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छोटे सत्र से बड़ी उम्मीदें

Sun, 04 Aug 2013 08:28 PM IST
रशीद किदवई
रशीद किदवई Updated Sun, 04 Aug 2013 08:28 PM IST
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Big hope from small session

संसद का मानसून सत्र बहुत हंगामी परिस्थितियों के बीच आज शुरू हो रहा है। इसमें एक तरफ तेलंगाना का मुद्दा सुर्खियों में है, वहीं राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी का बढ़ता कद सत्तारूढ़ कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। विपक्षी दल चूंकि इसे संसद का आखिरी सत्र बता रहे हैं, इसलिए भी इस सत्र का महत्व बढ़ जाता है। विपक्ष का मानना है कि सरकार महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करवाने के लिए जिस तरह जोर लगा रही है, उससे साफ है कि देश में शीघ्र चुनाव होंगे। कांग्रेस हालांकि जल्दी चुनाव कराने की बात अभी खुलकर स्वीकार नहीं कर रही, लेकिन दिल्ली और राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर वह इन दोनों राज्यों में अपनी संभावनाओं के बारे में आकलन करवा रही है। अगर उसे लगेगा कि इन राज्यों में उसकी स्थिति चुनाव में अच्छी नहीं रहेगी, तो वह अपनी भद पिटवाने से पहले ही लोकसभा चुनाव करवा देगी।

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देश भर में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता जिस तरह बढ़ रही है, उसे देखते हुए कांग्रेस नहीं चाहेगी कि चुनाव में जाने से पहले मोदी को तैयारियों के लिए पर्याप्त वक्त मिले। कांग्रेस मोदी के पक्ष में बोले या विरोध में, फायदा मोदी को ही हो रहा है। जबकि राहुल गांधी पार्टी संगठन में व्यापक फेरबदल कर रहे हैं, पर उसकी उतनी चर्चा नहीं हो पा रही। कांग्रेस में अभी मधुसूदन मिस्त्री, मोहन प्रकाश एवं सीपी जोशी कद्दावर नेता के तौर पर उभरे हैं, जबकि दिग्विजय सिंह, अहमद पटेल जैसे नेताओं का कद घटा है। संगठन के कामकाज से लेकर टिकट वितरण तक में पार्टी के वरिष्ठ दिग्गजों को किनारे रखकर नए प्रयोग हो रहे हैं, लेकिन इस बारे में कहीं कोई चर्चा नहीं होती। मानसून सत्र वैसे भी अपेक्षाकृत छोटा होता है। इस सत्र में मात्र 16 बैठकें होंगी और उसमें से भी चार शुक्रवार को सदन में गैर सरकारी कामकाज ही होगा। पिछले कुछ सत्रों में संसद का कामकाज न के बराबर हुआ और ज्यादातर समय हंगामे की भेंट चढ़ गया। बजट सत्र कोयला घोटाला सहित कई मुद्दों के चलते बाधित रहा था। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह सत्र बिना किसी बाधा के चल पाएगा।
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सरकार के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं। सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि उसके पास अब समय नहीं बचा है। ऐसे में, वह चाहेगी कि संसद का यह सत्र अबाधिक ढंग से चले और सभी दलों के सहयोग से ज्यादा से ज्यादा समय देकर जरूरी कामकाज निपटाया जा सके। इस सत्र में न्यायपालिका और केंद्रीय सतर्कता आयुक्त ने भी सरकार के लिए सुविधाजनक स्थिति तैयार कर दी है। पिछले दिनों आए दो फैसलों से सियासी दल असहमत हैं और वे कानून बनाकर उसे पलटना चाहते हैं। मसलन, शीर्ष अदालत ने अपने एक फैसले में कहा था कि वोट न दे सकने वाले व्यक्ति को चुनाव लड़ने का अधिकार भी नहीं होगा। दूसरा फैसला केंद्रीय सतर्कता आयोग का था, जिसमें सभी राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार कानून के दायरे में आने के लिए कहा गया था। इन फैसलों के मद्देनजर अपने राजनीतिक अस्तित्व को खतरे में देख सभी पार्टियां एकमत हो गई हैं।
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अन्य असहमतिपूर्ण मुद्दों पर भी सरकार की कोशिश रहेगी कि विपक्ष को किसी भी तरह मना लिया जाए और जनहित एवं देशहित के नाम पर महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करवा लिया जाए। विपक्षी पार्टियों को भी कहीं न कहीं यह एहसास है कि संसद की कार्यवाही स्थगित रखने से जनमानस में विपक्ष के प्रति नकारात्मक भाव पैदा होता है। यही नहीं, ऐसे में सरकार को यह कहने का मौका मिल जाता है कि विपक्ष संसद ही नहीं चलने देता, तो महत्वपूर्ण विधेयक पारित कैसे हो पाएंगे। ऐसे में, उम्मीद तो यही करनी चाहिए कि इस सत्र में विपक्ष सोच-समझकर कदम उठाएगा। पर सरकार के सामने चुनौतियां ज्यादा हैं। यह देखना होगा कि वह इस अवसर का कितना फायदा उठा पाती है।

सरकार के एजेंडे में सबसे ऊपर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक है। उसके लिए राहत की बात यह है कि प्रमुख विपक्षी दल भाजपा इसका मुखर विरोध नहीं कर रही है। सपा जरूर किसान-विरोधी बताते हुए इसके खिलाफ है, लेकिन लगता है कि मुलायम सिंह यादव को कांग्रेस किसी न किसी तरह सहमत कर लेगी। तेलंगाना के मुद्दे पर जहां तक विरोध और हंगामे की बात है, तो उसमें ज्यादातर कांग्रेस के सांसद ही सक्रिय हैं। पार्टी के लोगों को मनाने और शांत करने की कोशिशें कांग्रेस ने शुरू कर दी है। वैसे तेलंगाना का प्रस्ताव इस सत्र में संसद में नहीं आएगा। खाद्य सुरक्षा विधेयक के अलावा अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए भूमि अधिग्रहण, पेंशन विधेयक, कंपनी विधेयक और प्रत्यक्ष कर संहिता विधेयक सहित कई महत्वपूर्ण विधेयक सरकार इस सत्र में पारित कराने की कोशिश करेगी। इसके अलावा, जो भी जरूरी विधेयक कांग्रेस के राजनीतिक हित में होगा, सरकार उसे जरूर इस सत्र में पारित करवाने की कोशिश करेगी। रिटेल एफडीआई, मिड डे मील में गड़बड़ी, उत्तराखंड की त्रासदी, रुपये में गिरावट, अर्थव्यवस्था की चुनौती जैसे कई मुद्दे हैं, जिन पर इस सत्र में चर्चा देखने को मिल सकती है।


लेकिन पिछले अनुभवों को देखते हुए यकीन के साथ नहीं कहा जा सकता कि इस सत्र में सब कुछ शांतिपूर्ण ढंग से ही संपन्न होगा। हंगामे तो होंगे ही, क्योंकि सभी राजनीतिक दल अपना पक्ष भी रखना चाहेंगे। ऐसे में सरकार के सामने यह बड़ी चुनौती है कि मोदी के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए वह विपक्ष को सहयोग के लिए मनाए और कम समय में अपने सभी जरूरी काम भी निपटाए।

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