भोजन से जुड़ा जैव विविधता का संकट : जीवन को दो तरह से देखा जाता है
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इस बार के अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस की थीम एक ऐसे विषय पर केंद्रित है, जिससे आज जीवन और प्रकृति को समझने-समझाने में सहायता मिल सकती है। जीवन को दो तरह से देखा जाता है, आवश्यकताएं व सुविधाएं। इन दोनों में ज्यादा महत्वपूर्ण आवश्यकताएं हैं, जिसमें पानी, भोजन, हवा आती हैं और दूसरा हिस्सा सुविधाओं से जुड़ी जीवनशैली है। हमारी सोच आज दूसरे पहलू पर ज्यादा केंद्रित है और यही कारण है कि हवा, मिट्टी और पानी की अनदेखी सवाल खड़े करने लगी है।
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इस बार के अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस की थीम एक ऐसे विषय पर केंद्रित है, जिससे आज जीवन और प्रकृति को समझने-समझाने में सहायता मिल सकती है। जीवन को दो तरह से देखा जाता है, आवश्यकताएं व सुविधाएं। इन दोनों में ज्यादा महत्वपूर्ण आवश्यकताएं हैं, जिसमें पानी, भोजन, हवा आती हैं और दूसरा हिस्सा सुविधाओं से जुड़ी जीवनशैली है। हमारी सोच आज दूसरे पहलू पर ज्यादा केंद्रित है और यही कारण है कि हवा, मिट्टी और पानी की अनदेखी सवाल खड़े करने लगी है।
जीवन के दोनों पहलू अंततः जैव विविधता से जुड़े हैं। मसलन, तमाम तरह के कृषि उत्पाद, फसलें, फल, जड़ी-बूटी ये सब जैव विविधता के प्रताप से हैं। गहराई में जाएं, तो विलासिता के आधार भी जैव विविधता से जुड़े मिलेंगे। पर पेट के सवाल बड़े हैं और उसी से स्वास्थ्य भी जुड़ा है और इन दोनों का आधार जैव विविधता है। उदाहरण के लिए, अगर दुनिया की 90 फीसदी जैव विविधताएं पिछले 100 वर्षों में किसान के खेतों से गायब होती जा रही हों और दूसरी तरफ पालतू जानवरों की आधी से ज्यादा नस्लें खत्म हो चुकी हों, तो यह समझने के लिए काफी है कि 'ऑल इज नॉट वेल'।
थाली से गायब होते खाद्य पदार्थों की विविधता हमारी शारीरिक आवश्यकताओं को गड़बड़ा सकती है। ग्लोबलाइजेशन, मुक्त आर्थिकी व व्यापार का एक कड़वा हिस्सा यह भी है कि हमने स्थान विशेष के भोजन व आवश्यकताओं को दरकिनार कर दिया है और इसीलिए स्वास्थ्य संबंधी संकट के सवाल भी खड़े हुए हैं। भोजन का बदलाव निश्चित रूप से प्रतिकूल असर डालता ही है। जिस तरह से दुनिया में जैव विविधता बड़े संकटों से गुजर रही है, तो तय मानिए कि हम अपने भोजन व स्वास्थ्य को भी तेजी से खो रहे हैं।
विकास विनाशकारी साबित हो रहा है। दुनिया में हर वर्ष एक लाख 15 हजार वर्ग किलोमीटर जंगल विकास की भेंट चढ़ जाते हैं और जब भी ऐसा होता है, तो अन्य वन्य जीव व प्रजातियां भी इसकी चपेट में आ जाती हैं। और इतना ही नहीं, वनीकरण इसकी पूरी भरपाई नहीं कर पाता। पारिस्थितिकी तंत्र मात्र वन ही नहीं, बल्कि छोटी वनस्पति प्रजातियों, जीव जंतुओं, कीड़े-मकौड़ों, बैक्टीरिया व वायरस का एक सामाजिक तंत्र है।
इस तंत्र में सबसे घातक भूमिका मनुष्य की ही रही, जिसने अपने लालच व विलासिता के लिए सबकी बलि चढ़ा दी और यह सब कुछ विकास की आड़ में तय किया गया। इस सोच के पीछे एक बड़ा कारण शहरीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति और भोगवादी सभ्यता रही है। साथ में पश्चिमी विकास का मॉडल जीवनशैली का मूलमंत्र बन गया। जैव विविधता हमारे लिए मात्र शब्दों तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि इसका मतलब पूरे उस तंत्र से है, जिसमें मनुष्य भी एक हिस्सा है। हमारे चारों तरफ प्रकृति के उत्पाद हवा, मिट्टी और पानी व उनसे उत्पादित भोजन जैव विविधता की ही देन हंै। मसलन वनों से मिट्टी, हवा, पानी मिलता है, तो नदी, कुएं और तालाब भी इन वनों से ही जुड़े हैं। बिगड़ती हवा की रोकथाम भी वनों से ही संभव है।