कविता के भूगोल में अलग सी एक बगावत
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हर कोशिश है एक बगावत- राजेंद्र कुमार,
प्रकाशक- अंतिका प्रकाशन, मूल्य-350 रुपये
हिंदी समाज में कवि रूप में अपनी पहचान राजेंद्र कुमार ने सन् 1978 में प्रकाशित अपने पहले कविता संग्रह 'ऋण गुणा ऋण' से अर्जित की थी।
बाद में इलाहाबाद से 'अभिप्राय' नाम की एक साहित्यिक पत्रिका के प्रकाशन-संपादन में प्रवृत्त हुए। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएं छपती तो निरंतर रहीं, लेकिन कोई स्वतंत्र संग्रह प्रकाशित न हो सका।
लगभग पच्चीस वर्षों के लंबे अंतराल के बाद उनके दूसरे संग्रह 'हर कोशिश है एक बगावत' का प्रकाशित होना एक प्रीतिकर परिघटना है।
रचनाकाल की दृष्टि से इन कविताओं का समय सन् 1963 से 2011 तक के दीर्घ विस्तार को घेरता है। इन कविताओं के नीचे उनका रचनावर्ष दिया गया है।
इससे एक लाभ यह होता है कि पाठक को हर कविता के समय-संदर्भ को अपनी स्मृति में चमक उठते देखने की अनुभूति भी सहज होने लगती है।
मसलन दिए गए नाम को लेकर 'चिड़िया', 'धरम का रास्ता', 'बताने का उन्माद' जैसी कविताएं बाबरी मस्जिद ध्वंस के संदर्भ में हमें संवेदित करती हैं।
'सपने खुदे पड़े हैं', 'सोख्ते', 'आसमान जब बहुत साफ-सा दिखता है' आदि अनेक कविताएं अघोषित आपातकाल जैसी स्थितियों से संदर्भित होकर विशेष अर्थ देने लगती हैं।
भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण जैसी नीतियों की विडंबना की दस्तावेजी कविता हैं- 'मनमोहनी अदा का दावत नामा'। दुनियाभर के पूंजीवादी शासकों के प्रच्छन्न आपसी समझौते का क्रूर सत्य यह है- 'मछलियां, किसी भी तालाब की हों मनमानी/ हम भी फंसाए और आप भी फंसाइये।
इस तरह की अनेक यथार्थ-बोधक काव्य-पंक्तियां इस संग्रह की कविताओं में आती हैं, तो सहसा ही नागार्जुन के व्यंग्यों की याद हो आती है। संग्रह की कविताएं तीन खंड में हैं।
पहला खंड उन कविताओं का है, जिनमें कवि की संकल्पधर्मी चेतना अपनी रचनात्मक कोशिशों की पहचान में संलग्न है। दूसरा खंड है कविता का सवाल।
कविता विचारों के अमूर्त जंगल में भटकती रह जाए तो कला होने का वहम वह भले ही पाल ले समाज-संवेदी कविता होने से वंचित रह जाती है।
जीवन और समाज के बीच से उठने वाले सवालों को कविता खुद अपने सवालों के रूप में ले इसी में उसकी सामाजिक अर्थवत्ता है। कविता का सवाल खंड की कविताएं स्थिति-चित्रों का एक सजीव अलबम प्रतीत होती हैं।
एक स्थिति चित्र देखिए- 'यह पृथ्वी खाली नहीं है धर्मात्माओं से/दाता-दानियों से/दयालुओं-कृपालुओं से/ पता नहीं किन-किन आलुओं से भरी पड़ी है पृथ्वी।' आलुओं की ऐसी उपस्थिति का व्यंग्य सचमुच स्थिति की रंग-रेखाओं को उभारकर रख देता है।
तीसरे खंड कविता के किरदार के अंतर्गत कुछ अद्भुत व्यक्ति चित्र हैं। कहीं कारुणिक, कहीं विद्रूप, कहीं रोचक, कहीं त्रासद। 'बहादुरशाह जफर' से संवाद में इतिहास और वर्तमान दोनों मानों परस्पर संवाद में है।
इस संवाद में जितनी करुणा है, उतना ही क्षोभ और उतना ही आक्रोश भी।
एक ओर 'छन्नन' और 'मनमन मियां' कविता के किरदार हैं, तो दूसरी ओर 'बाबू राम सहाय' और 'मिसेज बागला' आदि। जीवन की कहानी के ये किरदार कवि की रचना के किरदार बनकर कुछ अलग ही रंग पा जाते हैं।
इस खंड में कवियों पर (निराला, नागार्जुन, अज्ञेय, शमशेर, केदार आदि) लिखी कविताएं इस तथ्य का पता देती हैं कि कवि राजेंद्र कुमार की अपने प्रेरणा-पुरुषों के साथ एकात्मकता कितनी आत्मीय है।
नागार्जुन पर लिखी कविता की कुछ पंक्तियां द्रष्टव्य हैं-''घिन ही आती हमें/उन सबों के बीच उठते-बैठते/देह जिनकी गंधाती है पसीने से/ बदलने को नहीं जिनके पास कपड़े/ बदलने को पास है मगर दुनिया।''
राजेंद्र कुमार की कविताएं पढ़ना एक स्फूर्तिप्रद अनुभव होगा उन पाठकों के लिए जो समय सहज हैं, जिनके पास कुछ हो या न हो, वह इस दुनिया को बदलना चाहते हैं।