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कैक्टस के फूल

Sun, 04 Nov 2012 01:26 PM IST
रमण कुमार सिंह
रमण कुमार सिंह Updated Sun, 04 Nov 2012 01:26 PM IST
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book review  by raman kumar singh

कवयित्री नीरजा के दूसरे काव्य-संग्रह कैक्टस के फूल की कविताएं समकालीन जीवन-समाज से साक्षात्कार करती हुईं जिंदगी का उद्घोष करती हैं। 'स्मृति शेष' कविता में जहां मां की ममता क्रूर ईश्वरीय विधान पर सवाल उठाती है, वहीं 'मेरी बिटिया' कविता में कवयित्री की तरल संवेदनाओं का सौरभ बिखरा है। लेकिन कवयित्री की संवेदनाएं मां की ममता तक ही सीमित नहीं रहतीं, बल्कि समकालीन समाज के दो पीड़ित वर्गों-किसान एवं स्त्रियों के पक्ष में भी आवाज उठाती हैं।

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'कहां हैं मेरे खेत' शीर्षक कविता पूछती है कि जब खेतों में कंक्रीट के जंगल उग जाएंगे, तो इस देश की विशाल आबादी का पेट कैसे भरेगा और किसानों के शोषण का सिलसिला आखिर कब रुकेगा! इसी तरह स्त्रियों के प्रति बढ़ते अपराध पर कवयित्री ने कई कविताओं में चिंताएं जताई हैं। बेशक कलात्मकता की दृष्टि से ये कविताएं अनगढ़ एवं कच्ची हैं, लेकिन कवयित्री का विजन स्पष्ट है-आगे बढ़ो, बढ़ो इतना /कि पीछे देखने पर /कोई अफसोस न होने पाए।
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कैक्टस के फूल
नीरजा
प्रकाशक 
मीडिया एसोसिएट्स, दिल्ली-53
मूल्यः 100 रुपये

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