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ऊबे हुए लोग, थकी हुई पार्टियां

Sun, 04 May 2014 07:54 PM IST
नीरजा चौधरी
नीरजा चौधरी Updated Sun, 04 May 2014 07:54 PM IST
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Bored people, tired parties

अब जबकि लोकसभा चुनाव अपने अंत की ओर बढ़ रहा है, तब चारों ओर थकावट के चिह्न दिखाई देने लगे हैं। नौ चरणों और एक महीने से अधिक तक फैले चुनाव में यह थकावट स्वाभाविक है। राजनीतिक रूप से सजग लोग भी अब चुनाव खत्म होने और 16 मई को नतीजा जानने के ज्यादा इच्छुक हैं। सिर्फ लोग ही ऊबे हुए नहीं हैं। तपती धूप में चुनाव प्रचार कर प्रत्याशी थक चुके हैं, तो कठोर दबाव में राजनीतिक पार्टियां भी कुम्हला गई हैं। मतदाताओं पर सूचनाओं की ऐसी बमबारी इससे पहले कभी नहीं हुई, न ही हर संभावित कोण से रिपोर्टों की संभावना तलाशते प्रतिस्पर्धी मीडिया को एक दूसरे से ऐसी होड़ लेते देखा गया, न कभी पार्टियों और उम्मीदवारों में चुनावी संदेश प्रसारित करने की ऐसी जल्दबाजी दिखी।

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यह पहला चुनाव है, जिसमें सोशल मीडिया और तकनीक ने इतनी निर्णायक भूमिका निभाई है। बहुत लोग मान रहे थे कि सोशल मीडिया का प्रभावी इस्तेमाल 2019 के चुनाव में होगा, लेकिन समय बहुत आगे निकल चुका है। भाजपा और आप, दोनों ने फेसबुक, ट्वीटर, ऐप्स, ब्लॉग्स का प्रभावी इस्तेमाल किया। इस खेल में कांग्रेस बाद में आई। पिछले दो सप्ताह में हमने तीखे आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला भी देखा, जो कई बार व्यक्तिगत हमलों के निचले स्तर को छू जाता था। इतने लंबे चुनावी चरण को भी ऐसे भद्दे राजनीतिक हमलों की एक वजह माना जा सकता है। यानी मतदाताओं का ध्यान आकृष्ट करने के लिए राजनेता किसी भी स्तर तक जाने को तैयार हैं।
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किसी भी चुनाव का आखिरी चरण प्रायः सबसे निर्णायक माना जाता है, यह इस चुनाव के आखिरी दो चरणों के बारे में भी सच है। हालांकि आम लोगों की रुचि इसमें अब कम रह गई है। इन दो चरणों में भी सबकी रुचि का उत्तर प्रदेश की वाराणसी सीट है, जो नरेंद्र मोदी की तकदीर चमका सकती है या उनका खेल बिगाड़ भी सकती है। अन्य पिछड़ा वर्ग की प्रमुखता वाले इस इलाके में भाजपा अब तक चूंकि कमजोर स्थिति में रही है, इसलिए इस बार मतदाताओं को लुभाने के लिए वह तमाम तरीके अपना रही है; मोदी की पिछड़ी पहचान और हिंदुत्व अभियान, दोनों को वह जोरदार तरीके से मतदाताओं के सामने रख रही है। चुनाव के शुरुआती दौर में मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए भाजपा ने विकास और मजबूत नेतृत्व की बात कही थी। लेकिन अब वह जातियों और समुदायों को रिझाने के टोटके पर उतर आई है।
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लंबे चुनावी अभियान के कारण चुनाव आयोग भी दबाव में है। मसलन, वाराणसी में आप के कार्यकर्ताओं पर हमले किए गए, और अरविंद केजरीवाल पर स्याही फेंकी गई। वहां आप कार्यकर्ताओं को, जिनमें महिलाएं भी थीं, एक से अधिक बार निशाना बनाया गया। वाराणसी के चुनाव के महत्व को देखते हुए, और यह भी देखते हुए कि वहां कितना बड़ा चुनावी दांव लगा है, आयोग को चाहिए था कि वह वहां अधिक ध्यान देता, ताकि बगैर किसी आतंक के स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराए जा सकें। आप नेतृत्व ने चुनाव आयोग से बूथों और संवेदनशील जगहों पर कैमरे लगाने की गुजारिश की थी। मुश्किल यह है कि इतनी अधिक चुनावी शिकायतों से खुद आयोग भी परेशान है।

नौ चरणों में फैले चुनाव ने भी एक दूसरी किस्म की मुसीबत पैदा की है। मोदी ने वोट डालने के बाद बूथ से निकलकर मीडिया से जिस तरह बात की और पार्टी का चुनाव चिह्न लहराया, उसे मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश माना गया। इसलिए आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन मानते हुए उनके खिलाफ एक एफआईआर दर्ज की गई है। इससे पहले भी मोदी पर आचार संहिता के उल्लंघन का आरोप 24 अप्रैल को लगा था, जब वाराणसी में नामांकन पत्र भरने के तत्काल बाद उन्होंने एक बड़ा आयोजन किया था। गुजरात में मोदी ने जो कुछ किया, उससे उनको बचना चाहिए था। तब तो और भी, जब वह प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी हैं। जब चुनाव प्रचार वहां दो दिन पहले ही खत्म हो गया था, तब ऐन मतदान के दिन पार्टी का चुनाव चिह्न लहराना मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश ही माना जाएगा।

लेकिन इससे कुछ और सवाल भी पैदा होते हैं। मान लें कि मोदी ने ऐसी ही कोशिश सीमांध्र में की होती, जहां मतदान होना है और चुनाव प्रचार चल रहा है, तो क्या वहां भी मीडिया मोदी के इस रवैये की ऐसी ही रिपोर्टिंग करता? क्या उसे आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन माना जाता? वाराणसी में समर्थकों की भीड़ के बीच नामांकन करने पर क्या सिर्फ इसलिए प्रतिबंध होना चाहिए कि इससे उत्तर प्रदेश के दूसरे हिस्से में उस दिन हो रहे मतदान पर असर पड़ेगा? इस तर्क को विस्तार दें, तो यही निष्कर्ष निकलेगा कि चुनावी प्रक्रिया की शुरुआत के साथ मीडिया कवरेज पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। या हर चरण के दो दिन पहले मीडिया पर बंदिश लगा देनी चाहिए।


चुनाव को नौ चरणों तक फैलाने को जायज ठहराते हुए आयोग ने कहा था कि निष्पक्ष चुनाव के लिए सुरक्षा बलों को एक जगह से दूसरी जगह भेजने के लिए समय चाहिए। आयोग ने पंजाब, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु में एक-एक चरण में मतदान इसी आधार पर तय किया कि इन राज्यों में हिंसा नहीं होगी। जबकि चुनावी हिंसा के लिए कुख्यात माने जाने वाले बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में उसने कई चरणों में वोटिंग तय की। और सात चरणों तक स्वतंत्र, निष्पक्ष और हिंसारहित चुनाव कराकर आयोग ने निस्संदेह अपनी उपयोगिता साबित की। इसके बावजूद पूरे चुनावी कार्यक्रम को छोटा किया जा सकता था।

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