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दक्षिण में भाजपा की परीक्षा: संगठनात्मक कमजोरी के कारण पांव नहीं पसार सकी पार्टी

Tue, 04 Jun 2019 07:12 AM IST
Raman Singh जी श्रीदत्तन
जी श्रीदत्तन Published by: Raman Singh Updated Tue, 04 Jun 2019 07:12 AM IST
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BJP's examination in south
भाजपा - फोटो : amar ujala

वाईएसआर कांग्रेस के प्रमुख जगन मोहन रेड्डी ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले ली है। आंध्र के विभाजन के बाद वह दूसरे मुख्यमंत्री बने हैं। वह ऐसे समय में राज्य के मुख्यमंत्री बने हैं, जब उत्तर, पूर्व, पूर्वोत्तर, पश्चिम और मध्य भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लहर चल रही है, लेकिन दक्षिण भारत मोटे तौर पर उस लहर से अछूता है। दक्षिण भारत में मात्र एक राज्य कर्नाटक है, जहां भाजपा ने जद (एस) और कांग्रेस के लिए मात्र एक-एक सीटें ही छोड़ीं।


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हालांकि तेलंगाना में भाजपा चार लोकसभा सीटों पर कब्जा जमा कर भारी फायदे में रही, लेकिन वहां सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) लोकसभा की नौ सीटें जीतकर प्रमुख पार्टी बनी है। भाजपा के नेतृत्व में राजग को आंध्र प्रदेश और केरल में लोकसभा की एक भी सीट नहीं मिली, जबकि अन्नाद्रमुक से गठबंधन के कारण तमिलनाडु में एक सीट मिली। यह तथ्य है कि भाजपा दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में अपनी मौजूदगी नहीं जता पाई है।

आंध्र प्रदेश में भाजपा संगठनात्मक कमजोरी के कारण अपने पांव नहीं पसार सकी। वह इस राज्य में उत्तर भारतीय पार्टी होने की अपनी छवि को नहीं तोड़ पाई, जहां मजबूत क्षेत्रीय भावनाओं ने राजनीतिक आंदोलनों को हवा दी है। अभिनेता से राजनेता बने एन टी रामाराव ने तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) का गठन ही 'उत्तर भारतीय भ्रष्ट पार्टी' कांग्रेस को राज्य से उखाड़ फेंकने के लिए किया था।

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दक्षिण में एकमात्र पार्टी जो बड़ी जीत हासिल करने में सक्षम रही, वह थी तेदेपा। हालांकि, बाद में वाईएस राजशेखर रेड्डी के नेतृत्व में कांग्रेस ऐतिहासिक जीत दर्ज करने में कामयाब रही, पर आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद उसका अस्तित्व खत्म हो गया। भाजपा हमेशा तेदेपा के सहारे वहां कुछ सीटें जीतती रही। इस बार भाजपा ने वहां गठबंधन नहीं किया था, इसलिए उसका वोट प्रतिशत घटकर 0.96 फीसदी रह गया।

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