फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Brexit is outcome of emotional deviation

भावनात्मक भटकाव का नतीजा है ब्रेग्जिट

Fri, 08 Jul 2016 08:07 PM IST
संदीप जोशी
संदीप जोशी Updated Fri, 08 Jul 2016 08:07 PM IST
विज्ञापन
Brexit is outcome of emotional deviation
संदीप जोशी

पिछले दिनों ब्रिटेन के यूरोपीय यूनियन में रहने के सवाल पर ऐतिहासिक जनमत संग्रह हुआ, जिसमें ब्रिटेन की जनता ने यूरोपीय संघ से बाहर रहना चुना। अंतर इतना मामूली था कि ब्रिटिश राजनीति की नैतिकता और जनता की अंतरात्मा को झकझोड़ गया। आज वहां राजनीतिक उथल-पुथल मची है। वहां सामाजिक वैश्विकता और कुंठित राष्ट्रवाद के सवाल खड़े हो गए हैं। जिसके राज में कभी सूरज नहीं डूबता था, वही आज अपने को संकीर्ण दायरे में समेटने पर उतावला है।

विज्ञापन


ब्रिटेन जो कभी दुनिया की पारंपरिक रूढ़िवादी राजधानी था और आधुनिकता का सर्वेसर्वा माना जाता था, आज दकियानूसी ढंग से चलने पर आमादा है। यूरोप की सामूहिकता में ब्रिटेन का दम घुट रहा था। ब्रिटेन के युवा जहां आर्थिक उदारता में यूरोप में रहना चाहते थे, वहीं बुजर्ग राष्ट्रवादी यूरोप से बाहर निकलना चाहते थे। इस जनमत संग्रह ने राष्ट्रीय अनुभववाद और वैश्विक आशावाद के अंतर को दुनिया के सामने रखा है। इसको समाजवाद के आदर्श का वैश्विक आशावाद से टकराव भी माना जा सकता है।
विज्ञापन


खेल भी समाज का एक दर्पण होता है। समाज को समझने के लिए उसके खेल को समझना जरूरी होता है। 23 जून को ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ से बाहर निकलना तय किया और 27 जून को फुटबॉल में आइसलैंड से हारकर इंग्लैंड यूरो 2016 से बाहर हो गया। जहां ब्रिटेन से छोटे यूरोपीय देश हर मायने में फुटबॉल में सफलता पाते दिखे, वहीं इंग्लैंड सबसे लोकप्रिय और महंगी लीग के बावजूद विश्व फुटबॉल में पिछड़ता दिखा। ब्रिटेन के ही हिस्से या स्वयंभू राज्य जैसे वेल्स, आयरलैंड और आइसलैंड यूरो 2016 में अच्छे, जुझारू खेल से सफलता पाते दिखे। हर दृष्टि से इंग्लैंड जूझता और विफल दिखा।
विज्ञापन
विज्ञापन


आज अंतरराष्ट्रीय और यूरोपीय फुटबॉल में इंग्लैंड का जो हाल है, वह वहां के लोगों की मानसिकता भी बताता है। उसी मानसिकता ने यूरोपीय संघ से बाहर निकलने के लिए जनमत जुटाया। जो ब्रिटिश नेता यूरोपीय संघ से बाहर निकलना चाहते थे, आज अपने घरों से बाहर नहीं निकल रहे हैं। प्रधानमंत्री कैमरून के इस्तीफे के बाद उन्हीं की पार्टी से कोई नेता उनकी जगह नेतृत्व करने के लिए आगे नहीं आ रहा है। साफ है कि इस जनमत संग्रह ने सभी पक्ष के नेताओं और लोगो को हैरान-परेशान किया है। जिस वायदे पर जनमत संग्रह हुआ था और जिन नेताओं ने बाहर निकल आने के बाद के लिए जो वायदे किए थे, वे सभी अब आंखें चुराते देखे जा सकते हैं। इस स्थिति का साफ आकलन करने में, और पैदा हुई मुश्किलों को पचाने में न जनता समर्थ है, न नेता।

फुटबॉल ही ब्रिटेन का राष्ट्रीय व सबसे लोकप्रिय खेल है। इसके बावजूद ब्रिटेन को यूरोप में या विश्व फुटबॉल में कोई सफलता नहीं मिली है। विश्व की आर्थिक राजधानी होना, और आधुनिक सुविधाओं से लैस अपना समाज तैयार करना या फिर दुनिया भर का राजनीतिक इतिहास गढ़ना भी ब्रिटेन को सुकून नहीं दिला पाया है। आज ब्रिटेन राजनीति, सामाजिकता और खेल के जिस चैराहे पर खड़ा है, वह उनकी ही बोई पैदावार का ही नतीजा है।


क्या यह ब्रिटेन में अति समाजवाद या ‘कल्याणकारी राज्य’ के दुष्परिणाम हैं, जो सामने आ रहे हैं? क्या मेहनत कर कमाने-खाने के प्रति आलस्य ने इंग्लैंड को पंगु बना दिया है? क्या यह उसी पामाल सभ्यता के लक्षण नहीं है, जिसका जिक्र सौ से भी ज्यादा वर्ष पूर्व गांधी जी ने ‘हिंद स्वराज’ में कर दिया था? सामाजिकता में कुछ कर गुजरने की उत्सुकता और सामूहिक लगन आज इंग्लैण्ड के लोगों में नदारद है, क्योंकि राजनीति जब बदलाव के नाम पर असंभव वायदे करती है, तो जनता बहलावे में आ जाती है। ब्रेग्जिट उसी भावनात्मक भटकाव का नतीजा है। 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed