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पहचान: चंद्रयान की कामयाबी के लिए क्या 'ब्रावो' कहें, पर सुंदर नाम के लिए इसरो को साधुवाद

Arunendra Nath Verma अरुणेंद्र नाथ वर्मा
Updated Sun, 09 Jul 2023 07:43 AM IST
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सार
भला हो सरकारी क्षेत्र की इसरो का जो चंद्रयान जैसा सुंदर नाम चुन सकी, निजी क्षेत्र में होती तो चंद्रयान की जगह शायद ल्युनोगो नाम रखती। 
 
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Bravo for Chandrayaan-3 success thanks to ISRO for beautiful name
चंद्रयान 3 और एलवीएम 3 - फोटो : SOCIAL MEDIA

विस्तार

चंद्रयान-1 और 2 की सीमित सफलता के बाद चंद्रमा पर तिरंगा लहराने के लिए आतुर चंद्रयान-3 के बारे में सोचकर हर भारतवासी गौरवान्वित है। लेकिन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के पास गर्व करने के लिए कुछ और भी है, वह है भाषायी आत्मनिर्भरता। वर्ष 1975 में उन्होंने जो पहला उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा, उसका नाम था- आर्यभट्ट।



बाद में अंतरिक्ष में इसरो का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखने वाले उपग्रहों के नाम थे- रोहिणी, भास्कर, कल्पना आदि। और अब चंद्रयान-3 चांद की सतह पर अपना घुमंतू (रोवर) उतारेगा, जो अपने अन्वेषण की रपट धरती पर भेजेगा। चंद्रयान के बाद मंगलयान भी दूर नहीं होगा।


इसरो के कुछ अंतरिक्ष उपग्रहों के नाम अंग्रेजी में हैं, जैसे पीएसएलवी (पोलर सैटेलाईट लांच व्हीकल) और जीएसएलवी (जिओ स्टेशनरी सैटेलाईट लांच व्हीकल) और इनसैट (इंडियन नेशनल सेटेलाइट सिस्टम)। इन नामों के हिंदी संस्करण भी हैं। स्वयं इसरो का हिंदी नाम है, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन। बेशक इतने लंबे हिंदी नामों की जगह अंग्रेजी में इसरो जैसे संक्षिप्त नाम उच्चारण के लिहाज से सुविधाजनक हैं, लेकिन किसी विशेष यान या उपग्रह के लिए हिंदी नामों की सुंदरता आर्यभट्ट, रोहिणी आदि नामों से स्वयंसिद्ध है।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) भी अपनी निर्मितियों को सुंदर देशज नाम देने के लिए बधाई का पात्र है। धरती से आकाश पर और आकाश से आकाश में मार करने वाले प्रक्षेपास्त्रों का नाम ‘पृथ्वी’ और ‘आकाश’ रखना और पांच हजार किलोमीटर दूर मार कर सकने वाले अंतर्महाद्वीपीय प्रक्षेपास्त्रों का नाम ‘अग्नि’ रखना गहरी सूझबूझ का परिचायक है। अग्नि के विकसित मॉडल ‘धनुष’ और ‘प्रखर’, क्रूज मिसाइल ‘ब्रह्मोस’, हवा से हवा में (एयर टू एयर) मार करने वाले मिसाइल अस्त्र, क्रूज मिसाइल ‘निर्भय’ और हेलीकॉप्टर से मार करने वाले ‘नाग’ मिसाइल भी सुंदर हिंदी नामों की मिसाल हैं। भारतीय वायुसेना विमानों के नामों का भारतीयकरण बहुत सोच-समझ कर करती आई है। वर्ष 1955 में पहली बार भारतीय वायुसेना में शामिल हुए लड़ाकू जेट ‘ओरेगान’ के फ्रांसीसी नाम का अर्थ था -चक्रवात। इसका भारतीयकृत नाम ‘तूफानी’ सार्थक भी था और सुंदर भी।

