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अंकों की बदहवास दौड़

Mon, 08 Jul 2013 08:58 PM IST
सुरेंद्र कुमार
सुरेंद्र कुमार Updated Mon, 08 Jul 2013 08:58 PM IST
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blind competition of marks

जून का महीना आते ही हर साल हजारों परेशान छात्रों का दिल्ली के प्रमुख कॉलेजों में नामांकन के लिए संघर्ष शुरू हो जाता है। ऐसे खुशनसीब कम ही होते हैं, जिनकी मनोकामना पूरी होती है। अधिकतर छात्र निराश ही होते हैं। अब 95 फीसदी अंक भी दिल्ली के प्रमुख कॉलेजों में नामांकन की गारंटी नहीं रही। कुछ प्रिंसिपलों का तर्क है कि वे उन छात्रों की कैसे अनदेखी कर सकते हैं, जिन्होंने शत-प्रतिशत अंक हासिल किया है।

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क्या यह सब शिक्षा के उच्च स्तर को बरकरार रखने के नाम पर नहीं किया गया है? इससे बड़ी मूर्खता क्या हो सकती है कि एक विश्वविद्यालय, जिसकी गिनती दुनिया के शीर्ष 150 विश्वविद्यालयों में भी नहीं होती, 95 फीसदी से कम अंक लाने वाले छात्रों का आवेदन इसलिए खारिज करता है, क्योंकि उसे अपना स्तर बरकरार रखना है! आखिर मौजूदा स्थिति के लिए लिए किसे जिम्मेदार ठहराएं? जनसंख्या को देखते हुए जब चीन में 2,500 से अधिक विश्वविद्यालय हैं, तो क्या भारत में भी 1,500 से अधिक विश्वविद्यालय नहीं होने चाहिए?
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अपने मानदंडों पर गर्व करने की विश्वविद्यालयों की झूठी भावना युवाओं पर कहर बनकर टूट रही है। मैं यहां जनसांख्यिकीय के आधार पर छात्रों को लाभ देने की मांग नहीं कर रहा, बल्कि हमें समझना होगा कि जनसांख्यिकीय लाभांश और जनसांख्यिकीय आपदा के बीच एक महीन रेखा ही होती है। ऐसा कोई अध्ययन अब तक नहीं आया है, जो साबित करे कि जो छात्र 98 या 100 फीसदी अंक प्राप्त करते हैं, वे उन छात्रों से बेहतर प्रशासक, अकादमिक, कानूनविद, राजनयिक, लेखक, राजनेता, मीडियाकर्मी या व्यवसायी होते हैं, जो कम अंक लाते हैं।लिहाजा हमें परीक्षा में अंकों के भंवरजाल में उलझने के बजाय छात्रों की व्यक्तिगत ऊर्जा आंकने की ऐसी प्रणाली अपनानी चाहिए, जो ज्यादा वैज्ञानिक, तर्कसंगत और निष्पक्ष हो।
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अमेरिका के केलॉग स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के चर्चित डीन डॉ डोनाल्ड जैकब्स ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि उन्होंने भारत के मानव संसाधन मंत्रालय को कई बार बताया है कि उनके पास जिस तरह का बुनियादी ढांचा और मजबूत फैकल्टी (संकाय) है, उसे देखते हुए आईआईटी संस्थान वर्तमान से चार गुना ज्यादा छात्रों का नामांकन कर सकते हैं। लेकिन दुखद है कि आईआईटी इस तर्क को मानने को तैयार नहीं। वह कहते हैं, हम अपना स्तर कम नहीं कर सकते। ऐसे में कुछ कठोर कदम ही मौजूदा स्थिति सुधारने में कारगर हो सकता है।

ऐसे ही प्रयासों में एक है, कट-ऑफ पर सर्वोच्च न्यायालय का स्वतः संज्ञान लेते हुए विश्वविद्यालयों को अत्यधिक फीसदी अंक देने से रोकना। अपने-अपने क्षेत्रों में नामचीन खुशवंत सिंह, नटवर सिंह, मणिशंकर अय्यर, अमिताभ घोष, शेखर कपूर जैसे लोग कभी अक्ल से पैदल नहीं रहे, लेकिन उन्होंने नब्बे-सौ फीसदी अंक भी हासिल नहीं किए। इसी तरह, ऐसे अत्याधुनिक विश्वविद्यालयों की स्थापना करनी चाहिए, जिसमें छात्रों के चरित्र, ईमानदारी, नैतिक और पारंपरिक मूल्य पर ध्यान देने का साथ ही उनकी बौद्धिक क्षमता निखारने का प्रयास हो।

छात्रों की भारी भीड़ रोकने के लिए जरूरी यह भी है कि हर राज्य में वोकेशनल ट्रेनिंग संस्थान पर्याप्त मात्रा में हो, जो औद्योगिक क्षेत्रों की वर्तमान जरूरत को ध्यान में रखकर खोले जाएं। प्रयास वर्चुअल क्लास की भी हो सकती है, जिसकी तरफ राष्ट्रीय शिक्षा आयोग के अध्यक्ष डॉ सैम पित्रोदा भी इशारा करते हैं। वह कहते हैं कि एमआईटी, हार्वर्ड, स्टेनफोर्ड जैसे विश्वविद्यालयों में जब एक क्लिक पर हजारों पन्ने उपलब्ध हैं, तो ऐसी तकनीक अपने यहां क्यों नहीं अपनाई जा सकती? मैसिव ओपेन ऑनलाइन कोर्सेस परंपरागत विश्वविद्यालयों में सीटों की कमी दूर करने में सहायक हो सकते हैं। लेकिन ये सभी कदम तभी कारगर होंगे, जब शिक्षा के मद में बजट का आवंटन अधिक है, जो अभी अपेक्षाकृत कम है।


आज जब सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद भी निजी स्कूल 25 फीसदी सीट आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को देने को तैयार नहीं दिखते, सैकड़ों-हजारों छात्र समुचित बुनियादी शिक्षा नहीं शुरू कर सकते और कम अंक के कारण हजारों छात्र डिग्री कॉलेजों में नामांकन नहीं करवा सकते, तो क्या हमारा देश आगामी 20 वर्षों में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बन सकती है?

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