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सब भाग रहे हैं
सहीराम
Updated Thu, 25 Jul 2013 04:12 AM IST
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ये हमारे फिल्म वाले भी कमाल के लोग हैं जी। कल तक कह रहे थे कि भाग डी के बोस, डी के बोस भाग और आज कह रहे हैं भाग मिल्खा भाग। पर ऐसा नहीं है कि कभी डी के बोस और कभी मिल्खा को भगा-भगाकर वे सबको भगा ही रहे हों, बल्कि वे तो इस तरह सबको फिल्म देखने के लिए बुला रहे हैं। वे तो चाह रहे हैं कि लोग भाग-भागकर फिल्म थियेटर की तरफ आएं।
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हालांकि फिल्म देखने का वह दौर चला गया, जब बच्चे, स्कूलों और कॉलेजों से भाग-भागकर सिनेमा हॉल पहुंचते थे और टिकट खिड़की पर लोगों की कमीजें फट जाती थी। खैर जी, जहां डी के बोस के भागने या भगाने की इतनी निंदा हुई कि देखो, कैसी अश्लीलता आ गई है फिल्मों में, वहीं भाग मिल्खा भाग की तारीफ हो रही है।
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इस तारीफ का परिणाम यह हो रहा है कि अब सभी कह रहे हैं कि हमें ऐसा भागनेवाला एक नहीं, हजारों मिल्खा चाहिए। अब देखो जी, हमारे यहां भागनेवालों की तो कमी है नहीं। इधर देखा नहीं, बच्चे किस तरह कॉलेजों में दाखिले के लिए भागते फिर रहे थे। कॉलेज जानेवाले बच्चों से पहले स्कूल जानेवाले बच्चे अपने मां-बाप की उंगलियां पकड़े भाग रहे थे। प्रतिभाशाली बच्चे यूएस जाने और डॉलर कमाने के लिए भागते फिरते हैं। बेरोजगार बच्चे नौकरी पाने के लिए भागते फिरते हैं। मां-बाप बेटी के रिश्ते के लिए भागते फिरते हैं और फिर ब्याहताएं दहेज लोभी ससुरालवालों से भागती फिरती हैं।
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फिर कितने ही लोग कानून से भागते फिरते हैं। सिर्फ चोर और उचक्के ही नहीं, ठग और उठाईगीर ही नहीं, हत्यारे और बलात्कारी भी कानून से बचकर भाग रहे हैं। दिल्ली के झपटमारों को तो इतना तेज भागना पड़ता है कि उन्होंने अपने लिए मोटरसाइकिलों का जुगाड़ कर लिया है।
लेकिन कानून से सिर्फ अपराधी ही नहीं भागते, बड़े-बड़े नेता तक भागते फिरते हैं। वैसे भी राजनीति ऐसी चीज है कि कभी वह टिकट के लिए भगाती है इस नेता की ड्योढ़ी से उस नेता की ड्यौढ़ी तक। कभी वह कुर्सी लेने के लिए भगाती है, तो कुर्सी बचाने के लिए भी भगाती है। और कुर्सी पर रहते हुए कोई घोटाला हो जाए, तो फिर कितना ही भाग ले, बचना मुश्किल है। पहले घोटाला करने के लिए भागो और फिर कानून के पंजे से बचने के लिए भागो।
तो भागनेवालों की तो इस देश में कोई कमी नहीं। वे हजारों में नहीं, लाखों में मिल जाएंगे। बस यही है कि मिल्खा जैसे भागनेवाले नहीं हैं।