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भारत रत्न इन वेटिंग
सुधाकर आशावादी
Updated Mon, 29 Dec 2014 08:11 PM IST
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सार्वजनिक जीवन में यश की कामना कौन नहीं करता। सम्मान के आकांक्षी तो अपने थैले में श्रीफल, शॉल और प्रतीक चिह्न साथ लेकर घूमते हैं। मैंने तय कर लिया है कि ऐसी कोई कामना नहीं करूंगा, जो मेरे बूते से बाहर हो। कितनी बार मैंने मन को समझाया कि मैं भारत रत्न की दौड़ में शामिल नहीं हूं, फिर भी सोते-जागते उसी का सपना देखता रहता हूं।
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अपने सपने को पूरा करने के लिए मैंने न जाने कितने जतन किए, जाने कितनी बार औरों के नाम को भारत रत्न के लिए प्रस्तावित किया, ताकि लगे हाथ मैं भी लाइमलाइट में आ जाऊं। मगर नतीजा सिफर रहा। अब फिर उम्मीद जगी है कि कभी मेरा नंबर भी आएगा, क्योंकि जिनके नाम का प्रस्ताव मैंने किया था, उनको यह सम्मान देने का मार्ग स्वच्छता अभियान के तहत साफ कर दिया गया है।
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कितने बरसों तक मैंने इस सम्मान की प्रतीक्षा का दंश झेला है, बार-बार मुझे वेटिंग लिस्ट में रख दिया जाता है। आखिर वेटिंग की भी कोई सीमा होती है। कब्र में पैर लटके हों और व्यक्ति सर्वोच्च सम्मान पाने का सपना देखता रहे, इससे तो अच्छा है कि इसका ख्याल ही दिल से निकाल दे। वैसे भी कितनी लंबी लाइन है इस सम्मान के आकांक्षियों की। जिसे देखो वही अपने-आप को राष्ट्र का गौरव बताने पर तुला रहता है। इस दौड़ के शुरू होने से पहले ही अच्छी खासी टांग-खिंचाई शुरू हो जाती है। लोग अपने-अपने दिशानायकों के लिए भी पुरस्कार की मांग करते हैं।
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मैं बरसों से यही सपना देख रहा हूं। अपने आपको भारत रत्न बनाने के अभियान में गली रत्न, मुहल्ला रत्न, शहर रत्न, जिला रत्न, मंडल रत्न और राज्य रत्न जैसे पुरस्कारों तक की सीढ़ियां मैंने जैसे-तैसे चढ़ ली हैं, मगर अब कम्पीटीशन कुछ ज्यादा हो गया है, क्योंकि जीवित ही नहीं, अमर हो चुकी कुछ आत्माएं भी चुनौती बनी हुई हैं। यदि लंबे इंतज़ार के बाद भी यह सम्मान नहीं मिल सका, तो भारत रत्न इन वेटिंग बनने से तो कोई मुझे रोक नहीं सकता। फिर भी जब तक सांस है, तब तक आस है।