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साहित्य के इतिहास पर जमी धूल को साफ करने की कोशिश

Sat, 01 Mar 2014 09:42 PM IST
दिनेश मिश्र
दिनेश मिश्र Updated Sat, 01 Mar 2014 09:42 PM IST
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book review

स्वातंत्र्योत्तर हिंदी के विकास में

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कल्पना के दो दशक, डॉ. शशिप्रकाश चौधरी
राजकमल प्रकाशन, मूल्य-500 रुपए


आजादी के पहले हिंदुस्तान में युगीन राष्ट्रीय चेतना जब जन्म ले रही थी, ऐसे में हिंदी साहित्य ने भी करवट लेनी शुरू की। जन जागृति और स्वाधीन चेतना की उमंग लिए उस दौर के साहित्य ने क्षितिज पर अपने पंख पसार दिए। उस दौर में स्वाधीनता के सपने जगाने वाली 'काल', 'मराठा', 'प्रताप', 'केसरी' और 'युगांतर' जैसी पत्रिकाएं थीं, तो बरसों से सोई पड़ी सामाजिक-राजनीतिक चेतना को जगाने का काम 'कवि वचन सुधा', 'प्रदीप', 'इंदु', 'माधुरी', 'सरस्वती', 'हंस', 'विशाल भारत', 'हिंदी नवजीवन' जैसी पत्रिकाएं भी कर रही थीं।

आजादी के बाद तो कुछ दिनों तक भले ही उमंगों का दौर रहा, मगर यह खुमारी जल्द ही टूटने लगी। गुलामी के दौर में लोगों ने अलसाई आंखों से जो सपने देखे थे, वे अब उनके सामने ही दम तोड़ रहे थे। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, अन्याय और शोषण हिंदुस्तान के नव आजाद समाज की संस्कृति में अनायास ही घुसपैठ करते जा रहे थे। ऐसे में राजनीतिक-सामाजिक चेतना के साथ-साथ भला साहित्य चेतना कैसे चुप बैठती। उसने भी रचनाकारों के जरिये अपने समय के सरोकारों के साथ बिगुल फूंकना शुरू कर दिया।
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जैसा कि प्रख्यात साहित्यकार केदारनाथ अग्रवाल आजादी से मोहभंग की स्थिति को अपनी कविता में बयान करते हैं, ‘आज भी आई, कल भी आई, रेल बराबर सब दिन आई, लेकिन दिल्ली से आजादी, हाय अब तक आज न आई।’ दुष्यंत, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, शमशेर बहादुर सिंह जैसे कुछ ऐसे ही साहित्यिक स्वरों को मुखरित करने और आजाद भारत से मोहभंग की आवाज बनी ‘कल्पना’ पत्रिका।
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इस पत्रिका ने कभी दक्कनी उर्दू का केंद्र रहे हैदराबाद शहर से साहित्यिक चेतना को पुकारा था। इसी पत्रिका के प्रवेशांक से अगले 20 साल तक (1949-1969) के अंकों पर आधारित है मौजूदा किताब ‘स्वातंत्र्योत्तर हिंदी के विकास में कल्पना के दो दशक’। दरअसल यह किताब एक तरह से अपने दौर के दस्तावेज को सहेजने की एक कोशिश भी है, जो आसान कार्य नहीं था। बेहद श्रमसाध्य और जटिल कार्य को डॉ. शशिप्रकाश चौधरी ने अपनी इस शोध प्रबंध किताब में बड़ी ही सहजता के साथ संजोया है।


चौधरी ने अपने गुरु और वरिष्ठ आलोचक डॉ. नामवर सिंह को यह किताब समर्पित की है, जिससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस किताब के जरिये पत्रिका के तमाम अंकों पर चौधरी ने भी आलोचक की तरह पैनी नजर डाली है। किताब में कविता, कहानी, उपन्यास, संस्मरण, यात्रा वृत्तांत जैसी हिंदी साहित्य की हर उस विधा को खंगाला गया है, जो उन बीस वर्षों के दौरान रचनाकार अपने समय में महसूस करते रहे हैं। वे अपने समय की पड़ताल करते नजर आते हैं, जिस पर इतिहास की धूल जम गई थी। चौधरी उस दौर के रचनाकारों और उनके कृतित्व पर जमी हुई कुछ धूल साफ करने में काफी हद तक सफल रहे हैं।

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