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भगवद्भक्ति से ही श्रेष्ठ पद प्राप्ति
शिवकुमार गोयल
Updated Fri, 08 Nov 2013 07:31 PM IST
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राजा उत्तानपाद अपनी छोटी रानी सुरुचि से काफी प्रेम करते थे। एक दिन बड़ी रानी सुनीति का पांच वर्षीय पुत्र ध्रुव पिता की गोद में आ बैठा। सुरुचि ने उसे गोद से उतारते हुए कहा, यदि पिता की गोद या सिंहासन चाहिए, तो भगवान से प्रार्थना करो और अगली बार मेरे पुत्र के रूप में जन्म लो।
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इससे क्षुब्ध होकर ध्रुव अपनी मां के पास पहुंचा। सुनीति ने अपने पुत्र के क्रोध को शांत करते हुए कहा, विमाता ने ठीक ही तो कहा है। भगवान की भक्ति से ही किसी को श्रेष्ठ पद की प्राप्ति हो सकती है और भक्ति के लिए बैर एवं घृणा की भावना से मुक्त होना जरूरी है। मां की बात सुन ध्रुव वन की ओर चल पड़ा।
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मार्ग में उसे देवर्षि नारद मिले। नारद जी ने पहले तो उसे समझाकर घर लौटने के लिए कहा, किंतु जब उसने घर लौटने से मना कर दिया , तो भक्ति एवं तपस्या के लिए दृढ़ ध्रुव को उन्होंने द्वादशाक्षर की दीक्षा देकर मथुरा क्षेत्र में यमुना तट पर तपस्या करने के लिए कहा।
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ध्रुव ने भूखा-प्यासा रहकर कठोर तप किया। उसकी श्रद्धा-भक्ति और तप ने भगवान को व्याकुल कर दिया। भगवान ने प्रकट होकर दर्शन दिए, आशीर्वाद दिया। ध्रुव घर वापस लौटे, तो विमाता के चरण स्पर्श कर बोले, यदि आप उस दिन मुझे प्रेरणा नहीं देतीं, तो मैं भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए तत्पर नहीं होता।
सुरुचि उसकी विनम्रता देखकर हतप्रभ थी।