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सभ्यता की प्रयोगशाला में

Mon, 04 Feb 2013 01:58 PM IST
कल्लोल चक्रवर्ती
कल्लोल चक्रवर्ती Updated Mon, 04 Feb 2013 01:58 PM IST
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book review by kallol chkravarty

लोग स्त्रियों को वेश-भूषा और आचार-व्यवहार की हदों में रहने की हिदायत देते हुए अक्सर अपने गौरवशाली अतीत का जिक्र करते हैं, वे भूलते हैं कि वह अतीत बमुश्किल कुछ सौ वर्षों का है। कम से कम वह उस अतीत की सच्चाई तो नहीं ही है, जब मैत्रेयी जैसी स्त्रियां आत्मज्ञान के लिए धन-संपत्ति छोड़ देती थीं या जब विद्योत्तमा और भारती जैसी विदुषियां कालिदास और शंकराचार्य जैसों को पराभूत करती थीं। जिस अतीत का आज इतना गुणगान किया जाता है, जाहिर है, वह मध्यकाल था।

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पहले मुस्लिम शासकों, फिर अंग्रेजों के दौर की असुरक्षा भावना ने ही खासकर बहुसंख्यक हिंदुओं को अपनी स्त्री-कन्याओं के बारे में रक्षणशील और कट्टर होने को विवश किया। अलबत्ता गुलामी के इन दो दौर की तुलना करें, तो भारतीय स्त्रियों के बारे में अजीब ब्योरे मिलते हैं। यह किताब चूंकि औपनिवेशिक भारत में स्त्रियों की स्थिति पर केंद्रित है, इसलिए इसमें यह देखा जा सकता है कि ब्रिटिशों के खुले तौर-तरीकों ने खासकर हमारे अंतःपुर को किस तरह प्रभावित किया।
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अंग्रेज यहां की सामाजिक दशा देखकर चकित थे। घर के अंधेरे कोने में दुबकी स्त्रियों को ज्ञान के खुले आकाश के नीचे लाने के लिए उन्होंने 'मिशन जनाना' शुरू किया, लेकिन यहां का पुरुष वर्चस्ववादी समाज अपनी स्त्रियों को यह हक देने के लिए तैयार नहीं था। पोंगापंथियों की तो छोड़िए, विद्वत समाज भी इस मुद्दे पर अंग्रेजों के खिलाफ था। उसका तर्क था कि जो शिक्षा हमारी स्त्रियों को अंग्रेजन बना देगी, उस शिक्षा से निरक्षर रहना ही भला!
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कितना बड़ा विद्रूप था कि हमारे पुरुष धोती छोड़कर पतलून पहनने लगे थे, पर अपनी स्त्रियों की वेश-भूषा में वे थोड़ी रियायत बरतने को भी तैयार नहीं थे। कुछ समय बाद जब ब्रिटिश सत्ता सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने की अपनी मुहिम में सफल हो गई, तब हमारी स्त्रियों के लिए खतरा अंग्रेज नहीं, बल्कि मुस्लिम हो गए! पहले स्कर्ट हमारी स्त्रियों के लिए चेतावनी थी, अब सलवार-कमीज हो गई। यानी एक के बाद एक सभ्यता हमारे पुरखों को तो बदल रही थी, लेकिन वे अपनी स्त्रियों को बदलते हुए देखना नहीं चाहते थे।

इस शोषण ने औरतों का बहुत कुछ छीन लिया। शिक्षित होने के बारे में तो खैर वे पहले भी बहुत नहीं सोचती थीं, लेकिन अब उन्हें मनोरंजन से भी वंचित कर दिया गया। शादियों में गाली गाने पर शुरू हुई रोक अंततः पीरों की मजारों और मेलों पर प्रतिबंध तक पहुंच गई। अकेले उत्तर प्रदेश की बात करें, तो बनारस के बुढ़वा मंगल, मेरठ की नौचंदी, बुलंदशहर के पचेटा, सिकंदराबाद के मोहाना और खुर्जा में मवाई के मेले या तो अतीत की बात हो गए या इनमें औरतों की स्वच्छंद चहल-पहल लुप्त हो गई।


व्यापक शोध और मेहनत से तैयार की गई इतिहासकार चारु गुप्ता की इस किताब की खासियत यह है कि औपनिवेशिक काल पर केंद्रित यह किताब मौजूदा इक्कीसवीं सदी में भी उतनी ही प्रासंगिक है। सिर्फ यही नहीं कि औरतों के लिए जींस और मोबाइल का इस्तेमाल न करने के फरमान आज भी जब-तब जारी होते हैं, यह भी कि राष्ट्रीय राजधानी में सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या का चर्चित प्रसंग सार्वजनिक छवि वाले एकाधिक लोगों के लिए अपनी संकीर्णता व्यक्त करने का अवसर बन जाता है।

स्त्रीत्व से हिंदुत्व तक, औपनिवेशिक भारत में यौनिकता और सांप्रदायिकता,
चारु गुप्ता,
राजकमल प्रकाशन,
नई दिल्ली,
मूल्य-500 रुपये।

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