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अंग्रेज गवर्नर और कुंभ मेला

Fri, 15 Feb 2013 12:02 AM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Fri, 15 Feb 2013 12:02 AM IST
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british governor and kumbh mela

वर्ष 1942 में इलाहाबाद में कुंभ पर्व की धूम थी। भारत के वायसराय गवर्नर जनरल लॉर्ड लिनलिथगो कुंभ के इस अनूठे मेले का अवलोकन करने महामना पंडित मदनमोहन मालवीय जी के साथ प्रयाग के तट पर पहुंचे। उन्होंने कुंभ क्षेत्र में देश के विभिन्न राज्यों से अपनी-अपनी वेशभूषा में आए लाखों लोगों को एक साथ त्रिवेणी स्नान, भजन-पूजन करते देखा, तो आश्चर्यचकित हो उठे। उन्होंने मालवीय जी से पूछा, इस मेले में लोगों को इकट्ठा करने के लिए प्रचार पर कितना रुपया खर्च हो जाता होगा?

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केवल दो पैसे, मालवीय जी ने उत्तर दिया। वायसराय ने चौंककर पूछा, क्या कहा आपने, केवल दो पैसे? यह कैसे संभव है? मालवीय जी ने अपनी जेब से पंचांग निकाला तथा उसे दिखाते हुए बोले, इस दो पैसे मूल्य के पंचांग से देश भर के हिंदू श्रद्धालु यह पता लगते ही कि हमारा कौन-सा पर्व कब है, स्वयं श्रद्धा के वशीभूत होकर तीर्थयात्रा को निकल पड़ते हैं।
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धार्मिक संस्थाओं व सरकार को कभी भी न प्रचार की जरूरत पड़ती है, न निमंत्रण या आमंत्रण पत्र भेजने की। मालवीय जी ने उन्हें समझाया, लाट साहब, यह भीड़ नहीं, धर्म व भगवान के प्रति अटूट निष्ठा रखने वाले श्रद्धालुओं का अनूठा संगम है। यह श्रद्धालुओं में भक्ति-रस का संचार करता है। वायसराय मालवीय जी का अनूठा उत्तर सुनकर कुंभ पर्व के श्रद्धालुओं के प्रति नतमस्तक हो उठे।

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