मतभेदों के बावजूद बेहतर रिश्ते
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जिस एक बात ने सबसे ज्यादा उत्साहित किया है, वह यह कि उनकी 32 घंटे की भारत यात्रा के दौरान अहमदाबाद में लाखों लोग उनका स्वागत करेंगे। यह उनका अब तक का सबसे बड़ा स्वागत समारोह होगा। इस श्रमसाध्य प्रयास ने, (मोटेरा स्टेडिम के 22 किलोमीटर के रास्ते में 28 प्रवेश द्वार, जो इस भारतीय राज्य की सांस्कृतिक विविधता को प्रदर्शित करेगा), व्यापार सौदे को अंतिम रूप देने की दोनों पक्षों की असमर्थता पर ट्रंप की प्रतिक्रिया को नरम बना दिया है। सार्वजनिक रूप से यह घोषणा करते हुए कि 'हम भारत के साथ एक बहुत बड़ा व्यापार सौदा कर रहे हैं...मुझे नहीं पता कि यह चुनाव से पहले होगा या नहीं...' उन्होंने व्यापार वार्ताकारों पर सचमुच कठिन दबाव बना दिया है। उन्होंने अपनी निराशा जाहिर की, 'हमारे साथ बहुत अच्छा व्यवहार नहीं किया गया है।' यह अमेरिका-भारत व्यापार वार्ता की हल्की आलोचना है और अमेरिकी मांगों के प्रति अधिक लचीलापन दिखाने के लिए भारत सरकार को एक विनम्र संकेत भी।
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'मैं प्रधानमंत्री मोदी को पसंद करता हूं', यह अमेरिकी राष्ट्रपति की चलताऊ टिप्पणी नहीं है, बल्कि इसका मतलब है। अमेरिकी राष्ट्रपति से पांचवीं बार मिलने वाले मोदी एक अनोखा मंत्र जानते हैं, जो वैश्विक नेताओं के साथ व्यक्तिगत रिश्ते बनाने में उनकी मदद करता है। ट्रंप और मोदी, दोनों ऐसे सार्वजनिक कार्यक्रमों के जरिये अपने मूल मतदाताओं को महत्वपू्र्ण राजनीतिक संदेश देते हैं। नमस्ते ट्रंप कार्यक्रम से भारतीय मूल के गुजराती-अमेरिकियों के बीच ट्रंप को फिर से चुनाव में समर्थन मिलने की उम्मीद है। दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ खुशमिजाजी, गर्मजोशी और औपचारिकता का सार्वजनिक प्रदर्शन भारत और विदेशों में मोदी की छवि एवं प्रतिष्ठा बढ़ाएगा। इसका महत्व चीन और पाकिस्तान पर ही नहीं पड़ेगा, इससे जापान, कोरिया और ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत के रिश्तों को भी सकारात्मक संकेत मिलेगा।
व्यापार समझौते को भले ही बाद के लिए टाल दिया गया हो, लेकिन भारतीय नौसेना के लिए 2.6 अरब डॉलर के 24 एमएच 60आर सी हॉक हेलिकॉप्टर, और 1.8 अरब डॉलर के एकीकृत वायु रक्षा हथियार प्रणाली की बिक्री के लिए अनुबंध तथा बौद्धिक संपदा अधिकार में सहमति पत्र पर हस्ताक्षर के लिए सीसीएस की मंजूरी मतभेदों को विवाद न बनने देने का ही काम करेंगी। जैसा कि अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने पिछले वर्ष अपनी भारत यात्रा के दौरान कहा था, बड़े सौदे समझौते और परस्पर लेन-देन की भावना से होते हैं। उम्मीद है कि भारत-अमेरिका के व्यापार वार्तकार निकट भविष्य में कभी बेहतर व्यापार सौदे के लिए लचीलापन दिखाएंगे।
ट्रंप भारत से उम्मीद करते हैं कि वह सभी सामान पर कम कर लगाए। एलएनजी और तेल की अधिक खरीद तथा अमेरिकी उत्पादों की भारतीय बाजार तक व्यापक पहुंच अमेरिका का व्यापार घाटा पाट सकती है। दूसरी तरफ भारत चाहेगा कि अमेरिका स्टील और एल्युमीनियम पर शुल्क कम करे तथा आंशिक रूप से ही सही, जीएसपी (वरीयताओं की सामान्यीकृत प्रणाली) बहाल करे, जिससे लगभग 6.5 अरब डॉलर का भारतीय निर्यात प्रभावित हुआ है।
