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बिरयानी खिलाएं, पर जी न कहें

Thu, 17 Jan 2013 12:30 AM IST
Updated Thu, 17 Jan 2013 12:30 AM IST
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biryani feed, not live to tell
आतंकवादियों के मामले में अब एक चीज का बहुत ही ध्यान रखना पड़ेगा साहेबान कि कहीं उनके नाम के साथ श्री न लग जाए या उन्हें जी कहकर संबोधित न कर दिया जाए। अगर ऐसा हो गया, तो सचमुच मुश्किल हो जाएगी। बेचारी सरकार की थू-थू होने लगेगी और मंत्री तो मुंह ही छिपाने लगेंगे। वैसे भी सरकार की आजकल कौन-सी वाह-वाह हो रही है। आए दिन उनके मंत्रियों के बयान चर्चा में रहते हैं। फिर भी आतंकवादियों के मामले में चूक का न कोई जवाब देते बन पड़ेगा और न ही कोई बचाव हो सकेगा। जैसे पिछले दिनों शिंदे साहब के साथ हो गया।
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उन्होंने लश्कर वाले हाफिज सईद के साथ श्री लगा दिया, तो विपक्ष भड़क उठा। इससे पहले दिग्गी राजा लादेन के मामले में ऐसा कर चुके थे। उन्होंने लादेन के नाम के साथ जी लगा दिया था। हालांकि उसे मार गिरानेवाले अमेरिकी भी एक जमाने में उसे जी से लगाए रहे थे। यह अजीब बात है कि आतंकवादी को बिरयानी तो खिलाई जा सकती है, लेकिन उसके नाम के साथ जी नहीं लगाया जा सकता। क्योंकि यह तो कुफ्र हो जाएगा।
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सो, अब यह ध्यान रखना पड़ेगा कि उनके लिए संबोधन ऐसा कतई न हो कि वे आदरणीय लगें। सुरक्षा में चूक तो चल जाएगी, पर संबोधन में चूक नहीं चलेगी। भाजपा वाले बहुत नाराज हो जाएंगे। हालांकि बताते हैं कि संघ में जी कहकर संबोधित करना सिखाया जाता है। संस्कार सिखाए जाते हैं। पर यह सीख अपनों के लिए होती है, परायों के लिए नहीं। यह समस्या बड़ी गंभीर है जी। अब आतंकवादियों को कोसा तो जा सकता है, उन्हें ललकारा जा सकता है, उन्हें फांसी भी दी जा सकती है, पर गाली नहीं दी जा सकती। गाली यारों-दोस्तों को दी जाती है, आतंकवादियों को नहीं। मामला असंसदीय हो उठेगा।
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यह शालीनता का, शिष्टाचार का तकाजा होता है कि भाषा असंसदीय न होने पाए। संसद में शोरगुल, हल्ला-हंगामा तो हो सकता है, माइक तोड़े जा सकते हैं, कुर्सिया फेंकी जा सकती हैं, कागज फाड़े जा सकते हैं। मतलब व्यवहार तो असंसदीय हो सकता है, पर भाषा असंसदीय नहीं हो सकती। पर आतंकवादियों के प्रति संबोधन का क्या किया जाए? न उनके प्रति संबोधन ऐसे हों कि वे आदरणीय लगें और न ही उनके लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जा सकता है, जो असंसदीय हो। तो क्या किया जाए? तो क्यों न इस मामले में भी एक प्रोटोकॉल बनाया जाए!

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