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वापस लौटने का वादा रहा

Sat, 06 Jul 2013 09:48 PM IST
हिमानी दीवान
हिमानी दीवान Updated Sat, 06 Jul 2013 09:48 PM IST
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सौरभ बुधकर की कविताएं सीधे आपसे संवाद करती हैं। बिना किसी लाग-लपेट और औपचारिक भूमिका के यह कविताएं न सिर्फ आपके मन में दाखिल होती हैं बल्कि आपको भी लिखने की प्रेरणा देती हैं।

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सौरभ एक ऐसे युवा कवि हैं, जिन्हें लगता है कि कवि कोई अलग-सा व्यक्ति नहीं होता। फर्क सिर्फ इतना है कि वह हर स्थिति में कुछ प्रतीक ढूंढकर उन्हें अभिव्यक्त करना जानता है। इसी अभिव्यक्ति की झलक सौरभ के पहले कविता संग्रह ‘लौटूंगा जरूर’ में दिखाई देती है। साहित्य की दुनिया में सौरभ बुधकर नया नाम जरूर है, लेकिन इसे समर्थ नाम कहना उचित होगा।
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सौरभ लिखते हैं, 'सदी पुराने अंधियारों में तू तो एक सवेरा लिख/ लिख कर पीड़ा कम हो जाती, जब तक दम है, तब तक लिख।' 'लौटूंगा जरूर' काव्य-संग्रह पांच भागों में विभाजित है। इन पांच भागों को कवि ने अहसासों के अलग-अलग आयामों के अनुसार संग्रहित किया है।
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मसलन पहले भाग में स्वागत कविताएं हैं, दूसरे भाग 'ढाई आखर' में प्रेम कविताएं। तीसरे भाग 'प्रश्न' में एक कवि के मन में उठे कुछ सवालों की अभिव्यक्ति है। चौथे भाग 'यूं ही' में कवि ने ‘फुल टाइमपास’, ‘झोली भर पत्थर’ और ‘कविता कर्तव्य है’ जैसी कुछ ऑफ बीट कविताएं लिखी हैं।

पांचवें और आखिरी हिस्से 'प्रसंगवश' में मन में उठी अनुभूतियों को शब्दों में पिरोया गया है। सरल शैली और सुगठित वाक्य-विन्यास से बनी यह कविताएं अनायास ही पाठक के मन में जगह बना लेती हैं। कविताओं में उकेरे गए सजीव बिंबों के साथ-साथ प्रत्येक कविता के साथ जोड़ा गया पल्लव बुधकर का छायांकन भी अद्भुत है। चॉक और मिट्टी से बने चित्रों की फोटोग्राफी के साथ इस काव्य संग्रह में हर कविता को जीवंत रूप देने की कोशिश की गई है। सौरभ के शब्दों में कहें तो ‘सभी शब्द सिर्फ उसी अर्थ तक पहुंच पाते हैं, जहां तक होता है अनुभव।’


इस काव्य संग्रह में शब्दों के जरिये सौरभ का अनुभव भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। मार्केटिंग की दुनिया में दिन-रात खपाने वाला एक शख्स हिसाब-किताब के अलावा भी कितने अहसासों और जज्बातों को अपने साथ समेट सकता है, यह जानने और समझने के लिए सौरभ बुधकर का यह काव्य संग्रह पठनीय है।

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