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बोर्ड ऑफ पीस: क्या अब दुनिया दो समानांतर संस्थाओं के साथ चलेगी? भारत को कई संतुलन साधने होंगे
Tue, 20 Jan 2026 06:32 AM IST
लव गौर
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: लव गौर
Updated Tue, 20 Jan 2026 06:32 AM IST
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
- फोटो :
अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय युद्धों व संघर्षों के प्रबंधन के लिए एक नए वैश्विक निकाय ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (शांति समिति) का हिस्सा बनने के लिए प्रधानमंत्री मोदी सहित विश्व के तमाम अन्य नेताओं को जो आमंत्रण दिया है, उसने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की दिशा पर एक नई बहस छेड़ दी है। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष ट्रंप द्वारा गाजा के लिए प्रस्तावित 20 सूत्री शांति योजना के तहत गाजा को एक तकनीकी, गैर-राजनीतिक फलस्तीनी समिति के अस्थायी शासन के अधीन रखा जाना था।इसकी निगरानी एक नए अंतरराष्ट्रीय निकाय ‘शांति समिति’ द्वारा होनी थी। उस वक्त शांति योजना और शांति समिति को संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी भी मिल गई थी। लेकिन, अब 60 से अधिक देशों के नेताओं को इसमें शामिल होने का जो आमंत्रण भेजा गया है, उसके चार्टर में गाजा का जिक्र तक नहीं है, जिससे यह आशंका मजबूत होती है कि बोर्ड का दायरा गाजा से कहीं आगे तक फैल सकता है। ट्रंप खुद इसे जीवन भर अपनी अध्यक्षता में चलाने की योजना भी बना रहे हैं। इतना ही नहीं, इसकी स्थायी सदस्यता के लिए एक अरब डॉलर की नकद राशि मांगी जा रही है, जिससे एक ऐसे मॉडल की झलक मिलती है, जो संयुक्त राष्ट्र से बिल्कुल अलग और व्यावसायिक अधिक लगता है।
दरअसल, यह कदम ट्रंप की विदेश नीति का हिस्सा मालूम होता है, जो ‘अमेरिका-फर्स्ट’ के नाम पर बहुपक्षीय संस्थाओं को कमजोर करने पर केंद्रित है। जहां तक बात भारत की है, तो इसमें संदेह नहीं कि वह स्वाभाविक रूप से वैश्विक सुरक्षा पर चर्चा करने वाले अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का हकदार है और वह ऐसा करना भी चाहेगा। ऐसे वक्त में, जब नई शक्ति संरचनाएं सक्रियता से स्थापित की जा रही हों, तब वह मूकदर्शक के रूप में बिल्कुल भी नहीं बैठना चाहेगा। लेकिन ट्रंप की अध्यक्षता वाले ऐसे मंच से जुड़ने के अपने जोखिम भी हो सकते हैं। हम संयुक्त राष्ट्र को मजबूत बनाने की वकालत और सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग करते आए हैं। इसके अलावा, शांति समिति में शामिल होने का आमंत्रण पाकिस्तान को भी मिला है, जिसके साथ जुड़ना एक अलग कूटनीतिक चुनौती है।
लिहाजा, ट्रंप की शांति समिति पर कोई भी निर्णय लेते समय भारत को अपनी वैश्विक प्रतिष्ठा, बहुपक्षवाद को समर्थन की नीति और संयुक्त राष्ट्र के प्रति दीर्घकालिक प्रतिबद्धता के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। अभूतपूर्व उथल-पुथल के दौर में नई दिल्ली को पुरानी रूढ़ियों से परे जाकर अपनी बहुपक्षीय रणनीतियों पर नए सिरे से पुनर्विचार करने की भी जरूरत है।