भारत में निर्मित वायुसेना के विमान जैसे एच ऍफ 24 मारुत, चीता और चीतल और ध्रुव हेलीकॉप्टर, किरण और अजीत ट्रेनर तथा तेजस लड़ाकू विमान अपने स्वदेशी नामों से ही ज्यादा जाने जाते हैं। ये उदाहरण बेहिचक इस निष्कर्ष पर पहुंचाते हैं कि अंतरिक्ष और आकाश में हिंदी नामों को स्वर्णाक्षर में उकेरने के लिए इसरो और डीआरडीओ संगठन श्रेय के अधिकारी हैं।

सरकारी संस्थाओं द्वारा अपने उत्पादों और निर्मितियों को दिए गए इतने सार्थक और सुंदर नामों पर नजर डालने के बाद विदेशी नामों के पीछे हमारे निजी क्षेत्र की दीवानगी आश्चर्यचकित करती है। मोटरकार बनाने वाली हमारी पहली कंपनी का नाम था हिंदुस्तान मोटर्स, लेकिन अपने उत्पाद का नाम एम्बेसडर की जगह राजदूत रखने का साहस वह नहीं कर पाई। उनकी अपेक्षा विदेशी फियट कंपनी की कार के नाम पद्मिनी से भारतीय ग्राहक खुश थे।

बाद में एस्कॉर्ट्स ने अपनी मोटर साइकिल का नाम राजदूत रखा और स्कूटर इंडिया ने विजय स्कूटर और विक्रम नाम चुने। लेकिन इधर अपनापन जताता हमारा बजाज लोकप्रिय हुआ, उधर सभी भारतीय नामों वाले दोपहियों से हीरो नाम वाला दोपहिया तगड़ा निकला। भारत में पहली बार आम आदमी की पहुंच में आने वाली कार का नाम मारुति 800 रखने के बाद स्वयं मारुति सुजूकी कंपनी ने ही भारतीय नामों से तौबा कर ली। आज मारुति उद्योग की गाड़ियों के नामों पर नजर डालें, तो आश्चर्य होता है कि इस कंपनी ने गाड़ियों के नाम चुन-चुनकर ऐसे क्यों रखे, जिनके अर्थ और उद्गम देशी ग्राहकों और उपभोक्ताओं के सिर के ऊपर से निकल जाएं। आज मारुति उद्योग की गाड़ियां दर्जनों देशों में निर्यात की जा रही हैं। यदि ब्रीजा, जिम्मी, डिजायर (जिसकी स्पेलिंग नाम के अर्थ का अनर्थ कर देती है), बलेनो, इक्को, एर्तिगा, सियाज, ग्रैंड विटारा, इग्निस, स्विफ्ट, प्रेस्सो जैसे नामों की टक्कर में कुछ हिंदी नाम भी कंपनी की पसंद होते, तो विश्व में भारत का नाम गूंजता।

टाटा उद्योग की मोटरकारों के नाम भी कम आश्चर्यजनक नहीं। टिआगो, आल्त्रोज, नियोन, तिगोर, पंच, नैनो और सूमो जैसे नामों के बीच थोड़ी राहत मिलती है इंडिगो, इंडिका आदि नामों से, जिनका भारत से कुछ लेना-देना तो है। जब स्वदेशी टाटा की गाड़ियों के नाम विदेशी हों तो ह्युंडाई की कारों के नाम वेन्यू, ऑरा, क्रेटा, अल्काजान, वेरना और टक्सन और होंडा की कारों के नाम अमेज, सिटी और एलीवेट क्यों न हों? और भारत में बेचने के लिए सेल्टोज, सॉनेट, करेंस नाम पसंद करने वाली किया कंपनी से तो पूछना ही ‘किया’। भला हो सरकारी क्षेत्र की इसरो का, जो चंद्रयान जैसा सुंदर नाम चुन सकी, निजी क्षेत्र में होती, तो चंद्रयान की जगह शायद ल्युनोगो नाम रखती। फिर दुनिया इटली को चांद पर पहुंचने की शाबाशी देने के लिए इतालवी में ही कहती 'ब्रावो'!

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