दबाव बनाने और बचाव करने की तरह ही लिया।
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हालांकि, मैं अपवाद स्वरूप आंकड़ों के साथ आजादी बरत रहा हूं। बजट कुल मिलाकर आंकड़ों से संबंधित ही होते हैं: हर आंकड़े को तर्कसंगत होना चाहिए। यदि सिर्फ तीन प्रमुख आंकड़े गलत हों, तो बजट जो कि राजस्व और खर्च का वार्षिक वक्तव्य होता है, कागजों का बेकार ढेर रह जाएगा। ये तीन आंकड़े हैं, कुल प्राप्तियां, कुल खर्च और कर्ज (वित्तीय घाटा) का अनुमान।
तीन अहम आंकड़े
एक फरवरी, 2020 को जब 2020-21 का बजट पेश किया गया था, तब मैंने तीन महत्वपूर्ण आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए थे। मैंने कहा था कि ये तीन आंकड़े 'संदिग्ध' हैं, यानी उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। मेरी आलोचना का आधार यह तथ्य था कि लगातार सात तिमाहियों (2018-19 की चार तिमाहियां और 2019-20 की तीन तिमाहियां) से जीडीपी की वृद्धि सुस्त थी और 2019-20 में इसके और नीचे गिरने के आसार थे।
इसीलिए मैंने तर्क दिया था कि 2020-21 के अनुमान आशावादी और महत्वाकांक्षी हैं। वित्त मंत्री ने गुस्से में मेरी आलोचनाओं को खारिज कर दिया था।
इसके एक महीने बाद महामारी ने देश में पैर पसारना शुरू कर दिया और 2020-21 की शुरुआत अनिष्ट के साथ हुई। सुस्ती मंदी में बदल गई। वित्त मंत्री द्वारा अनुमानित सारे आंकड़े गर्त में चले गए। महामारी के बिना भी वह गलत साबित होतीं; महामारी के कारण वह बुरी तरह गलत साबित हुईं। जरा देखिए कि हमने कहां से (बजट अनुमान) से शुरुआत की थी और हम 31 मार्च, 2021 को कहां खत्म (पुनरीक्षित अनुमान) करेंगे : (देखें टेबल)।
बजट अनुमान पुनरीक्षित अनुमान
कुल प्राप्तियां 22,45,893 16,01,650
कर्ज में कमी
जिसमें कर राजस्व 16,35,909 13,44,501
(केंद्र को शुद्ध)
जिसमें से विनिवेश 2,10,000 32,000
कुल खर्च 30,42,230 34,50,305
जिसमें पूंजीगत खर्च 4,12,085 4,39,163
कर्ज (वित्तीय घाटा) 7,96337 18,48,655
जिसमें राजस्व घाटा 6,09,219 14,55,989
(आंकड़े करोड़ रुपये में)
यही अप्रिय कहानी 2021-22 के बजट अनुमानों में भी जारी रही है, जिससे सवाल उठते हैं। मैंने संसद में कुछ सवाल किए, जिनका कोई जवाब नहीं मिला। मैं कुछ सवाल यहां दे रहा हूं।
सवाल हैं, जवाब नहीं
1. इस आशावाद का क्या आधार है कि 2020-21 में कर राजस्व (केंद्र को शुद्ध) में 14.9 फीसदी की वृद्धि होगी, जबकि 2020-21 में यह पिछले वर्ष की तुलना में एक फीसदी कम हो गया? यह मान भी लिया जाए कि मंदी 2021-22 की पहली तिमाही में खत्म हो जाएगी, तो भी क्या जीडीपी पर्याप्त रूप से बढ़ेगी, ताकि कर राजस्व में 14.9 फीसदी की वृद्धि हो?
2. जब पिछले वर्ष विनिवेश से होने वाली प्राप्तियां 1,78,000 करोड़ रुपये से कम रहीं, तो फिर 2021-22 के लिए 1,75,000 करोड़ रुपये के अनुमान का क्या आधार है?
