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चुप्पी, आतंकवाद के बाद कुछ अपनी तो कुछ उनकी बात

Sat, 23 Nov 2013 02:47 PM IST
कल्लोल चक्रवर्ती/दिल्ली
कल्लोल चक्रवर्ती/दिल्ली Updated Sat, 23 Nov 2013 02:47 PM IST
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book reviews

बातों-मुलाकातों में शहरयार

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प्रेम कुमार, वाणी प्रकाशन
मूल्य-395 रुपये

शहरयार को उनकी शायरी से बाहर कम ही लोग जानते हैं। एक तो इसलिए कि उनका मंच से बहुत कम नाता है। दूसरा यह कि प्रचार तंत्र पर उन्हें बहुत भरोसा कभी नहीं रहा। लेकिन प्रेम कुमार की यह किताब उनके जीवन और शायरी को प्रभावी तरीके से सामने आती है। यहां शहरयार की शायरी में व्याप्त चुप्पी और नींद के तिलिस्म खुलते हैं, तो नज्मों और गजलों में दूसरे नामचीन शायरों की खूबियों और उर्दू व पंजाबी शायरी यानी भारत और पाकिस्तान की शायरी के बारे में भी पता चलता है।

उदाहरण के लिए, यह सच सामने आता है कि भारत की उर्दू शायरी ज्यादातर मंचीय है, जबकि पाकिस्तान में मंच ज्यादा नहीं हैं। इसी कारण पाकिस्तानी शायरी में कलात्मकता और मेहनत तुलनात्मक रूप से ज्यादा है, जबकि हमारे यहां दाद पाने पर ज्यादा जोर रहता है। नीरज और नासिरा शर्मा के बाद शहरयार पर केंद्रित इस किताब में भी प्रेम कुमार की मेहनत और गवेषणा दिखाई देती है।
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चुनौतियों से घिरा भारत
शिवकुमार गोयल, हिन्दी साहित्य सदन, मूल्य-100 रुपये


जीवन के पचहत्तर वसंत पूरे कर चुके शिवकुमार गोयल की यह किताब ज्वलंत मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छप चुके उनके लेखों का संग्रह है, और अब भी प्रासंगिक है। इनमें राजनीति में घर कर चुकी अनैतिकता पर टिप्पणी है, तो हिंदी के साथ बरते जाते सुलूक की व्यथा है। गोयल जी को लोग धर्म और अध्यात्म पर लिखने के लिए जानते हैं, लेकिन कम लोगों को मालूम होगा कि कभी वह संसद की रिपोर्टिंग करते थे, पंजाब में आतंकवाद के दौरान उन्होंने भिंडरांवाले का इंटरव्यू लिया था और शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की बहन शास्त्रीदेवी पर एक बहुत भावुक करने वाली रिपोर्ट लिखी थी, जो दिल्ली छावनी के पास चाय की दुकान चलाती थीं! असम और बिहार में बांग्लादेशी घुसपैठियों पर लेख लिखकर शिवकुमार गोयल ने अस्सी के दशक में सनसनी मचा दी थी।
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सुन मेरे बंधु
वेद विलास उनियाल
किताबघर प्रकाशन, मूल्य-295 रुपये

अपनी स्मृतिजनित भावुकता और ईमानदारी के कारण वरिष्ठ पत्रकार वेद विलास उनियाल की किताब के ये लेख ध्यान खींचते हैं। उनके लेख पढ़कर ऐसा लगता है, मानो हम खुद अपना अनुभव साझा कर रहे हों। लेखक के पास अगर पहाड़ के जीवन की ठोस बुनियाद है, तो मुंबई का सघन अनुभव भी। इसी कारण वह जितने अधिकार के साथ हेमवती नंदन बहुगुणा और नरेंद्र सिंह नेगी पर लिखते हैं, उतनी ही तत्परता से नौशाद, सितारा देवी और निदा फाजली पर लिखते हैं।


गावस्कर और सचिन पर लिखे उनके लेख पढ़ने लायक हैं। राजनीति को अगर उन्होंने पत्रकारिता के अपने सुदीर्घ अनुभव से सीखा है, तो खेल और विभिन्न कलाओं के तकनीकी पक्ष पर भी उनकी बारीक से बारीक जानकारी प्रभावित करती है। एक पत्रकार के तौर पर अलग-अलग क्षेत्रों के दिग्गजों से उन्होंने समय-समय पर मुलाकात की, लेकिन उनके लेखन में उसका दर्प नहीं दिखता, जो बड़ी बात है।

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