सांस लेना भी गुनाह लगता है
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दिल्ली की हवा में कितना जहर घुल गया है, इसका अंदाजा डॉक्टरों के एक संगठन की उस रिपोर्ट से लगाया जा सकता है, जिसमें बताया गया है कि देश की राजधानी में 12 साल से कम उम्र के 15 लाख बच्चे अपने खेलने-कूदने की उम्र में पैदल चलने पर ही हांफ रहे हैं। कई डॉक्टरों ने तो यहां तक चेतावनी दी है कि यदि जिंदगी चाहते हैं, तो दिल्ली से दूर चले जाएं। जापान, जर्मनी जैसे कई देशों ने दिल्ली में अपने राजनयिकों की नियुक्ति की अवधि कम करना शुरू कर दिया है, ताकि यहां का जहर उनकी सांसों में कुछ कम घुले। यह स्पष्ट हो चुका है कि दिल्ली में वायु प्रदूषण का बड़ा कारण बढ़ते वाहन, ट्रैफिक जाम और राजधानी से सटे जिलों में पर्यावरण के प्रति बरती जा रही कोताही है। बाहर से हर दिन आने वाले करीब अस्सी हजार ट्रक या बसें यहां के हालात को और गंभीर बना रहे हैं।
आज दिल्ली की सड़कों पर क्षमता से कई गुना वाहनों की भीड़ है। केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीआरआरआई) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, राजधानी के पीरागढ़ी चौक से हर रोज 3,15,554 वाहन गुजरते हैं और यहां जाम में 8,260 किग्रा ईंधन की बर्बादी होती है। इससे निकलने वाला कार्बन 24,119 किग्रा होता है। यह हाल दिल्ली के चप्पे-चप्पे का है। यानी यहां की सड़कों पर हर रोज करीब चालीस हजार लीटर ईंधन महज ट्रैफिक जाम के कारण बर्बाद होता है।
कहने को तो पार्टिकुलेट मैटर या पीएम के मानक तय हैं कि पीएम 2.5 की मात्रा हवा में 50 पीपीएम और पीएम-10 की मात्रा 100 पीपीएम से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। लेकिन दिल्ली का कोई भी इलाका ऐसा नहीं है, जहां यह मानक से कम से कम चार गुना ज्यादा न हो। हवा में पीएम ज्यादा होने से आंखों में जलन, फेफड़े खराब होना, अस्थमा, कैंसर व दिल के रोग होते हैं। जाहिर है, यदि दिल्ली की सांस थमने से बचाना है, तो न केवल यहां सड़कों पर वाहन कम करने होंगे, बल्कि आसपास के इलाकों में वायु प्रदूषण रोकने के मानक तय करने होंगे। याद रहे कि वाहन सीएनजी से चले या फिर डीजल या पेट्रोल से, यदि उसमें क्षमता से ज्यादा वजन होगा, तो उससे निकलने वाला धुआं जानलेवा ही होगा।
दिल्ली के आसपास के खेतों में खड़े ठूंठ को जलाने से तो जहरीला धुआं हवा में फैलता ही है, इससे हजार गुना ज्यादा धुआं दिल्ली से सटे इलाकों में सैकड़ों ईंट भट्ठों से निकलता है। इन भट्ठों में पानी की बेकार बोतल से लेकर फटे जूते तक को जलाया जाता है। इन पर रोक लगाने के लिए कानून हैं, पर जहर उगलने वाले भट्टों पर कभी कोई कार्यवाही नहीं होती।
सभी सरकारी कार्यालयों के आने-जाने का समय लगभग एक होता है, इसलिए बड़ी संख्या में वाहन सड़कों पर होते हैं। यदि सभी कार्यालयों में अवकाश के दिन अलग-अलग हों, तो करीब 30 फीसदी तक वाहनों की भीड़ कम की जा सकती है। कुछ कार्यालयों में अवकाश का दिन शनिवार-रविवार की जगह अन्य दिन किया जा सकता है, जिसमें अस्पताल, बिजली, पानी के बिल जमा होने वाले काउंटर आदि हैं। सबसे बड़ी बात कि सार्वजनिक वाहनों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि हवा में बढ़ते जहर का हौवा किसी एयर प्यूरीफायर बेचने वाली कंपनी का मार्केटिंग फंडा बनकर रह जाए।