3. क्या यह सही है कि 2020-21 के कुल खर्च के पुनरीक्षित अनुमान में एफसीआई (भारतीय खाद्य निगम) को सरकार की ओर से लिए कर्ज के एवज में किया गया 2,65,095 करोड़ रुपये का पुनर्भुगतान शामिल है? यदि हां, तो फिर इसे सरकार के ऐसे खर्च के रूप में क्यों गिना जाए जो अर्थव्यवस्था को गति देगा?
4. इसी तरह से क्या 2021-22 के कुल खर्च के बजट अनुमान में एफसीआई को पुनर्भुगतान के रूप में दी गई भारी-भरकम राशि शामिल है?
5. 'रक्षा' में 3,266 करोड़ रुपये की मामूली बढ़ोतरी और 'स्वास्थ्य' में 7,843 करोड़ रुपये की कटौती (बजट एक नजर में, पेज दस) कर क्या वित्त मंत्री ने 2021-22 के कुल खर्च को बेहद कम नहीं आंका है? रक्षा और स्वास्थ्य के लिए क्या और अधिक फंड की जरूरत नहीं है?
6. क्या बजट ने शिक्षा और ऊर्जा जैसे विभिन्न विभागों और मनरेगा तथा पोषक जैसी योजनाओं के लिए कम आवंटन नहीं किया है?
7. यदि कुल राजस्व का अधिक अनुमान और कुल खर्च का बेहद कम अनुमान लगाया गया है, तो 2021-22 के लिए कर्ज का अनुमान ( 15,06,812 करोड़ रुपये) भ्रमित करने वाला और बेहद कम नहीं है?
8. क्या वित्त मंत्री रिजर्व बैंक और अन्य विशेषज्ञों के अनुमानों के उलट मान रही हैं कि 2021-22 में महंगाई की औसत दर सिर्फ तीन फीसदी रहेगी? यदि ऐसा है, तो उनके अनुमान का क्या आधार है?
9. आखिर वित्त मंत्री ने ऐसा तरीका क्यों चुना जिससे 2025-26 में वित्तीय घाटा 4.5 फीसदी के स्तर पर पहुंच जाएगा? क्या सरकार ने वित्तीय घाटे को तीन फीसदी या उससे नीचे रखने का लक्ष्य त्याग दिया है? क्या इसका यह मतलब नहीं है कि एफआरबीएम एक्ट (राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन अधिनियम) को निलंबित नहीं, बल्कि हमेशा के लिए दफन कर देना चाहिए?
10. 2021-22 के जीडीपी के अनुमान (स्थिर मूल्य पर) के दृष्टिकोण से देखें, तो क्या सरकार ने 2024-25 तक पचास खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य छोड़ दिया है?
अक्षम शासन
2013-14 में कार्यकाल खत्म करते हुए यूपीए ने 105 लाख करोड़़ रुपये मूल्य (स्थिर मूल्य) की जीडीपी छोड़ी थी, जो कि 2003-04 की तुलना में तीन गुना बड़ी थी। उसके बाद से जीडीपी धीमी गति से 2017-18 में 131 लाख करोड़ रुपये; 2018-19 में 139 लाख करोड़ रुपये; 2019-20 में 145 लाख करोड़ रुपये बढ़ रही है और 2020-21 में इसके गिरकर 130 लाख करोड़ रुपये यानी 2017-18 के स्तर पर पहुंचने का अनुमान है। इसलिए अक्षम प्रबंधन के कारण अर्थव्यवस्था उसी स्तर पर है, जहां वह तीन वर्षपहले थी!
बजट के आंकड़े वास्तव में अनुमान ही होते हैं; अच्छे से किए गए अनुमानों के बावजूद ये गलत भी हो सकते हैं। फिर भी मैं बताना चाहता हूं कि आंकड़ों की गफलत करने और इसे तथाकथित विकास का बजट बताकर प्रस्तुत करने की गलत सलाह देना अक्षम्य है। इसकी भारी कीमत लोगों को चुकानी होगी।