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इक दीवार गिरी थी कभी...

Sat, 20 Apr 2013 10:04 PM IST
आशुतोष चतुर्वेदी
आशुतोष चतुर्वेदी Updated Sat, 20 Apr 2013 10:04 PM IST
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अस्थिर मन की दीवारों पर जब राजनीति अपना दस्तखत करती है, तो जमीन पर उग आती है पक्की सी दीवार। कुछ ऐसा ही हुआ था 1961 में। पहले दिल में उठी थी फिर जमीन पर उग आई एक लंबी सी दीवार। बंट गए लोग, बंट गई जमीन।

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जर्मनी की राजधानी बर्लिन के बीचों-बीच खड़ी हो गई एक दीवार। न कोई खिड़की, न कोई दरवाजा। थे तो संगीनों के साए और राजनीति की हिदायतें। दीवार के एक तरफ पूर्वी जर्मनी था तो दूसरी तरफ पश्चिमी जर्मनी। उस दीवार की ऊंचाई दुनिया की महाशक्तियां और बढ़ाती रहीं।
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पश्चिमी जर्मनी के साथ अमेरिका खड़ा था और पूर्वी जर्मनी तत्कालीन सोवियत संघ के कंधे पर खड़ा होकर होड़ ले रहा था। बीच में जर्मनवासी थे, जो दो महाशक्तियों के खेल में बंटे हुए थे और खड़ी थी वह दीवार दिल के टूटने के जख्म को सहती हुई, उन लोगों के दर्द को महसूस करती, जिनके लिए दीवार ने कई साल के फासले बना दिए।
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इसी दीवार ने 28 साल तक दुनिया की कूटनीति को हिलाए रखा। कई बार ऐसे मौके आए जब अमेरिकी और रूसी सेनाएं एक-दूसरे के आमने-सामने थीं। लगने लगा कि शायद तीसरे विश्व युद्ध की शुरुआत इसी दीवार के आस-पास से न हो। लेकिन एक दिन गिर गई वह दीवार। 28 साल का फासला पल में सिमट सा गया।

पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी ने फिर से एक होने का फैसला किया। 1989 में लगभग 155 किलोमीटर लंबी बर्लिन की उस दीवार को जिस तरह रातों-रात खड़ा किया था, उसी तरह रातों-रात गिरा भी दिया गया। लेकिन फासले के जख्म इतने गहरे थे कि उसे पूरा होने में शायद कई दशक बीत जाएं।

अपनों से मिलने की चाह में, उसे पार करने की कोशिश में, लगभग 150 लोगों की जानें गईं। अब भी इस दीवार के कुछ हिस्से बाकी हैं, जो इस रक्तरंजित इतिहास की याद दिलाते हैं। वैसे भी इतिहास कुछ नहीं भूलता। न तो अच्छी घटनाएं, न ही बुरी। दूसरे विश्व युद्ध के बाद गठबंधन सेनाओं ने बर्लिन को चार हिस्सों में बांटा था।

सबसे बड़ा पूर्वी हिस्सा सोवियत सेक्टर था। पश्चिम हिस्से पर तीन ताकतों फ्रांस, ग्रेट ब्रिटेन और अमेरिका का आधिपत्य था। जब बड़ी संख्या में मजदूर और कारोबारी जर्मनी के पूर्वी हिस्से से पश्चिमी हिस्से में पलायन करने लगे तो पूर्वी जर्मनी को लगा कि इससे उसे आर्थिक और राजनीतिक नुकसान हो रहा है, तो बस फिर क्या था, 1961 में 12-13 अगस्त की रात पूर्वी और पश्चिमी बर्लिन की सीमा को बंद कर दिया गया और कंटीले तारों की बाड़ लगानी शुरू कर दी गई।

यह काम रात में और बेहद गुपचुप तरीके से किया गया। सुबह जब लोग जगे तो शहर दो हिस्सों में बंट चुका था। लोग हैरान थे कि यह क्या हो गया। इसके बाद कंक्रीट की एक दीवार खड़ी कर दी गई। पूर्वी जर्मनी के सैनिकों को सख्त हिदायत थी कि किसी को भी दीवार लांघने न दी जाए। जर्मनी के लोगों के लिए यह दीवार अत्याचार और दमन का प्रतीक बन गई। बहुत से लोगों को सीमा पार करते हुए सैनिकों की गोली का निशाना बनना पड़ा, लेकिन इसे पार करने की कोशिश करने वालों की संख्या कम नहीं हुई।

1980 के आसपास में सोवियत संघ में बदलाव का दौर शुरू हुआ और इसके साथ ही जर्मनी में भी राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन की शुरुआत हुई। पूर्वी जर्मनी में व्यापक प्रदर्शन हुए और आखिरकार सरकार का पतन हो गया। 9 नवंबर, 1989 को घोषणा की गई कि सीमा पर आवागमन पर से रोक हटा दी गई है।

पूर्वी और पश्चिमी बर्लिन दोनों ओर से लोगों के बड़े-बड़े जत्थे बर्लिन की दीवार को पारकर एक-दूसरे से मिले। कुछ सप्ताह यही क्रम चला और इसके बाद लोगों ने दीवार के कुछ हिस्सों को तोड़ने की शुरुआत कर दी, फिर तो लोगों ने इसे ढहा कर ही दम लिया। बर्लिन दीवार के गिरने के बाद जर्मनी के एकीकरण की मंजूरी मिली और 3 अक्तूबर, 1990 को जर्मनी फिर से एक हो गया।

इस दीवार के कुछ हिस्से अब भी धरोहर के रूप में सुरक्षित रखे गए हैं जिस पर दुनिया भर के कलाकारों ने अपनी कला को व्यक्त किया है। शायद अब यह बची-खुची दीवार भूल चुकी है राजनीति के उन कैलेंडरों को जो कभी महाशक्तियों ने उसके जिस्म पर टांगे थे।


खुद के जख्मों पर मलहम लगाता शहर भी बची-खुची दीवार की कहानी को भूल जाना चाहता है, लेकिन दिल की दरार जल्दी नहीं भरती, यह बर्लिन जानता है, दीवार भी और शायद इतिहास भी।

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