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भारत की उन्नति ऐसे भी हो सकती है

Sun, 22 Dec 2019 02:40 AM IST
gautam chatterjee गौतम चटर्जी
Updated Sun, 22 Dec 2019 02:40 AM IST
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Bharatendu Harishchandra had told in an important speech in Ballia that how India will progress
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Amar ujala

तकरीबन 135 साल पहले और अपने देहांत से ठीक एक साल पहले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने बलिया में एक महत्वपूर्ण भाषण दिया था, जिसका विषय था-भारत वर्षोन्नति कैसे हो सकती है। उस समय अंग्रेजों का शासन था, और आजादी की कोई संभावना सामने नहीं दिखती थी। देश की उन्नति कैसे हो, इसके बारे में भारतेंदु ने देशवासियों को ही सुझाया था, न कि अंग्रेजों को। इस भाषण में देश आजाद कैसे हो इसपर चिन्ता नहीं है बल्कि उसी परिस्थिति में देश की उन्नति कैसे हो सकती है, इसी पर क्रमवार ढंग से बोला गया था। यह भाषण विशेषकर शिक्षा अर्जित करने और काम करने की प्रवृत्ति बढ़ाने पर ज्यादा केंद्रित था।


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1857 से अंग्रेज शासक पूरी तरह शासन करने की भूमिका में आए। उससे पहले तक मुगल राज ही था। 1884 में दिये अपने भाषण में भारतेंदु यह भी कह गये कि मुसलमान भाईयों के लिए उचित है कि इस हिन्दुस्तान में बस कर वे लोग हिंदुओं को नीचा समझना छोड़ दें और सगे भाईयों की भांति हिंदुओं से बर्ताव करें। भारतेंदु के कहने का मतलब है कि छह सौ साल के मुगलकाल का प्रभाव उस समय तक भी क्षीण नहीं हुआ था। 1884 में दिये इस भाषण के साथ साथ उसी वर्ष हुई एक और उपलब्धि भी यहां उल्लेखनीय है। 

मेडिकल हाल प्रेस, वाराणसी से भारतेंदु का एक ग्रंथ प्रकाशित हुआ था, काश्मीर कुसुम अथवा राजतरंगिणी-कमल। इस ग्रंथ में कश्मीर का संक्षिप्त इतिहास तो संकलित है ही, कल्हण के राजतरंगिणी के बाद की समस्त ऐतिहासिक घटनाएं भी इसमें वर्णित हैं। इस प्रकार अपने भाषण में सुझाये देश की उन्नति के भारतेंदु तरीकों और राजतरंगिणी से लेकर उन्नीसवीं सदी के ग्रंथ काश्मीर कुसुम तक यदि नजर दौड़ायें तो हमें एक प्रकाश मिलता है। अर्थात् अपने देश की उन्नति के लिए हमें अपने ही साहित्य, दर्शन, इतिहास या एक शब्द में कहें तो काव्यपरंपरा के प्रभाव से आज की परिस्थिति में हम निर्द्वंद्व होकर कह सकते हैं कि भारत की उन्नति ऐसे भी हो सकती है।

देश में नवीं और दसवीं सदी तक हिंदू और बौद्ध परंपरा अपनी उन्नत अवस्था में थी। इतिहास कहता है कि ग्यारहवीं सदी से हिंदू साम्राज्य टूटता चला गया। तथ्य यह है कि महमूद गजनवी ने 1015 ई. और फिर 1021 ई. में विशेषरूप से कश्मीर में मुस्लिम व्यवस्था थोपने की कोशिश की लेकिन वह कश्मीर के हिंदुओं के विरोध के कारण सफल नहीं हो सका। हिंदू दर्शन परंपरा की ही प्रतिबिंब थी, उस समय तक उन्नत हो चुकी भारतीय काव्य परंपरा। संस्कृत काव्यशास्त्र भरत मुनि के नाट्यशास्त्र और भामह एवं दंडी के काव्यालंकार- काव्यादर्श में अपनी उन्नत अवस्था में पहुंच चुका था। यह वामन, रूद्रट, आनंदवर्धन, अभिनवगुप्त, कुंतक आदि ऋषिकवियों के लिखे से पुष्ट होता है।

कल्हण ने बारहवीं सदी में लिखा। उनसे पहले भोज, आनंदवर्धन और अभिनवगुप्त ने कश्मीर की वृहत्तर घाटियों को ज्ञान से प्रकाशित और इस घाटी में बसने वाले लोगों को प्रशस्त कर रखा था। मुगलकाल बस रहा था, तो सिर्फ इस कारण कि वह गजनवी की तरह हिंदू संस्कृति को नष्ट करने की धृष्टता की जगह हिन्दू काव्य और दर्शन को सम्मानित देखने की कमसिन नजाकत या भंगिमा में आरूढ़ हो रहा था। हम साम्राज्य, युद्ध और हार-जीत की भाषा में पढ़ते आ रहे अपने इतिहास को कभी इस तरह देखते ही नहीं कि मुगलकाल सिर्फ साम्राज्य आधारित काल का इतिहास भर नहीं है। 

इसकी शुरुआत पूर्व प्रतिष्ठित कला और संस्कृति में रंगे लोगों के मानस को साथ लेकर चलने की मुद्रा से हुई। बारहवीं और तेरहवीं सदी में ही शारंगदेव और पार्श्वनाथ हुए और उन्होंने उसी कश्मीर आभा और परंपरा की आंच में संगीत के ग्रंथ रचे। अर्थात भले ही संस्कृत नाटक के मंचन की परंपरा बाधित हुई और ध्रुपद ख्याल में बदलते गये लेकिन ऋषि पूरे मुक्त सामाजिक स्वर में लोगों के बीच होते चले गये और ग्रंथ रचा जाता रहा।

चौदहवीं सदी में ही ऋषि लल्लेश्वरी, हब्बा खातून, रूपा भवानी और अर्निमल भी हुई, उनकी कविताएं मुगलकाल में ही लोगों के बीच प्रिय हुईं। यह गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा, अपाला और वागंम्भृणी की वैदिक ऋषि परम्परा का ही शैव विस्तार था, मध्यकाल में जिसकी भूमि कश्मीर में शैव दर्शन ऋषि दुर्वासा और वसुगुप्त से लेकर उत्पलदेव और अभिनवगुप्त ने तैयार की थी। यह परंपरा नंद ऋषि यानी नुरुद्दीन से होते हुए बीसवीं सदी के लक्ष्मण जू तक पल्लवित होती रही। 

मुगल शासन के दौरान पूरे छह सौ वर्षों में कश्मीर लोग और ऋषि कश्मीर छोड़ कर शेष भारत में कहीं विस्थापित नहीं हुए जबकि मुगलों का शासन कश्मीर तक सीमित नहीं था। बात सिर्फ तब के शासकीय साम्राज्य या आज की शासकीय राजनीति तक सीमित नहीं है। भारतीय मानस में चार हजार साल से रचे बसे आर्य, वैदिक हों हिन्दू, बौद्ध या शैव दर्शन की गहरी काव्यपरम्परा से भी हमारा इतिहास बना है, सिर्फ राजाओं के साम्राज्य, हमलों व शासनों से नहीं।

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