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अपनी ही पिच पर बोल्ड

Sun, 16 Dec 2012 12:15 AM IST
मदन लाल
मदन लाल Updated Sun, 16 Dec 2012 12:15 AM IST
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bold on its own pitch

भारतीय क्रिकेट टीम की वर्तमान स्थिति पर आप संतुष्ट नहीं हो सकते। अपनी ही पिच पर और अपने दर्शकों के बीच भारतीय टीम जिस तरह खेल रही है, वह उसकी प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं है। बल्लेबाज बड़ी पारियां नहीं खेल रहे और स्कोर बोर्ड पर गेंदबाजों के आगे विकेट तो दिख रहे हैं, लेकिन उनकी गेंदों में धार नहीं है। वर्ष 2004 के बाद से जब भारत ने अपने देश में कोई शृंखला नहीं गंवाई हो, पहली बार महेंद्र सिंह धोनी की टीम लड़खड़ा रही है। मैदान ही नहीं, उसके बाहर से आती खबरों, अफवाहों से समझा जा सकता है कि भारतीय क्रिकेट में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है।

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सबके जेहन में यही बात घुमड़ रही है कि आखिर इंग्लैंड के सामने हम किस तरह नतमस्तक हो गए। सबसे पहले तो यह सोचना चाहिए कि जब तक हमारे शीर्ष क्रम के बल्लेबाज रन नहीं बनाते, हम विपक्षी टीम को चुनौती देने की स्थिति में नहीं होते। हमारे बड़े बल्लेबाज बड़ा स्कोर नहीं कर पा रहे हैं। बड़े स्कोर के साथ निरंतर अच्छा खेलते रहना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। भारतीय बल्लेबाजी की यह दशा कई कारणों से है।
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देखने में आ रहा है कि हमारे बल्लेबाज अक्सर बड़े शॉट्स खेल रहे हैं। टेस्ट मैच में उन्हें टिककर खेलना चाहिए। पिछले कुछ समय से लप्पेबाजी की बल्लेबाजी को कुछ ज्यादा पसंद किया जा रहा है। टेस्ट और ट्वंटी-20, आप इन दोनों जगहों पर बहुत फर्क नहीं कर पाएंगे। जबकि ऐसा होना चाहिए। चार-पांच घंटे क्रीज पर टिककर खेलने वाले बल्लेबाज नहीं होंगे, तो टेस्ट में बड़ी चुनौती नहीं दी जा सकती। ऐसी जिम्मेदारी कोई ले नहीं रहा है। सचिन, युवराज, विराट कोहली और कप्तान धोनी के बल्ले से रन ही नहीं निकल रहे हैं। सहवाग अपना स्वाभाविक खेल खेलते हैं, पर भारत को उनसे लगातार रन चाहिए।
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भारत के स्पिनर भी नहीं चल रहे और पेस बालरों को हमने दूर ही रखा है। एक तो विपक्षी टीम के सामने कम टारगेट रख रहे हैं और फिर हमारे गेंदबाज औसत गेंदबाजी कर रहे हैं। ऐसे में इंग्लैड का भारत पर एकदम हावी हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं। इंग्लैड की टीम बल्लेबाजी, गेंदबाजी और फील्डिंग हर मोर्चे पर हमसे बेहतर साबित हई है।

टीम हारने लगती है, तो कई तरह की बातें भी उठने लगती है। अधिक दिन नहीं हुए, जब हमने महेंद्र सिंह धोनी की अगुआई में विश्व कप जीता था, लेकिन अब उनकी कप्तानी तो छोड़िए उनके टीम में बने रहने पर भी सवाल उठने लगे हैं। मगर सवाल है कि अभी आपके पास धोनी का विकल्प कौन है? अगर धोनी की कप्तानी को लेकर कोई फैसला करना भी है, तो सीरीज के बीच में ऐसी बातें नहीं उठनी चाहिए। ऐसे फैसले बाद में भी लिए जा सकते हैं। वैसे अभी उन्हें मौका देना चाहिए।

मगर, धोनी को भी कुछ जगहों पर अनावश्यक हस्तक्षेप से बचना चाहिए। यदि वह सोचते हैं कि पहले ही दिन से ही पिच उनके अनुकूल होती दिखे, टर्न लेती दिखे, तो ऐसा नहीं हो सकता। आखिर आप अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेल रहे हैं। यह सही है कि मेजबान टीम अपने अनुकूल पिच बनाती है, लेकिन पहले दिन से ही अपनी चालों में उलझने का क्या मतलब। हमने तेज पिचों की ओर ध्यान नहीं दिया, उसी का नतीजा भुगत रहे हैं कि बरसों से हम अच्छे तेज गेंदबाज के लिए तरस रहे हैं।

देश में क्रिकेट तो खूब खेला जा रहा है, लेकिन पिछले कुछ समय से टीम को नायक नहीं मिल रहे हैं। किसी खिलाड़ी के हटने पर दूसरे खिलाड़ी को लाकर जगह तो भरी ही जाएगी। मगर, हमें स्टार खिलाड़ी नहीं मिल रहे हैं। फिर कहा जा सकता है कि ट्वंटी-20 और चलताऊ किस्म के क्रिकेट में जिस तरह पैसा आया है, उससे अलग ट्रेंड के खिलाड़ी सामने आ रहे हैं। ऐसे में गावस्कर, सचिन या कपिल जैसे खिलाड़ी कैसे मिलेंगे।


द्रविड़ जैसे भरोसेमंद और कुंबले, श्रीनाथ, जैसे गेंदबाज कहां से आएंगे।  रविंद्र जडेजा, पीयूष चावला को अपने को साबित करने का अवसर मिला है। अशोक डिंडा, परविंदर अवाना जैसे मीडियम पेसर गेंदबाजों के लिए अवसर बन रहे हैं। पर वे कहां तक अपने को साबित कर पाते हैं, यह समय की बात है। फिलहाल भारतीय टीम की चुनौती अपने सम्मान को बनाए रखने की है।

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