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धर्म का धंधा सबसे चंगा

Sun, 08 Sep 2013 07:27 PM IST
विनीत नारायण
विनीत नारायण Updated Sun, 08 Sep 2013 07:27 PM IST
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Best bussiness of religion

आसाराम की गिरफ्तारी के बाद से अखबारों से लेकर टेलीविजन चैनलों तक पर धर्म के धंधे को लेकर गर्मागर्म बहसें चलती रही हैं। पर इन बहसों में बुनियादी बात नहीं उठाई जा रही। धर्म का धंधा केवल भारत में ही चलता हो या केवल हिंदू कथावाचक या महंत ही इसमें लिप्त हों, ऐसा नहीं है। दूसरे देशों और अन्य धर्मों में भी कमोबेश इस तरह की चीजें देखी जा सकती हैं। उदाहरण के लिए, पिछले दिनों तीन दिन तक मैं इटली के रोम नगर में ईसाइयों के सर्वोच्च आध्यात्मिक केंद्र वेटिकन सिटी में पोप और आर्क बिशपों के आलीशान महल और वैभव के भंडार देखता रहा। एक क्षण को भी न तो मुझे आध्यात्मिक स्फूर्ति हुई और न ही कहीं भगवान के पुत्र माने जाने वाले यीशू मसीह के जीवन और आचरण से कोई संबध दिखाई दिया। कहां तो विरक्ति का जीवन जीने वाले ईसा मसीह और कहां उनके नाम पर असीम ऐश्वर्य में जीने वाले आज के ईसाई धर्मगुरु?

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पैगंबर साहब हों या गुरु नानक देव, गौतम बुद्ध हों या महावीर स्वामी, गैया चराने वाले ब्रज के गोपाल कृष्ण हों या वनवास झेलने वाले भगवान राम या कैलाश पर्वत पर समाधिस्थ भोले शंकर हों-इन सबका जीवन अत्यंत सादगी भरा और वैराग्य पूर्ण रहा है। यही नहीं, इन सभी ने धर्म के नाम पर आडंबर और भोले-भाले लोगों के शोषण का विरोध ही किया है। लेकिन आज धर्म के नाम पर धंधा करने वाले कुछ लोगों ने उनके आदर्शों को धर्मग्रंथों तक सीमित कर अपने-अपने साम्राज्य खड़े कर लिए हैं। आज के दौर में शायद ही कोई धर्म इससे अछूता हो। स्वामी विवेकानंद ने गलत नहीं कहा था कि हर धर्म क्रमशः भौतिकता की ओर पतनशील हो जाता है।
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संत दरअसल वह है, जिसके पास बैठने से हम जैसे गृहस्थ विषयी-भोगियों की वासनाएं शांत हो जाएं, भौतिकता से विरक्ति होने लगे और प्रभु के श्रीचरणों में अनुराग बढ़ने लगे। पर आज स्वयं को संत कहलाने वाले कितने लोग इस मापदंड पर खरे उतरते हैं? सच्चाई तो यह है कि जो वास्तव में संत हैं, उन्हें अपने नाम के आगे विशेषण लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। क्या मीराबाई, रैदास, तुलसीदास, नानक देव, कबीरदास जैसे नाम से ही उनके संतत्व का परिचय नहीं मिलता? उनमें से किसी ने अपने नाम के पहले जगतगुरु, महामंडलेश्वर, परमपूज्य, अवतारी पुरुष, श्री श्री 1008 जैसी उपाधियां नहीं लगाईं। पर इनका स्मरण करते ही स्वतः भक्ति जागृत होने लगती है। ऐसे संतों की हर धर्म में आज भी कमी नहीं है। पर वे टेलीविजन पर अपनी महानता का विज्ञापन चलवाकर या लाखों रुपये देकर अपने प्रवचनों का प्रसारण नहीं करवाते। क्योंकि वे तो वास्तव में प्रभु मिलन के प्रयास में जुटे हैं।
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हम सब जानते हैं कि घी का मतलब होता है गाय या किसी अन्य पशु के दूध से निकली चिकनाई। अब अगर किसी कंपनी को सौ फीसदी शुद्ध घी कहकर अपना माल बेचना पड़े, तो साफ जाहिर है कि उसका दावा सच्चाई से कोसों दूर है। क्योंकि जो घी शुद्ध होगा, उसकी सुगंध ही उसका परिचय दे देगी। सच्चे संत भी इसी तरह के होते हैं। ऐसे लोग भौतिकता से कोसों दूर रहकर सच्चे जिज्ञासुओं को आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग बताते हैं। ऐसे संतों को हममें से कितने लोग जानते हैं? वस्तुतः ऐसे संत तो यह चाहते ही नहीं कि कोई उन्हें जाने। पर जो लोग रोजाना टेलीविजन चैनलों, अखबारों और होर्डिंगों पर पेप्सी कोला की तरह विज्ञापन करके अपने आप को संत या गुरु कहलवाते हैं, उनकी सच्चाई उनके साथ रहने से एक ही दिन में सामने आ जाती है। बशर्ते देखने वाले के पास आंख हो।

जैसे-जैसे आत्मघोषित धर्माचार्यों पर भौतिकता हावी होती जाती है, वैसे-वैसे वे खुद को बाजार में बनाए रखने के लिए नए-नए तरीके अपनाने लगते हैं। चूंकि उन्हें स्वयं पर पूरा विश्वास नहीं रहता, इसलिए वे भांति-भांति के प्रत्यय और उपसर्ग लगाकर अपने नाम का शृंगार करते हैं। केवल वे नाम का ही नहीं, बल्कि तन का भी शृंगार करते हैं। ईसाई धर्मगुरुओं के जरीदार गाउन हों या रत्न जड़ित तामझाम, भागवताचार्यों के राजसी वस्त्र और अलंकरण हों या उनके व्यास आसन की साज-सज्जा, क्या इनका ईसा मसीह के सादा लिबास या शुकदेव जी के विरक्त स्वरूप से कोई संबंध है? अगर नहीं, तो ये लोग न तो अपने ईष्ट के प्रति सच्चे हैं और न ही उस आध्यात्मिक ज्ञान के प्रति, जिसे बांटने का ये दावा करते हैं। सही बात तो यह है कि जितने लोग आज धर्म के नाम पर दुनिया भर में अपना साम्राज्य चला रहे हैं, अगर उनमें से दस फीसदी भी ईमानदार हो जाएं, तो आज विश्व इतने संकट में न हो।


जाहिर है, आसाराम कोई अपवाद नहीं हैं। वह भी उसी भौतिक चमक-दमक के पीछे भागने वाले शब्दों के जादूगर हैं, जो शरणागत की भावनाओं का दोहन कर दिन दूनी और रात चौगुनी संपत्ति बढ़ाने की दौड़ में लगे हैं। सच्चे संतों को न तो आश्रम के लिए जमीन कब्जाने की जरूरत पड़ती है और न ही दवाएं बेचने की आवश्यकता पड़ती है। सच तो यह है कि आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वालों का संबंध जब-जब ऐश्वर्य से जुड़ा है, तब-तब उस धर्म का पतन हुआ है। इतिहास इसका साक्षी है। यह तो उस जनता को समझना है, जो अपने जीवन के छोटे-छोटे कष्टों के निवारण की आशा में मृग-मरीचिका की तरह रेगिस्तान में दौड़ती है कि कहीं जल मिल जाए और प्यास बुझ जाए। पर उसे निराशा ही हाथ लगती है। पुरानी कहावत है कि पानी पीजै छान के, गुरु कीजै जान के।

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