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तो अब पुल भी चोरी होने लगा

Tue, 29 Jan 2013 11:25 PM IST
सहीराम
सहीराम Updated Tue, 29 Jan 2013 11:25 PM IST
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bridge was also stolen

जी, पुलों को लेकर अभी तक का कायदा यह रहा है कि सीमेंट, लोहा, बजरी वगैरह तो खाए जाते रहे हैं। बल्कि ऐसी खायकी की तो अपने यहां परंपरा ही मिलती है। पर पुल चोरी नहीं होते। खायकी की इस समृद्ध परंपरा के कारण होता यह है कि पुल कई बार गिर जाता है या बह जाता है।

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कई बार उसके थोड़े बहुत अवशेष मिल जाते हैं, जिससे यह साबित करने में आसानी हो जाती है कि कभी यहां कोई पुल था। अवशेषों के बगैर पुरातत्व विभाग के लिए भी साबित करना मुश्किल होता है कि यहां पुल था। वैसे कई बार यह भी हुआ कि लोग पूरा पुल ही खा गए।
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इधर यमुना से एक पुल चोरी चला गया। जी, पूरा नहीं गया। थोड़ा बच गया। जैसे गहनों की चोरी हो, तो कुछ गहने बच ही जाते हैं। यह कायदे के खिलाफ हुआ। कायदा खाने का है। जैसे आयात का गेहूं खाया जाता है, चीनी खाई जाती है, खाद खाई जाती है, चारा खाया जाता है, वैसे ही कायदा पुल के खाए जाने का भी है, चाहे उसे सीमेंट, लोहे वगैरह के रूप में टुकड़े-टुकड़े करके खाया जाए या फिर पूरा का पूरा डकार लिया जाए। पर पुल चोरी नहीं होता।
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चोरी से जो दृश्य उभरता है, वह ऐसा है, जैसे चोर उसे पोटली में बांधकर ले जा रहा है। ले जाकर उसे घर के किसी कोने में छिपाकर रख रहा है। पर बताइए, पुल को पोटली में कैसे बांधा जा सकता है! ले जाकर चोर ने उसे कहां रखा होगा। दृश्य बड़ा ही विस्मित करनेवाला बन रहा है।

पर जी, कायदे को आजकल मानता कौन है! अब देखिए, पहले कायदा यह था कि सेठों की तिजोरियां लूटी जाती थी। फिर एटीएम मशीनों से रुपये लूटे जाने लगे। अब पूरी एटीएम मशीन ही लूटी जाने लगी। लगता है, यमुना का पुल भी ऐसी बेसब्री का शिकार हो गया। कुछ दिन पहले ऐसी ही एक और खबर आई थी कि हवाई अड्डे से एक विमान के पंख वगैरह चोरी हो गए। अच्छी बात यह थी कि विमान का मुख्य ढांचा बचा रहा। यों यह पुल भी थोड़ा बचा हुआ है।


पर जी, बेसब्री इतनी बढ़ गई है कि डर लगने लगा है कि किसी दिन ताजमहल ही चोरी न हो जाए, या एक दिन पता चले कि लाल किले को रात में कोई ले गया। पटना के गांधी मैदान को गिरवी रखना तो चल गया था। जब पुल चोरी हो सकता है, तो लाल किला या ताजमहल क्यों नहीं हो सकता। पुलिस और सरकार की छोड़िए। पुलिस और सरकार तो तब भी थी, जब यमुना का पुल चोरी हुआ।

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