अमेरिका अब भारत को एक प्रमुख रक्षा साझेदार मानता है। पिछले तीन वर्षों में ट्रंप ने भारत को सशस्त्र ड्रोन और एकीकृत वायु मिसाइल प्रौद्योगिकी की पेशकश की है। पिछले वर्ष 2+ 2 वार्ता में औद्योगिक सुरक्षा अनुबंध पर हस्ताक्षर करने से संयुक्त अनुसंधान एवं उत्पादन में निजी क्षेत्रों की भागीदारी आसान होगी। मालाबार संयुक्त सैन्य अभ्यास अब बड़ा हो गया है, हमने पिछले वर्ष तीनों सेनाओं का अभ्यास किया। भारत ने तीन मूलभूत समझौतों में से दो पर हस्ताक्षर किए हैं-लॉजिस्टिक एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट और कम्युनिकेशंस कॉम्पैटिब्लिटी ऐंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट, जो संवेदनशील सैन्य सूचनाओं को साझा करने का मार्गदर्शन करता है और सेवा कार्य के लिए सैन्य सुविधाओं के पारस्परिक उपयोग की परिकल्पना करता है।
चीन के साथ 400 अरब डॉलर के व्यापार घाटे की तुलना में भारत के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा बहुत कम लगभग 30 अरब डॉलर ही है, इसलिए इस पर ज्यादा जोर देने के बजाय भारत और अमेरिका को हिंद-प्रशांत क्षेत्र, चतुर्भुज सुरक्षा वार्ता, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई, अगली पीढ़ी की प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष अनुसंधान, सूचना प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा एवं कार्बन उत्सर्जन नियंत्रण के लिए अत्याधुनिक तकनीक जैसी रणनीतिक भागीदारी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अमेरिका को अपनी पोल्ट्री, पनीर, बादाम, सेब आदि की भारतीय बाजार में हिस्सेदारी को मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। उसे यह भी समझना चाहिए कि मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए भारत की कोई भी सरकार हृदय रोगियों के लिए स्टेंट और बुजुर्गों के लिए घुटने की टोपी पर शुल्क बढ़ाने का जोखिम नहीं उठा सकती।
हालांकि भारत और अमेरिका के हित हिंद-प्रशांत क्षेत्र से जुड़े हैं, पर उनका दृष्टिकोण समान नहीं है। अमेरिका आतंकवादियों के बारे में खुफिया जानकारियां साझा करता है और उसने पाकिस्तान पर दबाव बनाया है। पाकिस्तान के विपरीत, अमेरिका अफगानिस्तान में भारत के लिए एक भूमिका देखता है। भारत अफगानिस्तान में मौजूदा सरकार की प्रत्यक्ष भागीदारी के बिना अमेरिका-तालिबान वार्ता को लेकर संदेहपूर्ण और आशंकित है। अमेरिका के अफगानिस्तान से बाहर निकलने से वहां एक शून्य पैदा होगा, जिससे हिंसा बढ़ेगी। हालांकि ईरान को लेकर भारत और अमेरिका एकमत नहीं हैं। भारत समझता है कि ईरान में सत्ता बदलने की कोई भी कोशिश वहां अराजकता को जन्म देगी। चाबहार पर भारत के लिए सीमित अमेरिकी छूट के बावजूद अमेरिका के विरोधियों का मुकाबला करने लिए प्रतिबंध लगाने के कानून का अत्यधिक प्रयोग कारगर नहीं है। कश्मीर में राजनेताओं को हिरासत में रखने और सीएए के खिलाफ प्रदर्शन का मुद्दा संभवतः अनौपचारिक बातचीत में उठ सकता है। गंभीर मतभेदों के बावजूद ट्रंप के साथ रिश्ते बेहतर बनाना आगे मोदी के लिए फायदेमंद हो सकता है।