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पाकिस्तान में भगत सिंह
सुभाष गाताडे
Updated Wed, 24 Aug 2016 07:30 PM IST
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सुभाष गाताडे
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क्या होता अगर शहीद भगत सिंह आज मौजूद होते? पिछले दिनों यह सवाल पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में एक नाटक में उठाया गया। गौरतलब है कि यह नाटक पाकिस्तान की आजादी के दिन और भारत के स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या पर राजधानी इस्लामाबाद के एक मुक्ताकाशी रंगमंच में प्रदर्शित किया गया।
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नाटक के निर्देशक जैनब डार और बीबीसी के पूर्व संवाददाता हाफिज चाचड़ ने मिलकर इसका आयोजन किया था। नाटक को काफी सराहा गया। जैसी कि उम्मीद की जा सकती है, पाकिस्तान के नेशनल काउंसिल ऑफ आर्ट्स ने पहले तो नाटक के मंचन की अनुमति दे दी, फिर आखिरी समय में उसे रद्द कर दिया। उसने अपने ई-मेल में कहा कि आपके आयोजन की अंतर्वस्तु तथा काउंसिल के नियम को देखते हुए ऐसा करना पड़ रहा है। मगर आयोजकों का उत्साह इतना प्रबल था कि उन्होंने वैकल्पिक इंतजाम किया तथा मंचन को मुमकिन बनाया।
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मालूम हो कि भगत सिंह का जन्म पाकिस्तान स्थित फैसलाबाद में हुआ था, तथा उनका मुकदमा लड़ने में पाकिस्तान के संस्थापक बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना भी आगे थे। बंटवारे के बाद जिस तरह पाकिस्तान ने आने वाली पीढ़ियों को इतिहास सिखाया, उसमें भगत सिंह एवं उनके साथियों को ‘भारत के क्रांतिकारियों’ या ‘दुश्मन मुल्क’ के इन्कलाबियों तक सीमित कर दिया गया। इसी वजह से आयोजकों की कोशिश यही थी कि भगत सिंह की बर्तानवी साम्राज्यवाद के खिलाफ ऐतिहासिक भूमिका एवं उनकी कुर्बानी की सच्चाई को पाकिस्तान की जनता को बताया जाए। नाटक का खाका इस तरह बनाया गया कि फैसलाबाद में जन्मे भगत सिंह अचानक पाकिस्तान पहुंचते हैं और उन तमाम स्थानों पर जाते हैं, जो उनके जीवन से जुड़े हैं। वह ब्रैडला हॉल पहुंचते हैं, जहां उन्होंने नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी, जिसे वह खंडहरनुमा पाते हैं। लाहौर में घूमते हुए वह एक मुल्ला से मिलते हैं, जो उन्हें ‘काफिर’ कहकर संबोधित करता है।
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ज्यादा दिन नहीं हुए, जब भगतसिंह पर चले मुकदमे को लेकर पाकिस्तान के अग्रणी वकील इम्तियाज राशिद कुरैशी द्वारा ली गई एक अलग किस्म की पहलकदमी की चर्चा थी, जिसमें उन्होंने भारत के जाने-माने वकील-नफीस सिद्दीकी से, जो क्रांतिकारी मौलाना हसरत मोहानी के दामाद लगते हैं, संपर्क किया था। सिद्दीकी उन्हें पुराने रिकॉर्ड खंगालने में मदद कर रहे हैं, जो सबूत की तरह इस्तेमाल किए जा सकते हैं। यहां यह बताना समीचीन होगा कि भगत सिंह ने जिस ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ नारे को लोकप्रिय बनाया, उसे हसरत मोहानी ने ही गढ़ा था। कुरैशी एवं उनके साथियों का मानना है कि उन पर चला मुकदमा ‘फैब्रिकेटेड’ था। बर्तानवी हुकूमत भगत सिंह की शोहरत एवं उनके क्रांतिकारी विचारों से खौफ खाती थी और उसने तय किया था कि उन्हें सजा-ए मौत देनी ही है, इसीलिए यह मुकदमा चलाया गया था। लाहौर की उच्च अदालत की द्विसदस्यीय पीठ ने इस मामले को तीन सदस्यीय पीठ को रेफर किया है। यानी कुरैशी के प्रयासों को शुरूआती जीत भी मिली है।
भारत एवं पाकिस्तान में राजनीतिक कारणों से एक दूसरे को ‘स्याह’ रंग में चित्रित करने की होड़ लगी रहती है, ऐसे में, ऐसी खबरें हवा के ताजा झोंके की तरह प्रतीत होती हैं।